इक्कीसवीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन का केंद्र अब केवल कच्चे तेल के विशाल भंडारों या भारी हथियारों के गोदामों में नहीं, बल्कि कुछ मिलीमीटर आकार के नैनोस्केल सिलिकॉन चिप्स (Silicon Chips) के भीतर सिमट चुका है। आधुनिक सभ्यता का प्रत्येक उपकरण—चाहे वह हाथ में पकड़ा जाने वाला स्मार्टफोन हो, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), अत्याधुनिक एमआरआई मशीन, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (Fighter Jets), मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, क्लाउड डेटा सेंटर या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सुपरकंप्यूटर—बिना सेमीकंडक्टर चिप्स के एक मृत लोहे के बक्से से अधिक कुछ नहीं है। कोविड-19 महामारी के दौरान जब ताइवान, चीन और दक्षिण कोरिया की आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुईं, तो विश्व भर में ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स कारखानों में ताले लग गए थे। इस वैश्विक संकट ने यह कड़वी सच्चाई उजागर कर दी कि जो राष्ट्र सेमीकंडक्टर विनिर्माण में आत्मनिर्भर नहीं है, उसकी आर्थिक संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा सदैव पराधीन रहेगी। इस ऐतिहासिक रणनीतिक चुनौती को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने 76,000 करोड़ रुपये (लगभग 10 अरब डॉलर) के ऐतिहासिक प्रोत्साहन पैकेज के साथ ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (India Semiconductor Mission – ISM) का शंखनाद किया है। धोलेरा से लेकर साणंद और असम के मोरीगांव तक स्थापित हो रहे अत्याधुनिक वाणिज्यिक फैब और ओसैट (OSAT) प्लांट्स भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला के शीर्ष केंद्र के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
सेमीकंडक्टर चिप्स क्या हैं और यह राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ क्यों हैं?
सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) वे विशिष्ट पदार्थ (मुख्यतः सिलिकॉन और जर्मेनियम) होते हैं जिनकी विद्युत चालकता चालकों (Conductors जैसे तांबा) और कुचालकों (Insulators जैसे कांच) के बीच की होती है। इन पदार्थों पर नैनोमीटर पैमाने पर अरबों सूक्ष्म ‘ट्रांजिस्टर’ (Transistors) उकेरे जाते हैं जो विद्युत प्रवाह को चालू या बंद (Binary 0 and 1) करके सूचना का प्रसंस्करण और गणनाएं करते हैं।
सेमीकंडक्टर चिप्स को राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ निम्नलिखित कारणों से माना जाता है:
1. रक्षा एवं सामरिक स्वायत्तता: भारत के सुखोई-30 एमकेआई, तेजस लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली, रडार नेटवर्क और परमाणु पनडुब्बियों के नेविगेशन सिस्टम पूरी तरह विशिष्ट मिलिट्री-ग्रेड चिप्स पर निर्भर करते हैं। आयातित चिप्स में ‘हार्डवेयर ट्रोजन’ या गुप्त बैकडोर (Backdoors) होने का गंभीर खतरा होता है जिससे युद्ध काल में देश की संपूर्ण रक्षा संचार प्रणाली को पंगु बनाया जा सकता है।
2. आर्थिक सुरक्षा: भारत वर्तमान में प्रतिवर्ष लगभग 30 अरब डॉलर से अधिक के सेमीकंडक्टर आयात करता है, जिसके वर्ष 2030 तक बढ़कर 100 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। घरेलू उत्पादन न होने पर देश का चालू खाता घाटा (CAD) बेकाबू हो सकता है।
3. ऑटोमोबाइल एवं डिजिटल इंडिया: आधुनिक इलेक्ट्रिक कारों में 2,000 से 3,000 चिप्स लगते हैं। 5जी टेलीकॉम नेटवर्क, यूपीआई डिजिटल भुगतान टर्मिनल और सौर ऊर्जा इनवर्टर के लिए चिप्स जीवन रेखा हैं।
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) की रूपरेखा और वित्तीय प्रोत्साहन
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत स्थापित ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (ISM) देश में एक पूर्ण और टिकाऊ सेमीकंडक्टर एवं डिस्प्ले पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए समर्पित एक विशेष स्वायत्त नोडल एजेंसी है। भारत सरकार ने इसके लिए 76,000 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन पैकेज को चार व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया है:
1. सेमीकंडक्टर फैब योजना (Semiconductor Fabs): भारत में सिलिकॉन वेफर फैब्रिकेशन प्लांट स्थापित करने वाली कंपनियों को कुल परियोजना लागत का 50 प्रतिशत तक का प्रत्यक्ष वित्तीय अनुदान केंद्र सरकार द्वारा (पारी-पासू आधार पर) प्रदान किया जाता है। इसके अतिरिक्त संबंधित राज्य सरकारें 20 से 25 प्रतिशत अतिरिक्त सब्सिडी देती हैं।
2. डिस्प्ले फैब योजना (Display Fabs): स्मार्टफोन और लैपटॉप के लिए उन्नत एमोलेड (AMOLED) और टीएफटी-एलसीडी डिस्प्ले पैनल निर्माण इकाइयों को 50 प्रतिशत वित्तीय सहायता।
3. कंपाउंड सेमीकंडक्टर और ओसैट/एटीएमपी योजना (OSAT / ATMP): चिप पैकेजिंग, असेंबली, टेस्टिंग और मार्किंग प्लांट्स के लिए 50 प्रतिशत पूंजीगत व्यय सहायता।
4. डिजाइन-लिंक्ड इंसेंटिव योजना (DLI Scheme): घरेलू फैबलेस स्टार्ट-अप्स और एमएसएमई को चिप डिजाइनिंग के लिए सॉफ्टवेयर टूल्स, बुनियादी ढांचा और वित्तीय सहायता प्रदान करना।
