वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति शृंखला के व्यवधानों के इस अभूतपूर्व युग में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तीव्र गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में चमकती हुई मशाल बनकर उभरी है। लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के साथ भारत आज ब्रिटेन को पीछे छोड़कर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का गौरव प्राप्त कर चुका है और वैश्विक आर्थिक अनुमानों के अनुसार आगामी कुछ ही वर्षों में जर्मनी और जापान को पीछे धकेलकर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है। भारत सरकार द्वारा निर्धारित ‘5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था’ (5 Trillion Dollar Economy) का लक्ष्य केवल एक संख्यात्मक सांख्यिकी नहीं है, बल्कि यह देश के 1.4 अरब नागरिकों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने, प्रति व्यक्ति आय को दोगुना करने, आधुनिक विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे का निर्माण करने और भारत को ‘विकसित भारत 2047’ के राष्ट्रीय संकल्प तक पहुंचाने का ऐतिहासिक आर्थिक महाअभियान है।
इस आर्थिक रूपांतरण की नींव भारत के तीन प्रमुख क्षेत्रों—कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र—के संरचनात्मक आधुनिकीकरण पर टिकी है। जहां सेवा क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से भारत की जीडीपी का 54 प्रतिशत से अधिक योगदान देकर वैश्विक आईटी और डिजिटल निर्यात का सिरमौर बना हुआ है, वहीं ‘मेक इन इंडिया’ और 14 प्रमुख क्षेत्रों में लागू 1.97 लाख करोड़ रुपये की ‘उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन’ (PLI) योजनाओं ने भारत को वैश्विक विनिर्माण का नया केंद्र बना दिया है। इसके साथ ही ‘पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान’ और 111 लाख करोड़ रुपये की ‘राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन’ (NIP) देश के लॉजिस्टिक्स लागत को वैश्विक मानकों पर लाने के लिए एक्सप्रेसवे, फ्रेट कॉरिडोर और आधुनिक बंदरगाहों का जाल बिछा रही है। इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास गाथा, मुद्रास्फीति प्रबंधन, राजकोषीय समेकन, निर्यात विविधीकरण, जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend), एमएसएमई क्षेत्र और 5 ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का संपूर्ण आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक यात्रा: 1991 के संकट से 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था तक
भारत की वर्तमान आर्थिक मजबूती को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक विकास क्रम का पुनरावलोकन अनिवार्य है। स्वतंत्रता के पश्चात चार दशकों तक भारत तथाकथित ‘हिंदू वृद्धि दर’ (लगभग 3.5 प्रतिशत वार्षिक) की मंद गति से आगे बढ़ा जहां लाइसेंस राज, अत्यधिक विनियामक नियंत्रण और सार्वजनिक क्षेत्र के अकुशल एकाधिकार ने निजी उद्यमिता को दबाए रखा था। 1991 में जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र दो सप्ताह के आयात के बराबर रह गया था और देश को अपना सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखना पड़ा था, तब तत्कालीन सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के युगांतरकारी आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।
1991 के सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के द्वारों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया। सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से सॉफ्टवेयर और दूरसंचार में असाधारण उछाल आया। पिछले एक दशक में भारत ने संरचनात्मक सुधारों की एक नई शृंखला आरंभ की है जिसमें वस्तु एवं सेवा कर (GST – एक राष्ट्र, एक कर), दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), कॉर्पोरेट कर दरों में कटौती, बैंकों का विलय और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की ऐतिहासिक सफाई शामिल है। इन व्यापक सुधारों के फलस्वरूप भारतीय बैंकिंग प्रणाली आज पिछले कई दशकों में अपने सबसे मजबूत और स्वस्थ वित्तीय स्वास्थ्य के स्तर पर पहुंच चुकी है। आधिकारिक आर्थिक समीक्षा और नीतिगत प्राथमिकताओं का विस्तृत अध्ययन वित्त मंत्रालय भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध है।