चित्र: भारत में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत सिलिकॉन वेफर फैब्रिकेशन, चिप पैकेजिंग और तकनीकी क्रांति
भारत में स्थापित हो रहे ऐतिहासिक सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के अंतर्गत केंद्र सरकार ने पांच विशाल बहु-अरब डॉलर की मेगा परियोजनाओं को अंतिम मंजूरी देकर निर्माण कार्य शुरू करा दिया है:
1. धोलेरा (गुजरात) में टाटा-पीएसएमसी वाणिज्यिक फैब प्लांट:
भारत के औद्योगिक इतिहास का सबसे बड़ा मील का पत्थर टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (Tata Electronics) और ताइवान की विश्व-प्रसिद्ध सेमीकंडक्टर कंपनी पीएसएमसी (Powerchip Semiconductor Manufacturing Corporation – PSMC) का संयुक्त उद्यम है। गुजरात के धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (SIR) में 91,000 करोड़ रुपये के निवेश से भारत का पहला पूर्ण वाणिज्यिक सिलिकॉन वेफर फैब प्लांट स्थापित किया जा रहा है। यह फैब 28nm, 40nm, 55nm और 90nm नोड्स पर प्रति माह 50,000 सिलिकॉन वेफर्स का उत्पादन करेगा जो ऑटोमोटिव, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स की मांग को पूरा करेंगे।
2. साणंद (गुजरात) में माइक्रोन टेक्नोलॉजी का उन्नत एटीएमपी प्लांट:
अमेरिका की दिग्गज मेमोरी चिप निर्माता कंपनी माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) ने साणंद में 22,500 करोड़ रुपये (2.75 अरब डॉलर) के निवेश से अपनी अत्याधुनिक असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) इकाई का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर शुरू कर दिया है। यह संयंत्र उच्च प्रदर्शन वाले डीआरएएम (DRAM) और नंद फ्लैश (NAND Flash) मेमोरी मॉड्यूल्स का निर्माण करेगा जिनका निर्यात वैश्विक बाजारों में किया जाएगा।
3. मोरीगांव (असम) में टाटा का अत्याधुनिक ओसैट प्लांट:
पूर्वोत्तर भारत के औद्योगिक विकास का नया प्रतीक बनते हुए टाटा सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (TSAT) द्वारा असम के मोरीगांव में 27,000 करोड़ रुपये के निवेश से एक विशाल चिप असेंबली और पैकेजिंग इकाई स्थापित की जा रही है। यह संयंत्र प्रतिदिन 4.8 करोड़ चिप्स की पैकेजिंग करेगा और इलेक्ट्रिक वाहनों, 5जी संचार और एआई उपकरणों के लिए आवश्यक उन्नत पैकेजिंग समाधान प्रदान करेगा।
4. साणंद में सीजी पावर और रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स (जापान) का संयुक्त उद्यम:
मुरुगप्पा समूह की सीजी पावर (CG Power), जापान की दिग्गज चिप कंपनी रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स (Renesas Electronics) और थाईलैंड की स्टार्स माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स ने साणंद में 7,600 करोड़ रुपये के निवेश से ओसैट सुविधा की स्थापना शुरू की है जो ऑटोमोटिव और औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए विशिष्ट चिप्स का निर्माण करेगी।
चिप निर्माण की जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया: फैब से पैकेजिंग तक
सेमीकंडक्टर चिप का निर्माण मानव इतिहास का सबसे जटिल, सटीक और तकनीकी रूप से संवेदनशील औद्योगिक उपक्रम माना जाता है। एक नैनोमीटर बाल की मोटाई का लगभग एक लाखवां हिस्सा होता है। चिप निर्माण की प्रक्रिया निम्नलिखित चार प्रमुख चरणों से गुजरती है:
1. सिलिकॉन वेफर निर्माण (Wafer Production): शुद्ध बालू (सिलिका) को पिघलाकर 99.9999999% शुद्ध इलेक्ट्रॉनिक-ग्रेड सिलिकॉन के बेलनाकार इनगॉट्स बनाए जाते हैं, जिन्हें हीरे की आरी से अत्यंत महीन गोलाकार वेफर्स (300mm डिस्क) में काटा जाता है।
2. फैब्रिकेशन एवं फोटोलिथोग्राफी (Cleanroom Fab): चिप्स का निर्माण ‘क्लीनरूम’ (Cleanroom ISO Class 1) में होता है जो एक अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर से भी 10,000 गुना अधिक धूल-मुक्त होता है। यहां नीदरलैंड की एएसएमएल (ASML) द्वारा निर्मित एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट (EUV) लिथोग्राफी मशीनों द्वारा लेजर किरणों से वेफर पर अरबों ट्रांजिस्टर्स के सर्किट पैटर्न छापे जाते हैं। इसमें रासायनिक नक्काशी (Etching), आयन प्रत्यारोपण (Ion Implantation) और धातु की आणविक परतें चढ़ाने के 500 से अधिक जटिल चरण होते हैं।
3. असेंबली और पैकेजिंग (ATMP / OSAT): वेफर फैब्रिकेशन के बाद प्रत्येक वेफर से हजारों सूक्ष्म चिप्स (Dies) को काटकर अलग किया जाता है, उन्हें सुरक्षात्मक सिरेमिक या प्लास्टिक पैकेजिंग में बंद किया जाता है और माइक्रोस्कोपिक सोने या तांबे के तारों से पिनों से जोड़ा जाता है।
4. कठोर परीक्षण (Testing): अत्यधिक तापमान, वोल्टेज और कंपन में चिप की 100 प्रतिशत विश्वसनीयता की जांच की जाती है।
वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला और ‘सिलिकॉन कूटनीति’ (Silicon Diplomacy)