विनिर्माण क्षेत्र का पुनर्जागरण: मेक इन इंडिया और पीएलआई योजनाएं
किसी भी विशाल जनसंख्या वाले विकासशील देश के लिए विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) के बिना बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और सतत संवृद्धि संभव नहीं है। भारत ने अपने विनिर्माण क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा 17 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस विजन को साकार करने का सबसे बड़ा उत्प्रेरक ‘उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन’ (Production Linked Incentive – PLI) योजनाएं सिद्ध हुई हैं।
पीएलआई योजना ने मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में एक ऐतिहासिक चमत्कार कर दिखाया है। 2014 में जहां भारत में उपयोग होने वाले 78 प्रतिशत मोबाइल फोन विदेश से आयात होते थे, आज भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता बन चुका है और भारत में बिकने वाले 99 प्रतिशत से अधिक मोबाइल फोन ‘मेड इन इंडिया’ हैं। एप्पल अपने वैश्विक आईफोन उत्पादन का 14 प्रतिशत से अधिक अब भारत में असेंबल कर रहा है। इसी प्रकार फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल एवं ऑटो घटक, उन्नत रासायनिक सेल (ACC) बैटरी, सौर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल और विशेष इस्पात में पीएलआई ने निजी क्षेत्र से अरबों डॉलर का नया निवेश आकर्षित किया है। भारत अब केवल घरेलू उपभोग के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के लिए विनिर्माण करने वाले वैश्विक आपूर्ति शृंखला का अभिन्न अंग बन चुका है।
सेवा क्षेत्र की श्रेष्ठता: आईटी, जीसीसी और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था
भारत का सेवा क्षेत्र देश की आर्थिक समृद्धि का सबसे टिकाऊ और मजबूत इंजन है। भारत आज दुनिया की ‘बैक-ऑफिस’ से ऊपर उठकर विश्व की ‘ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर’ (GCC) और नवाचार राजधानी बन चुका है। फॉर्च्यून 500 कंपनियों में से 1,600 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने अनुसंधान, उत्पाद डिजाइन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जोखिम प्रबंधन के वैश्विक केंद्र भारत के बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और गुरुग्राम जैसे शहरों में स्थापित किए हैं।
भारत का सेवा निर्यात प्रतिवर्ष 340 अरब डॉलर से अधिक के ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुका है। पारंपरिक आईटी आउटसोर्सिंग के स्थान पर अब क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा और एंटरप्राइज एआई सॉल्यूशंस की मांग में भारी वृद्धि हुई है। इसके साथ ही पर्यटन, आतिथ्य सत्कार, विमानन, वित्तीय सेवाएं और स्वास्थ्य सेवा (मेडिकल टूरिज्म) भारत के सेवा क्षेत्र के नए विकास इंजन बनकर उभरे हैं। भारत में विश्वस्तरीय अस्पतालों में किफायती दरों पर आधुनिक चिकित्सा प्राप्त करने के लिए प्रतिवर्ष लाखों विदेशी मरीज भारत आ रहे हैं, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रचुर अर्जन हो रहा है। आर्थिक नियोजन और सतत विकास लक्ष्यों के राष्ट्रीय समन्वय का संदर्भ नीति आयोग (NITI Aayog) के आधिकारिक पोर्टल से प्राप्त किया जा सकता है।
स्वदेशी विनिर्माण का विस्तार, आधुनिक अवसंरचना और निर्यात में विविधता भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने के मुख्य आधार हैं।
कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण और खाद्य प्रसंस्करण मूल्य शृंखला