वर्तमान विश्व में सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पूर्वी एशिया के एक छोटे से द्वीप ताइवान (विशेष रूप से TSMC) पर केंद्रित है। चीन द्वारा ताइवान पर सैन्य दबाव के कारण अमेरिका और पश्चिमी देशों ने ‘चाइना प्लस वन’ (China Plus One) और ‘ताइवान प्लस वन’ रणनीति के तहत आपूर्ति श्रृंखला के भौगोलिक विविधीकरण का निर्णय लिया है।
भारत इस वैश्विक पुनर्संतुलन का सबसे प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है:
1. चिप 4 एलायंस (Chip 4) और भारत-अमेरिका इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज (iCET): भारत और अमेरिका ने सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन पर ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौता किया है।
2. यूरोपीय संघ और जापान के साथ सेमीकंडक्टर साझेदारी: जापान के साथ चिप डिजाइन और विनिर्माण में संयुक्त अनुसंधान तथा यूरोपीय संघ के चिप्स एक्ट (EU Chips Act) के साथ भारतीय विनिर्माण का समन्वय।
3. क्वाड (QUAD) सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन इनिशिएटिव: भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर किसी भी प्राकृतिक आपदा या भू-राजनीतिक संकट के समय वैश्विक चिप आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखने के लिए साझा तंत्र विकसित कर रहे हैं।
भारत की मूल शक्ति: वैश्विक चिप डिजाइन प्रतिभा का 20 प्रतिशत
यद्यपि भारत में भौतिक फैब प्लांट अब लग रहे हैं, परंतु भारत दशकों से वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग का ‘मस्तिष्क’ (Brain) रहा है। विश्व की शीर्ष 25 सेमीकंडक्टर कंपनियों—जैसे क्वालकॉम (Qualcomm), इंटेल (Intel), एनवीडिया (NVIDIA), एएमडी (AMD), मीडियाटेक, ब्रॉडकॉम, टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स और आर्म (ARM)—के सबसे बड़े शोध और डिजाइन केंद्र बेंगलुरु, हैदराबाद, नोएडा और पुणे में स्थित हैं।
विश्व के कुल सेमीकंडक्टर डिजाइन इंजीनियरों में से 20 प्रतिशत से अधिक भारतीय इंजीनियर हैं। आज विश्व भर के स्मार्टफोनों और सर्वरों में चलने वाली अधिकांश 3nm और 5nm की जटिल चिप्स का डिजाइन और सत्यापन भारतीय इंजीनियरों द्वारा ही किया जा रहा है। भारत का अगला लक्ष्य केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आउटसोर्सिंग डिजाइन करने तक सीमित न रहकर भारत की अपनी बौद्धिक संपदा (IP) और घरेलू फैबलेस यूनिकॉर्न स्टार्ट-अप्स का निर्माण करना है।
भविष्य के कुशल कार्यबल का निर्माण: सेमीकॉन इंडिया फ्यूचरस्किल्स
एक अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर फैब को चलाने के लिए लाखों उच्च प्रशिक्षित इंजीनियरों, ऑपरेटरों और तकनीशियनों की आवश्यकता होती है। कार्यबल की कमी को दूर करने के लिए भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय अभियान शुरू किया है:
1. 85,000 सेमीकंडक्टर पेशेवरों का प्रशिक्षण: शिक्षा मंत्रालय और एआईसीटीई ने देश के 300 से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेजों में बी.टेक और एम.टेक स्तर पर सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी और वीएलएसआई (VLSI) डिजाइन का विशेष पाठ्यक्रम शुरू किया है।
2. ईडीए टूल्स की निःशुल्क पहुंच: छात्रों और स्टार्ट-अप्स को चिप डिजाइन के लिए विश्वस्तरीय इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) सॉफ्टवेयर—जैसे कैडेंस (Cadence), सिनॉप्सिस (Synopsys) और सीमेंस ईडीए—की निःशुल्क शैक्षणिक पहुंच 100 से अधिक विश्वविद्यालयों में प्रदान की गई है।
3. आईआईटी सेमीकंडक्टर कंसोर्टियम: आईआईटी मद्रास, आईआईटी बॉम्बे और आईआईएससी बेंगलुरु में उन्नत नैनो-फैब्रिकेशन प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं जहां छात्र व्यावहारिक सिलिकॉन वेफर प्रोसेसिंग सीख रहे हैं।
आधिकारिक संदर्भ एवं अधिकृत जानकारी के स्रोत
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन, पीएलआई योजनाओं और नीतिगत दिशा-निर्देशों की प्रामाणिक जानकारी हेतु निम्नलिखित आधिकारिक पोर्टलों का संदर्भ लिया जा सकता है:
1. इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन आधिकारिक राष्ट्रीय पोर्टल (ISM India)
2. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार (MeitY)
3. इन्वेस्ट इंडिया सेमीकंडक्टर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स निवेश प्रभाग
4. सेमीकॉन इंडिया (SemiconIndia) आधिकारिक राष्ट्रीय सम्मेलन एवं शोध पोर्टल
5. सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री एसोसिएशन (SIA Global Industry Reports)
6. सेमी (SEMI) अंतरराष्ट्रीय सेमीकंडक्टर विनिर्माण एवं आपूर्ति श्रृंखला संघ
पारंपरिक आयात निर्भरता बनाम भारत के घरेलू सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र का तुलनात्मक विश्लेषण
भारत के पिछले दशकों के सेमीकंडक्टर परिदृश्य और वर्तमान इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत विकसित हो रहे आत्मनिर्भर मॉडल के बीच के गुणात्मक और रणनीतिक अंतर को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहां पूर्व में भारत केवल विदेशी चिप्स का मूक आयातक और उपभोक्ता था, वहीं अब वह संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में विनिर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है।
नीचे दी गई तुलनात्मक तालिका भारत की पूर्ववर्ती आयात निर्भरता और वर्तमान इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन की प्रमुख उपलब्धियों, रणनीतियों और राष्ट्रीय प्रभावों का स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत करती है:
| प्रमुख मापदंड (Parameter) | पूर्ववर्ती आयात निर्भरता (2020 से पूर्व) | इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (वर्तमान मॉडल) |
|---|---|---|
| वेफर फैब्रिकेशन क्षमता (Fab) | शून्य वाणिज्यिक फैब (केवल इसरो/डीआरडीओ की सीमित लैब) | धोलेरा में टाटा-पीएसएमसी का ₹91,000 करोड़ का मेगा वाणिज्यिक फैब |
| पैकेजिंग एवं टेस्टिंग (ATMP/OSAT) | चीन, ताइवान और वियतनाम पर 100 प्रतिशत निर्भरता | माइक्रोन, टाटा (असम) और सीजी-रेनेसास के 4 आधुनिक प्लांट्स निर्माणाधीन |
| सरकारी वित्तीय प्रोत्साहन | अस्पष्ट, टुकड़ों में नीति और भारी नौकरशाही अड़चनें | ₹76,000 करोड़ का समर्पित बजट, 50% प्रत्यक्ष पूंजीगत व्यय अनुदान |
| घरेलू स्टार्ट-अप्स एवं आईपी (IP) | केवल विदेशी कंपनियों के लिए सेवा/आउटसोर्सिंग कार्य | डीएलआई योजना के तहत स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर (शक्ति, वेगा) व 30+ स्टार्ट-अप्स |
| सामरिक एवं रक्षा आत्मनिर्भरता | आपूर्ति श्रृंखला संकट या प्रतिबंधों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील | मिलिट्री-ग्रेड चिप्स का घरेलू उत्पादन, पूर्ण रणनीतिक स्वायत्तता |
यह तुलनात्मक विश्लेषण प्रमाणित करता है कि भारत ने केवल आयात प्रतिस्थापन का लक्ष्य नहीं रखा है, बल्कि वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला का एक अपरिहार्य और विश्वसनीय वैश्विक भागीदार बनने का दीर्घकालिक ढांचा तैयार कर लिया है।
कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स (Compound Semiconductors): सिलिकॉन से परे की नई क्रांति
पारंपरिक सेमीकंडक्टर चिप्स जहां शुद्ध सिलिकॉन (Silicon) पर आधारित होते हैं, वहीं उच्च वोल्टेज, तीव्र गर्मी और अत्यधिक उच्च आवृत्ति वाले आधुनिक अनुप्रयोगों के लिए ‘कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स’ (जैसे गैलियम नाइट्राइड – GaN और सिलिकॉन कार्बाइड – SiC) तकनीकी भविष्य की नई रीढ़ बन चुके हैं।
कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स के अद्वितीय लाभ और भारत में इनका विस्तार:
1. इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) और फास्ट चार्जिंग: सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) चिप्स इलेक्ट्रिक वाहनों के इनवर्टर और बैटरी प्रबंधन में ऊर्जा की बर्बादी को 70 प्रतिशत तक घटा देते हैं जिससे ईवी की रेंज 10 से 15 प्रतिशत बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त गैलियम नाइट्राइड (GaN) चार्जर पारंपरिक सिलिकॉन चार्जर से आकार में एक-तिहाई होते हैं और लैपटॉप व फोन को कुछ ही मिनटों में चार्ज कर देते हैं।
2. 5जी/6जी टेलीकॉम टावर्स और रडार: उच्च आवृत्ति पर अत्यधिक कुशल संचालन के कारण रक्षा रडार और 5जी बेस स्टेशनों में GaN चिप्स अनिवार्य हैं।
3. भारत में निवेश: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत ऐसी इकाइयों को 50 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी दी जा रही है। साणंद में सिचैम (SiChem) और कई घरेलू स्टार्ट-अप्स कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने की दिशा में तेजी से अग्रसर हैं।
सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला का सहायक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem Enablers)
एक सेमीकंडक्टर फैब कभी अकेले काम नहीं कर सकता। इसके सुचारु संचालन के लिए सैकड़ों विशेष रसायनों, गैसों और सहायक उपकरणों के विशाल औद्योगिक नेटवर्क की आवश्यकता होती है जिसे ‘सपोर्टिंग इकोसिस्टम’ कहा जाता है:
1. इलेक्ट्रॉनिक ग्रेड विशेष गैसें और रसायन: सिलिकॉन वेफर की नक्काशी और सफाई के लिए अल्ट्रा-प्योर नाइट्रोजन, आर्गन, हाइड्रोजन, अमोनिया, और अत्यधिक शुद्ध हाइड्रोफ्लोरिक एसिड की आवश्यकता होती है। गुजरात और महाराष्ट्र में रासायनिक कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के विशेष इलेक्ट्रॉनिक केमिकल्स बनाने के संयंत्र लगा रही हैं।
2. क्लीनरूम इंफ्रास्ट्रक्चर और वाइब्रेशन-फ्री कंक्रीट: फैब भवनों का निर्माण साधारण कंक्रीट से नहीं होता। नैनोमीटर स्तर की लिथोग्राफी मशीनों को जमीन के सूक्ष्म से सूक्ष्म कंपन से बचाने के लिए विशेष एंटी-वाइब्रेशन कंक्रीट पाइलिंग की जाती है।
3. उन्नत परीक्षण और पैकेजिंग उपकरण: सब-माइक्रोन स्तर की वेफर प्रोबिंग और स्वचालित ऑप्टिकल निरीक्षण (AOI) उपकरण प्रदान करने वाली वैश्विक सहायक कंपनियां (जैसे Applied Materials, Lam Research, KLA) ने भारत में अपने इंजीनियरिंग उत्कृष्टता केंद्र स्थापित कर लिए हैं। एप्लाइड मैटेरियल्स ने बेंगलुरु में 400 मिलियन डॉलर के निवेश से एक विशाल सेमीकंडक्टर उपकरण डिजाइन केंद्र शुरू किया है।
डिजाइन-लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना और भारतीय फैबलेस स्टार्ट-अप्स
सेमीकंडक्टर विनिर्माण में अरबों डॉलर के पूंजीगत निवेश की आवश्यकता होती है, परंतु ‘चिप डिजाइन’ (Fabless Design) केवल बौद्धिक प्रतिभा, सॉफ्टवेयर टूल्स और कंप्यूटर पर किया जाता है। भारत के पास विश्व की सबसे प्रतिभाशाली सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग फौज है। इस शक्ति का उपयोग करने के लिए सरकार ने 1,000 करोड़ रुपये की ‘डिजाइन-लिंक्ड इंसेंटिव’ (DLI) योजना शुरू की है।
डीएलआई योजना की मुख्य विशेषताएं:
1. उत्पाद डिजाइन प्रोत्साहन (Product Design Incentive): पात्र घरेलू स्टार्ट-अप्स को उनके द्वारा डिजाइन किए गए सेमीकंडक्टर उत्पाद के शुद्ध बिक्री कारोबार (Net Sales Turnover) का 4 से 6 प्रतिशत प्रत्यक्ष नकद प्रोत्साहन दिया जाता है।
2. ईडीए टूल्स और वेफर फैब्रिकेशन सब्सिडी: एक नए स्टार्ट-अप के लिए लाखों डॉलर के ईडीए सॉफ्टवेयर खरीदना और ताइवान या यूरोप में अपनी पहली चिप का प्रोटोटाइप (Tape-out) बनाना असंभव होता है। डीएलआई योजना के तहत सरकार स्टार्ट-अप्स के पहले प्रोटोटाइप टेप-आउट का 50 प्रतिशत तक खर्च स्वयं वहन करती है।
3. माइंडग्रोव और मोरफिंग टेक्नोलॉजीज: भारत के कई घरेलू स्टार्ट-अप्स—जैसे आईआईटी मद्रास इनक्यूबेटेड ‘माइंडग्रोव’ (Mindgrove Technologies)—ने भारत की पहली स्वदेशी 28nm उच्च-प्रदर्शन सिक्योर माइक्रोकंट्रोलर चिप ‘सिक्योर कनेक्ट’ (SecureIoT) डिजाइन कर वैश्विक बाजार में उतारी है। यह भारत के फैबलेस चिप डिजाइन क्रांति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में भारत की छलांग: मोबाइल फोन से लैपटॉप तक
सेमीकंडक्टर मिशन भारत के विशाल ‘इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण’ (Electronics System Design and Manufacturing – ESDM) क्रांति का शीर्ष मुकुट है। वर्ष 2014 में भारत में बिकने वाले 78 प्रतिशत मोबाइल फोन विदेशों से आयात होते थे और देश में मात्र 2 मोबाइल विनिर्माण इकाइयां थीं।
आज उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI Scheme for Large Scale Electronics) की सफलता के कारण परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है:
1. विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता: भारत अब विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता देश बन चुका है। देश में 200 से अधिक मोबाइल विनिर्माण संयंत्र चल रहे हैं।
2. एप्पल आईफोन (Apple iPhone) का विनिर्माण केंद्र: विश्व भर में बिकने वाले प्रत्येक सात आईफोन में से एक आईफोन का निर्माण अब भारत (फॉक्सकॉन, पेगाट्रॉन और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के तमिलनाडु व कर्नाटक संयंत्रों) में हो रहा है।
3. इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में भारी उछाल: भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 30 अरब डॉलर को पार कर चुका है। अब सरकार ने ‘आईटी हार्डवेयर पीएलआई 2.0’ के माध्यम से लैपटॉप, टैबलेट, सर्वर और पीसी के घरेलू विनिर्माण के लिए एचपी, डेल, लेनोवो और एसर जैसी वैश्विक कंपनियों को भारत में उत्पादन शुरू करने के लिए आकर्षित किया है। जब ये सभी उपकरण भारत में बनेंगे, तो इनमें लगने वाली चिप्स भी भारत के अपने फैब प्लांट्स से ही आपूर्ति की जाएंगी।
भू-रणनीतिक सुरक्षा: क्रिटिकल मिनरल्स और चिप आपूर्ति की आत्मनिर्भरता
सेमीकंडक्टर विनिर्माण केवल फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों (Critical Minerals) जैसे सिलिकॉन, गैलियम, जर्मेनियम, लिथियम, और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Elements – REEs) पर नियंत्रण अनिवार्य है। वर्तमान समय में चीन वैश्विक गैलियम और जर्मेनियम उत्पादन के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से को नियंत्रित करता है और उसने भू-राजनीतिक तनाव के चलते इनके निर्यात पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं।
भारत ने इस खतरे को भांपते हुए बहुआयामी रणनीतिक कदम उठाए हैं:
1. क्रिटिकल मिनरल्स मिशन: खान मंत्रालय ने 30 महत्वपूर्ण खनिजों की पहचान कर उनकी घरेलू खोज और नीलामी की प्रक्रिया तेज कर दी है।
2. खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL): भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी काबिल ने अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में लिथियम और कोबाल्ट की खदानों के अधिग्रहण के ऐतिहासिक समझौते किए हैं।
3. मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप (MSP): अमेरिका के नेतृत्व वाले 14 देशों के वैश्विक गठबंधन में भारत एक प्रमुख भागीदार बन गया है जिसका उद्देश्य सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित और पारदर्शी वैश्विक आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
भारत सेमीकंडक्टर अनुसंधान केंद्र (ISRC) और वैश्विक अनुसंधान नेटवर्क
केवल विनिर्माण कारखाने लगाना पर्याप्त नहीं है जब तक कि भारत अगली पीढ़ी के मौलिक तकनीकी अनुसंधानों में अग्रणी न हो। इसके लिए केंद्र सरकार ने बेल्जियम के विश्व-विख्यात आईमैक (IMEC), ताइवान के आईटीआरआई (ITRI) और अमेरिका के अल्बानी नैनोटेक कॉम्प्लेक्स की तर्ज पर ‘भारत सेमीकंडक्टर अनुसंधान केंद्र’ (India Semiconductor R&D Centre – ISRC) की स्थापना को अंतिम मंजूरी दी है।
आईएसआरसी के प्रमुख रणनीतिक अनुसंधान क्षेत्र:
1. बियॉन्ड-सिलिकॉन नैनोमटेरियल्स: सिलिकॉन की भौतिक सीमाओं (Physical Limits) को पार करने के लिए कार्बन नैनोट्यूब्स (CNTs), द्वि-आयामी पदार्थ (Graphene, MoS2) और स्पिनट्रॉनिक्स (Spintronics) पर उन्नत अनुसंधान।
2. क्वांटम कंप्यूटिंग चिप्स: सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट्स और फोटोनिक चिप्स का डिजाइन जो भविष्य के क्वांटम कंप्यूटरों को शक्ति प्रदान करेंगे।
3. उन्नत 3डी पैकेजिंग और चिपलेट्स (Chiplets): अलग-अलग कार्यों वाली छोटी-छोटी चिप्स को एक ही सिलिकॉन इंटरपोजर पर 3डी स्टैकिंग द्वारा जोड़कर बिजली की खपत को आधा करना और प्रदर्शन को दोगुना करना।
सेमीकंडक्टर विनिर्माण में पर्यावरण प्रबंधन: जल पुनर्चक्रण और शून्य कार्बन लक्ष्य
एक बड़े सेमीकंडक्टर फैब प्लांट को प्रतिदिन 20 से 30 लाख गैलन अत्यधिक शुद्ध जल (Ultra-Pure Water) की आवश्यकता होती है, और उत्पादन प्रक्रिया में जटिल रसायनों व फ्लोरीनेटेड ग्रीनहाउस गैसों का उपयोग होता है। भारत सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि भारतीय सेमीकंडक्टर संयंत्र पर्यावरण-अनुकूल और धारणीय (Sustainable) हरित मानकों पर काम करें।
पर्यावरण संरक्षण के कड़े उपाय:
1. 90 प्रतिशत जल पुनर्चक्रण (Zero Liquid Discharge – ZLD): धोलेरा और साणंद के संयंत्रों में प्रयुक्त जल को उन्नत रिवर्स ऑस्मोसिस और थर्मल इवैपोरेशन द्वारा 90 प्रतिशत से अधिक पुनर्चक्रित कर पुनः उपयोग में लाया जाएगा जिससे स्थानीय भूजल पर कोई दबाव न पड़े।
2. हरित ऊर्जा से संचालन: फैब संयंत्रों को 24 घंटे स्थिर बिजली देने के लिए गुजरात और असम में विशाल सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा पार्कों के साथ ग्रिड कनेक्टिविटी स्थापित की जा रही है।
3. ई-कचरा और खतरनाक अपशिष्ट का सुरक्षित निस्तारण: वेफर नक्काशी से निकलने वाले अम्लीय रसायनों और भारी धातुओं का वैज्ञानिक उदासीनीकरण (Neutralization) और अंतरराष्ट्रीय बेसल कन्वेंशन के मानकों के तहत सुरक्षित पुनर्चक्रण।
ऑटोमोटिव चिप संकट और भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग की आत्मनिर्भरता
वर्ष 2021-22 में जब वैश्विक चिप की कमी हुई, तो भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग को भारी संकट का सामना करना पड़ा था। मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा और हुंडई की आधुनिक कारों की डिलीवरी के लिए ग्राहकों को 1 से 2 वर्ष तक का लंबा इंतजार करना पड़ा था, जिसके कारण उद्योग को अरबों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ था।
घरेलू फैब प्लांट्स इस संकट का स्थायी समाधान प्रस्तुत करते हैं:
1. स्वदेशी ऑटोमोटिव चिप्स: धोलेरा में बनने वाली 28nm और 40nm चिप्स सीधे तौर पर इंजन कंट्रोल यूनिट्स (ECU), एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS), और एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) में लगाई जाएंगी।
2. ईवी बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम्स (BMS): भारतीय जलवायु और 50 डिग्री तापमान के अनुकूल विशेष थर्मल-रेसिस्टेंट चिप्स का विकास किया जा रहा है जो इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों में आग लगने के जोखिम को पूरी तरह समाप्त करती हैं।
3. आपूर्ति की गारंटी: भारतीय वाहन निर्माताओं को अब चिप्स के लिए ताइवान या चीन के समुद्री जहाजों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे वाहनों की लागत घटेगी और उपभोक्ताओं को बिना देरी के त्वरित डिलीवरी मिलेगी।
एआई हार्डवेयर क्रांति: जीपीयू (GPU), एनपीयू (NPU) और भाषाई एआई चिप्स
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) के इस नए युग में पारंपरिक सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट्स (CPUs) अप्रभावी सिद्ध हो रहे हैं। आज दुनिया को समानांतर गणना करने वाले ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) और न्यूरल प्रोसेसिंग यूनिट्स (NPUs) की आवश्यकता है।
भारत की एआई हार्डवेयर पहल:
1. इंडियाएआई सॉवरेन कंप्यूट इन्फ्रास्ट्रक्चर: केंद्र सरकार ने 10,000 जीपीयू का राष्ट्रीय क्लस्टर स्थापित करने के लिए निविदाएं जारी की हैं। इसके साथ ही घरेलू सेमीकंडक्टर डिजाइनरों को भारत की अपनी कस्टम एआई चिप्स बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
2. ‘भाषिणी’ (Bhashini AI) के लिए विशिष्ट सिलिकॉन एक्सीलरेटर्स: भारत के बहुभाषी परिवेश को ध्यान में रखते हुए 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं में आवाज से आवाज (Voice-to-Voice) रियल-टाइम अनुवाद करने वाली लो-पावर एआई चिप्स का निर्माण किया जा रहा है जो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के फीचर फोनों में भी बिना इंटरनेट के स्थानीय स्तर पर चल सकेंगी।
सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में साइबर सुरक्षा और हार्डवेयर ट्रोजन का खतरा
आधुनिक रक्षा प्रणालियों और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे (जैसे पावर ग्रिड, एयर ट्रैफिक कंट्रोल, परमाणु रिएक्टर) में विदेशी चिप्स का अंधाधुंध उपयोग एक भीषण राष्ट्रीय सुरक्षा भेद्यता प्रस्तुत करता है। ‘हार्डवेयर ट्रोजन’ (Hardware Trojan) एक ऐसा सूक्ष्म, दुर्भावनापूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सर्किट होता है जिसे चिप निर्माण के दौरान सिलिकॉन वेफर पर जानबूझकर छिपा दिया जाता है।
यह हार्डवेयर ट्रोजन सामान्य परिस्थितियों में पूरी तरह निष्क्रिय रहता है और किसी भी सॉफ्टवेयर एंटीवायरस या फायरवॉल द्वारा नहीं पकड़ा जा सकता। परंतु युद्ध या आपातकाल के समय शत्रु देश द्वारा एक विशेष रेडियो सिग्नल या पासवर्ड भेजते ही यह सक्रिय हो जाता है और संवेदनशील गोपनीय डेटा चुरा सकता है या पूरी मिसाइल प्रणाली को हवा में ही निरस्त कर सकता है। भारत का घरेलू फैब प्लांट स्थापित करने का सबसे बड़ा सामरिक उद्देश्य यही है कि देश के रक्षा बलों को ‘सत्यापित और सुरक्षित’ (Trusted and Verified Silicon) चिप्स मिल सकें जिनकी आपूर्ति श्रृंखला पर भारत का 100 प्रतिशत संप्रभु नियंत्रण हो।
राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा: गुजरात, असम, तमिलनाडु और ओडिशा की नीतियां
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन की एक अत्यंत प्रेरक विशेषता यह है कि इसने भारतीय राज्यों के बीच उच्च-तकनीकी निवेश आकर्षित करने की एक सकारात्मक और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Competitive Federalism) को जन्म दिया है:
1. गुजरात सेमीकंडक्टर नीति (2022-2027): गुजरात देश का पहला राज्य बना जिसने एक समर्पित सेमीकंडक्टर नीति घोषित की। राज्य सरकार ने धोलेरा और साणंद में निवेशकों को भूमि आवंटन पर 75 प्रतिशत सब्सिडी, पहले 5 वर्षों के लिए 2 रुपये प्रति यूनिट बिजली सब्सिडी, और 10 वर्षों तक पानी के शुल्क पर शत-प्रतिशत सब्सिडी की पेशकश की। यही कारण है कि माइक्रोन और टाटा दोनों ने गुजरात को अपनी पहली पसंद बनाया।
2. असम की औद्योगिक छलांग: असम सरकार द्वारा टाटा के 27,000 करोड़ रुपये के ओसैट प्रोजेक्ट को मंजूरी दिलाना पूर्वोत्तर भारत के इतिहास में सबसे बड़ी निजी औद्योगिक उपलब्धि है। इसने यह सिद्ध कर दिया कि सेमीकंडक्टर क्रांति केवल पश्चिमी या दक्षिणी भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्वोत्तर भी वैश्विक चिप विनिर्माण का केंद्र बन सकता है।
3. तमिलनाडु, कर्नाटक और ओडिशा: तमिलनाडु सरकार ने पेरुंगुडी में चिप डिजाइन पार्क बनाया है, कर्नाटक ने सेमीकंडक्टर पैकेजिंग के लिए विशेष इंसेंटिव पैकेज पेश किया है, और ओडिशा ने ‘सिलिकॉन सेतु’ अभियान के तहत कई अंतरराष्ट्रीय सेमीकंडक्टर फैबलेस कंपनियों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं। राज्यों की यह सक्रियता देश में चिप क्रांति को अप्रत्याशित गति प्रदान कर रही है।
वैश्विक चिप युद्ध और भारत की रणनीतिक तटस्थता
अमेरिका और चीन के बीच जारी ‘चिप युद्ध’ (Chip War) और अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए कड़े तकनीकी निर्यात प्रतिबंधों ने वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स परिदृश्य में भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। ऐसे संवेदनशील समय में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, स्थिर लोकतांत्रिक शासन प्रणाली, सुदृढ़ कानूनी ढांचा और विशाल घरेलू उपभोक्ता बाजार इसे विश्व की दिग्गज कंपनियों के लिए सबसे सुरक्षित और तटस्थ निवेश गंतव्य बनाते हैं। भारत किसी भी भू-राजनीतिक गुटबाजी का मोहरा बने बिना पश्चिमी देशों (अमेरिका, जापान, नीदरलैंड) से उन्नत तकनीक का हस्तांतरण प्राप्त कर रहा है और साथ ही अपनी संप्रभु विनिर्माण क्षमता को अभेद्य बना रहा है। यह बहुध्रुवीय कूटनीति भारत को 2030 तक वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला का एक अनिवार्य ध्रुव बना देगी।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए नए औद्योगिक अवसर
सेमीकंडक्टर फैब और ओसैट प्लांट्स की स्थापना से देश के हजारों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए अभूतपूर्व व्यापारिक अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। सटीक मशीनिंग (Precision Tooling), प्लास्टिक मोल्डिंग, उच्च-शुद्धता पैकेजिंग सामग्री, पीसीबी (Printed Circuit Board) असेंबली, और लॉजिस्टिक्स में सैकड़ों भारतीय एमएसएमई इन मेगा फैब्स के विश्वसनीय स्थानीय आपूर्तिकर्ता (Tier-2 & Tier-3 Suppliers) बन रहे हैं। सरकार द्वारा एमएसएमई को क्लस्टर विकास और आसान कार्यशील पूंजी ऋण की सुविधा दी जा रही है जिससे जमीनी स्तर पर विनिर्माण संस्कृति मजबूत हो रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) का कुल वित्तीय परिव्यय कितना है?
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के लिए भारत सरकार ने 76,000 करोड़ रुपये (लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर) का प्रत्यक्ष प्रोत्साहन कोष स्वीकृत किया है। इसके अंतर्गत पात्र विनिर्माण परियोजनाओं को कुल पूंजीगत व्यय का 50 प्रतिशत तक केंद्र सरकार द्वारा सीधे अनुदान के रूप में दिया जाता है।
2. भारत का पहला वाणिज्यिक सेमीकंडक्टर फैब प्लांट कहां स्थापित हो रहा है?
भारत का पहला पूर्ण वाणिज्यिक सिलिकॉन वेफर फैब प्लांट गुजरात के धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (Dholera SIR) में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पीएसएमसी (PSMC) कंपनी के संयुक्त सहयोग से 91,000 करोड़ रुपये के निवेश से स्थापित किया जा रहा है।
3. फैब (Fab) और ओसैट (OSAT/ATMP) में क्या अंतर है?
फैब (Fabrication Facility) वह जटिल संयंत्र है जहां कच्चे सिलिकॉन वेफर पर फोटोलिथोग्राफी और रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा ट्रांजिस्टर्स और नैनोस्केल सर्किट्स बनाए जाते हैं। जबकि ओसैट (OSAT – Outsourced Semiconductor Assembly and Test) उस तैयार वेफर से चिप्स को काटकर उनकी सुरक्षात्मक पैकेजिंग, वायरिंग और कार्यक्षमता की अंतिम जांच करता है।
4. क्या भारत में बनी चिप्स का उपयोग विदेशी बाजारों में भी होगा?
हां, बिल्कुल। साणंद में बन रहे माइक्रोन के मेमोरी चिप प्लांट और टाटा के असम प्लांट में बनने वाली चिप्स का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका, यूरोप और जापान सहित वैश्विक बाजारों में निर्यात किया जाएगा।
5. सेमीकंडक्टर उद्योग में पानी और बिजली की इतनी भारी आवश्यकता क्यों होती है?
सिलिकॉन वेफर्स की नैनोमीटर स्तर पर सफाई के लिए ‘अल्ट्रा-प्योर वॉटर’ (UPW) की आवश्यकता होती है जो सामान्य डिस्टिल्ड वॉटर से भी लाखों गुना अधिक शुद्ध होता है। इसके साथ ही फैब मशीनों को 24 घंटे बिना एक मिलीसेकंड के पावर कट के स्थिर बिजली की आवश्यकता होती है, जिसके लिए धोलेरा और साणंद में समर्पित पावर ग्रिड और जल शोधन संयंत्र बनाए गए हैं।
6. शक्ति (Shakti) और वेगा (Vega) क्या हैं?
शक्ति और वेगा भारत के स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए ओपन-सोर्स आरआईएससी-वी (RISC-V) आर्किटेक्चर आधारित माइक्रोप्रोसेसर हैं। शक्ति को आईआईटी मद्रास द्वारा और वेगा को सी-डैक (C-DAC) द्वारा विकसित किया गया है। इनका उपयोग रणनीतिक अनुप्रयोगों, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और स्मार्ट मीटरों में किया जा रहा है।
7. क्या सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत ताइवान और चीन को टक्कर दे सकता है?
ताइवान का 3nm और 2nm के सबसे उन्नत नोड्स पर एकाधिकार है। भारत की रणनीति ताइवान से सीधे प्रतिस्पर्धा करने के बजाय 28nm से 90nm के ‘परिपक्व नोड्स’ (Mature Nodes) पर केंद्रित है जिनकी वैश्विक ऑटोमोटिव, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और आईओटी बाजार में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी है। भारत वैश्विक कंपनियों के लिए चीन का सबसे विश्वसनीय लोकतांत्रिक विकल्प बन रहा है।
8. सेमीकंडक्टर उद्योग से भारत में कितने रोजगार सृजित होंगे?
अनुमानों के अनुसार अगले पांच से सात वर्षों में सेमीकंडक्टर फैब, ओसैट प्लांट्स और सहायक रसायनों व उपकरणों के उद्योगों के माध्यम से भारत में लगभग 1 लाख से अधिक उच्च-कौशल वाले प्रत्यक्ष रोजगार और 3 लाख से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे।
निष्कर्ष: सिलिकॉन संप्रभुता से विकसित भारत 2047 का निर्माण
इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रों की शक्ति अब केवल उनकी सीमाओं के विस्तार या सेनाओं के आकार से नहीं, बल्कि उनकी ‘सिलिकॉन संप्रभुता’ (Silicon Sovereignty) से मापी जाएगी। जिस प्रकार बीसवीं सदी में औद्योगिक क्रांति से चूके देशों को दशकों तक औपनिवेशिक निर्भरता का दंश झेलना पड़ा था, भारत इक्कीसवीं सदी की सेमीकंडक्टर क्रांति से किसी भी कीमत पर पीछे नहीं रह सकता। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन केवल फैक्टरियां लगाने या सब्सिडी बांटने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ भारतीयों के तकनीकी स्वाभिमान और भविष्य की रणनीतिक स्वतंत्रता की अमर उद्घोषणा है। धोलेरा की धरती पर जब पहली स्वदेशी सिलिकॉन वेफर चमकेगी और जब ‘मेड इन इंडिया’ चिप्स विश्व के सबसे उन्नत कंप्यूटरों और उपग्रहों को संचालित करेंगी, तो वह दिन स्वतंत्र भारत के तकनीकी इतिहास का सबसे स्वर्णिम दिन होगा। सेमीकंडक्टर क्रांति, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और असीम भारतीय युवा प्रतिभा का यह संगम ‘विकसित भारत 2047’ के महान राष्ट्रीय स्वप्न को साकार करने का सबसे शक्तिशाली इंजन सिद्ध होगा।