यद्यपि भारत की जीडीपी में कृषि का प्रत्यक्ष योगदान लगभग 16 से 18 प्रतिशत है, किंतु देश की 45 प्रतिशत से अधिक कार्यशील आबादी अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है। 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्रति व्यक्ति आय में तीव्र वृद्धि अपरिहार्य है।
भारत सरकार ने पारंपरिक निर्वाह कृषि को मूल्य-संवर्धित, प्रौद्योगिकी-सक्षम और बाजार-उन्मुख व्यवसाय में बदलने की बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। ‘कृषि अवसंरचना कोष’ (AIF) के तहत 1 लाख करोड़ रुपये की वित्तपोषण सुविधा कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस, सॉर्टिंग और ग्रेडिंग इकाइयों के निर्माण के लिए उपलब्ध कराई गई है। ‘प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना’ के माध्यम से मेगा फूड पार्कों की स्थापना से फसलों की कटाई के बाद होने वाले नुकसान में भारी कमी आई है। भारत दूध, दालों, जूट और मसालों का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक तथा चावल, गेहूं, फल, सब्जियों और मत्स्य पालन में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। मोटे अनाज (श्री अन्न / मिलेट्स) के वैश्विक उत्पादन और निर्यात में भारत विश्व का अगुआ बनकर उभरा है, जिससे शुष्क और वर्षा-आधारित क्षेत्रों के छोटे किसानों की आय में निरंतर वृद्धि हो रही है।
राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) और पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान
बुनियादी ढांचा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का कंकाल तंत्र होता है। भारत में लॉजिस्टिक्स लागत ऐतिहासिक रूप से जीडीपी का लगभग 13 से 14 प्रतिशत रही है, जो अमेरिका और यूरोप के 8 से 9 प्रतिशत की तुलना में भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा और गैर-प्रतिस्पर्धी बनाती थी। इस संरचनात्मक कमी को दूर करने के लिए भारत सरकार ने 111 लाख करोड़ रुपये की ‘राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन’ (NIP) आरंभ की है।
‘पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान’ 16 केंद्रीय मंत्रालयों के बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स (सड़क, रेलवे, विमानन, नौवहन, दूरसंचार) को एक एकीकृत जीआईएस-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाकर समन्वित योजना और कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है। दिल्ली-मुंबई और अमृतसर-जामनगर जैसे विश्वस्तरीय एक्सेस-नियंत्रित एक्सप्रेसवे, पूर्वी और पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) मालगाड़ियों की गति को 25 किमी प्रति घंटे से बढ़ाकर 75 किमी प्रति घंटे कर रहे हैं। ‘भारतमाला’ के तहत राजमार्गों का विस्तार, ‘सागरमाला’ के तहत बंदरगाहों का आधुनिकीकरण और अंतर्देशीय जलमार्गों का विकास तथा ‘उड़ान’ योजना के तहत 100 से अधिक नए हवाई अड्डों का निर्माण देश के सुदूर क्षेत्रों को राष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला से जोड़ रहा है।
वैश्विक निर्यात रणनीति: 2 ट्रिलियन डॉलर का राष्ट्रीय निर्यात लक्ष्य
भारत सरकार ने 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं के कुल निर्यात को 2 ट्रिलियन डॉलर (1 ट्रिलियन डॉलर वस्तुएं और 1 ट्रिलियन डॉलर सेवाएं) तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। भारत का कुल निर्यात हाल ही में 775 अरब डॉलर के सर्वकालिक रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुका है।
भारत की निर्यात टोकरी (Export Basket) में एक महत्वपूर्ण गुणात्मक परिवर्तन देखा जा रहा है। जहां पहले भारत मुख्य रूप से कच्चा माल और कम मूल्य वाले कृषि उत्पाद निर्यात करता था, आज भारत परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स (विशेष रूप से स्मार्टफोन), इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स, रक्षा उपकरण (ब्रह्मोस मिसाइल, पिनाका रॉकेट, आर्टिलरी गन), और रासायनिक उत्पादों का प्रमुख वैश्विक निर्यातक बन चुका है। ‘डिस्ट्रिक्ट्स एज एक्सपोर्ट हब्स’ (DEH) पहल के माध्यम से देश के प्रत्येक जिले के विशिष्ट उत्पादों (एक जिला, एक उत्पाद – ODOP) को अंतरराष्ट्रीय ई-कॉमर्स और व्यापार मेलों से जोड़ा जा रहा है जिससे स्थानीय कारीगरों और छोटे उद्यमियों को विदेशी मुद्रा अर्जन का सीधा लाभ मिल रहा है।
जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) और कौशल विकास
भारत की सबसे बड़ी और अतुलनीय आर्थिक शक्ति उसका ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) है। जहां चीन, जापान, यूरोप और अमेरिका की आबादी तेजी से वृद्ध हो रही है और वहां कार्यशील श्रम बल सिकुड़ रहा है, वहीं भारत की औसत आयु मात्र 28 वर्ष है। भारत के पास 65 प्रतिशत से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। अगले तीन दशकों तक भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा युवा और कार्यशील कार्यबल उपलब्ध रहेगा।
किंतु इस जनसांख्यिकीय वरदान को वास्तविक आर्थिक संवृद्धि में बदलने के लिए कार्यबल का उच्च-स्तरीय कौशल विकास अनिवार्य है। ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ (PMKVY) और ‘नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (NEP 2020) के माध्यम से शिक्षा को रटने की व्यवस्था से मुक्त कर व्यावसायिक कौशल, कोडिंग, डेटा साइंस, रोबोटिक्स और औद्योगिक इंटर्नशिप से जोड़ा जा रहा है। भारत के युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं बल्कि ‘स्टार्टअप इंडिया’ के माध्यम से रोजगार सृजक (Job Creator) बनने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसके फलस्वरूप देश में 1.25 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स और 110 से अधिक यूनिकॉर्न्स कार्यरत हैं।
मुद्रास्फीति नियंत्रण, मौद्रिक नीति और राजकोषीय समेकन
अत्यधिक आर्थिक संवृद्धि तभी टिकाऊ हो सकती है जब मूल्य स्थिरता (Price Stability) और राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) अक्षुण्ण रहे। भारतीय रिजर्व बैंक की ‘मौद्रिक नीति समिति’ (MPC) ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत (प्लस/माइनस 2 प्रतिशत) के दायरे में रखने की लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FDI) रूपरेखा को सफलतापूर्वक संचालित किया है। जब अमेरिका और यूरोप में मुद्रास्फीति 40 वर्षों के उच्चतम स्तर (9 से 10 प्रतिशत) पर पहुंच गई थी, भारत ने सक्रिय आपूर्ति प्रबंधन और सटीक ब्याज दर समायोजन के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखा।
दूसरी ओर केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.5 प्रतिशत से नीचे लाने के राजकोषीय समेकन रोडमैप का कड़ाई से पालन किया है। सरकार ने अपने राजस्व व्यय (रेवेन्यू एक्सपेंडिचर) पर अंकुश लगाते हुए पूंजीगत व्यय (कैपेक्स – Capital Expenditure) को बजट में बढ़ाकर 11.11 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचाया है। पूंजीगत व्यय में किया गया 1 रुपया अर्थव्यवस्था में 3 से 4 रुपये का गुणक प्रभाव (Multiplier Effect) उत्पन्न करता है जो निजी निवेश (क्राउडिंग-इन) को आकर्षित करता है और दीर्घकालिक उत्पादक संपत्तियों का निर्माण करता है। बैंकिंग सुधारों और वित्तीय स्थिरता पर भारतीय रिजर्व बैंक के नीतिगत दिशानिर्देशों का संपूर्ण विवरण भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पोर्टल पर उपलब्ध है।
5 ट्रिलियन डॉलर की राह में प्रमुख चुनौतियां और समाधान
5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की दिशा में अग्रसर भारत के समक्ष कुछ गंभीर संरचनात्मक चुनौतियां भी विद्यमान हैं जिनका समयबद्ध समाधान अनिवार्य है:
1. ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल का आयात बिल: भारत अपनी आवश्यकता का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है जो चालू खाता घाटे (CAD) पर भारी दबाव डालता है। इसका समाधान नवीकरणीय ऊर्जा (सौर व पवन), 20 प्रतिशत एथेनॉल संमिश्रण और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के तीव्र प्रसार में निहित है।
2. महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR): भारत में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी लगभग 37 प्रतिशत है जो वैश्विक औसत से कम है। अधिक महिलाओं को कार्यबल में लाकर, मातृत्व लाभ बढ़ाकर और कार्यस्थलों पर सुरक्षा सुनिश्चित करके भारत अपनी जीडीपी में अतिरिक्त 1 से 1.5 प्रतिशत की वार्षिक संवृद्धि जोड़ सकता है।
3. एमएसएमई क्षेत्र को औपचारिक ऋण की सुलभता: देश के 6 करोड़ से अधिक सूक्ष्म और लघु उद्यम 11 करोड़ से अधिक रोजगार प्रदान करते हैं, किंतु उन्हें समय पर पर्याप्त ऋण नहीं मिल पाता। ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) और अकाउंट एग्रीगेटर के विस्तार से इस समस्या का समाधान हो रहा है।
4. अनुसंधान एवं विकास (R&D) में कम निवेश: भारत अपनी जीडीपी का मात्र 0.7 प्रतिशत अनुसंधान और विकास पर खर्च करता है। ‘अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ (ANRF) की स्थापना के माध्यम से निजी क्षेत्र के सहयोग से 50,000 करोड़ रुपये का शोध कोष तैयार किया जा रहा है ताकि भारत तकनीकी उपभोक्ता के स्थान पर वैश्विक तकनीकी आविष्कारक बन सके।
भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख विकास इंजनों का तुलनात्मक विश्लेषण
भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचाने में कृषि, विनिर्माण, सेवा क्षेत्र और अवसंरचना विकास की भूमिकाएं परस्पर पूरक हैं। इन चारों प्रमुख स्तंभों के योगदान, विकास दर और रोजगार संभावनाओं का तुलनात्मक अवलोकन नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत किया गया है:
| आर्थिक क्षेत्र | जीडीपी में वर्तमान हिस्सा | रोजगार में हिस्सेदारी | 5 ट्रिलियन डॉलर हेतु रणनीतिक लक्ष्य |
| सेवा क्षेत्र (Services) | लगभग 54 प्रतिशत (सर्वाधिक) | लगभग 31 प्रतिशत कार्यबल | जीसीसी, एआई कंसल्टिंग, फिनटेक व हेल्थकेयर में 1 ट्रिलियन डॉलर निर्यात |
| विनिर्माण (Manufacturing) | लगभग 17 प्रतिशत | लगभग 12 प्रतिशत कार्यबल | पीएलआई द्वारा जीडीपी हिस्सा बढ़ाकर 25% करना, सेमीकंडक्टर हब बनना |
| कृषि एवं संबद्ध (Agriculture) | लगभग 16 से 18 प्रतिशत | लगभग 45 प्रतिशत (सर्वाधिक) | खाद्य प्रसंस्करण, जैविक खेती, मिलेट्स निर्यात और कृषि उत्पादकता दुगुनी करना |
| अवसंरचना (Infrastructure) | कैपेक्स जीडीपी का 3.4 प्रतिशत | निर्माण क्षेत्र में 12% कार्यबल | लॉजिस्टिक्स लागत 14% से घटाकर 8% करना, 111 लाख करोड़ का एनआईपी निवेश |
यह तुलनात्मक विश्लेषण स्पष्ट करता है कि भारत की विकास रणनीति किसी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह एक बहु-आयामी, संतुलित और समावेशी विकास मॉडल का अनुसरण कर रही है जहां प्रत्येक क्षेत्र संपूर्ण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में अपना विशिष्ट योगदान दे रहा है।
भारत का सेमीकंडक्टर मिशन: 21वीं सदी के ‘डिजिटल तेल’ पर आत्मनिर्भरता
आधुनिक औद्योगिक क्रांति में सेमीकंडक्टर चिप्स की वही भूमिका है जो 20वीं सदी में कच्चे तेल की थी। स्मार्टफोन, ऑटोमोबाइल, लड़ाकू विमान, मिसाइल, मेडिकल वेंटिलेटर से लेकर वाशिंग मशीन तक कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सिलिकॉन चिप्स के बिना कार्य नहीं कर सकता। वैश्विक चिप संकट और ताइवान पर भू-राजनीतिक निर्भरता के जोखिमों को समाप्त करने के लिए भारत सरकार ने 76,000 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (ISM) की शुरुआत की है।
गुजरात के धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पीएसएमसी के संयुक्त तत्वावधान में देश की पहली व्यावसायिक सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन (Fab) इकाई का निर्माण आरंभ हो चुका है। इसके अतिरिक्त असम के मोरीगांव और गुजरात के साणंद में माइक्रोन और सीजी पावर की विशाल चिप असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP / OSAT) इकाइयां स्थापित की जा रही हैं। यह मिशन न केवल भारत के 100 अरब डॉलर के घरेलू इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण को सुरक्षित रखेगा बल्कि भारत को सेमीकंडक्टर डिजाइन और विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाकर लाखों उच्च-कुशल इंजीनियरिंग रोजगार सृजित करेगा।
हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा संक्रांति: 2070 के नेट-जीरो की ओर आर्थिक छलांग
ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता (जो विदेशी मुद्रा भंडार पर सालाना 150 अरब डॉलर से अधिक का बोझ डालती है) को समाप्त करने के लिए भारत ने ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ आरंभ किया है। 19,744 करोड़ रुपये के परिव्यय वाले इस मिशन का उद्देश्य 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख टन (5 MMT) ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना और 125 गीगावाट की संबंधित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करना है।
हरित हाइड्रोजन का उपयोग इस्पात विनिर्माण, उर्वरक संयंत्रों, भारी ट्रकों और जहाजरानी में जीवाश्म ईंधन के स्थान पर किया जाएगा जिससे शून्य कार्बन उत्सर्जन होगा। भारत अपने प्रचुर सौर ऊर्जा संसाधनों और न्यूनतम उत्पादन लागत के बल पर यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया को ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है। यह ऊर्जा संक्रांति न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगी बल्कि भारत को ऊर्जा आयातक देश से ऊर्जा निर्यातक महाशक्ति में रूपांतरित कर देगी।
वित्तीय समावेशन और क्रेडिट बूम: फिनटेक से औपचारिक बैंकिंग एकीकरण
भारत में बैंकों की बैलेंस शीट आज पिछले दो दशकों में सबसे अधिक मजबूत और जोखिम-मुक्त स्थिति में है। गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (Gross NPA) गिरकर 2.8 प्रतिशत के बहु-वर्षीय निचले स्तर पर आ चुकी हैं और बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) 16 प्रतिशत से ऊपर बना हुआ है। बैंकिंग प्रणाली की इस अभूतपूर्व मजबूती ने देश में एक नए ‘क्रेडिट चक्र’ (Credit Cycle) को गति दी है।
औद्योगिक इकाइयों, आवास ऋण और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में ऋण की मांग में दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की जा रही है। ‘ट्रेड रिसीवेबल्स इलेक्ट्रॉनिक डिस्काउंटिंग सिस्टम’ (TReDS) ने एमएसएमई इकाइयों को बड़ी कंपनियों से बकाया भुगतान प्राप्त करने के लिए अपने इनवॉइस को ऑनलाइन नीलामी के माध्यम से त्वरित नकदी में बदलने की सुविधा दी है। सूक्ष्म वित्त संस्थानों (MFI) और स्वयं सहायता समूहों ने देश के दूरदराज के क्षेत्रों में स्वरोजगार के लिए लाखों करोड़ रुपये का सूक्ष्म ऋण वितरित किया है जिससे ग्रामीण परिवारों की क्रय शक्ति और जीवन स्तर में क्रांतिकारी सुधार हुआ है।
भारत का स्टार्ट-अप इकोसिस्टम: यूनिकॉर्न फैक्ट्री से डीप-टेक क्रांति तक
भारत आज 1.25 लाख से अधिक आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स और 110 से अधिक यूनिकॉर्न्स के साथ विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप केंद्र बन चुका है। भारतीय स्टार्टअप्स अब केवल ई-कॉमर्स या फूड डिलीवरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे ‘डीप-टेक’ (Deep-Tech) क्षेत्रों जैसे स्पेस-टेक, एग्री-टेक, बायोटेक्नोलॉजी, क्वांटम कंप्यूटिंग और रक्षा प्रौद्योगिकियों में मौलिक नवाचार कर रहे हैं।
सरकार द्वारा स्थापित 10,000 करोड़ रुपये का ‘फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स’ (FFS) और ‘स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना’ ने टियर-2 और टियर-3 शहरों के प्रतिभाशाली युवाओं को अपनी नवोन्मेषी सोच को सफल व्यावसायिक उद्यमों में बदलने का संबल दिया है। आज देश के 45 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप्स छोटे शहरों से उभर रहे हैं और इनमें से 47 प्रतिशत स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला सह-संस्थापक विद्यमान है। यह उद्यमिता क्रांति भारत की आर्थिक संवृद्धि को वास्तविक जन-आंदोलन बना रही है।
रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता और रक्षा निर्यात में ऐतिहासिक उछाल
एक दशक पूर्व तक भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश हुआ करता था जो अपनी रक्षा आवश्यकताओं का 65 प्रतिशत से अधिक विदेशों से खरीदता था। किंतु ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत रक्षा उत्पादन में हुए क्रांतिकारी बदलावों ने भारत को हथियार आयातक से एक प्रमुख हथियार निर्यातक देश में बदल दिया है। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो समर्पित ‘रक्षा औद्योगिक गलियारे’ (Defense Industrial Corridors) स्थापित किए गए हैं जहां निजी और सार्वजनिक क्षेत्र संयुक्त रूप से उन्नत मिसाइलों, बख्तरबंद वाहनों, तोपों और ड्रोनों का विनिर्माण कर रहे हैं।
भारत का रक्षा उत्पादन 1.27 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुका है और भारत का रक्षा निर्यात 21,000 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। भारत आज दुनिया के 85 से अधिक मित्र देशों को उन्नत हथियार प्रणालियों का निर्यात कर रहा है। फिलीपींस को ‘ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल’ की आपूर्ति, आर्मेनिया को ‘पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर’ और ‘आकाश एयर डिफेंस सिस्टम’ का निर्यात, और वियतनाम को तीव्र गश्ती नौकाओं की आपूर्ति भारत की सामरिक और आर्थिक शक्ति का नया प्रमाण है। स्वदेशी विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विक्रांत’ और हल्का लड़ाकू विमान ‘तेजस’ भारतीय रक्षा इंजीनियरिंग की श्रेष्ठता के वैश्विक प्रतीक बन चुके हैं।
विश्व की फार्मेसी: भारतीय फार्मास्यूटिकल और उच्च-मूल्य बायोफार्मा उद्योग
भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग को विश्व भर में ‘विश्व की फार्मेसी’ (Pharmacy of the World) के रूप में जाना जाता है। भारत दुनिया भर के कुल टीकों का 60 प्रतिशत से अधिक और वैश्विक जेनेरिक दवाओं का 20 प्रतिशत अकेले आपूर्ति करता है। अमेरिका और यूरोप में उपयोग की जाने वाली हर तीसरी दवा भारत में निर्मित होती है। कोविड महामारी के दौरान भारत ने 150 से अधिक देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन, पैरासिटामोल और जीवनरक्षक टीकों की आपूर्ति कर वैश्विक मानवता की रक्षा की थी।
5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की दिशा में अब भारतीय फार्मा उद्योग केवल कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च-मूल्य वाली बायोसिमिलर्स, सेल एंड जीन थेरेपी, और कॉम्प्लेक्स जेनेरिक्स के क्षेत्र में छलांग लगा रहा है। सक्रिय दवा सामग्री (API) और दवाओं के कच्चे माल (KSM) के लिए चीन पर निर्भरता समाप्त करने हेतु गुजरात, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में 3 विशाल ‘बल्क ड्रग पार्क्स’ की स्थापना की जा रही है। चिकित्सा उपकरणों (Medical Devices) के स्वदेशी विनिर्माण के लिए पीएलआई योजना लागू की गई है जो एमआरआई, सीटी स्कैन और कैथ लैब उपकरणों के आयात को समाप्त कर भारत को मेडिकल डिवाइस विनिर्माण का वैश्विक हब बना रही है।
शहरीकरण की गति और 100 स्मार्ट सिटीज: आर्थिक विकास के केंद्र
भारत में शहरीकरण तीव्र गति से बढ़ रहा है और अनुमान है कि 2035 तक देश की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरों में निवास करेगी। शहर आर्थिक संवृद्धि के सबसे बड़े इंजन होते हैं जो देश की जीडीपी में 65 प्रतिशत से अधिक का योगदान देते हैं। इस बढ़ती शहरी आबादी को उच्च गुणवत्तापूर्ण जीवन, प्रदूषण-मुक्त परिवहन और सतत बुनियादी ढांचा प्रदान करने के लिए ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ संचालित किया जा रहा है।
देश के 100 चयनित शहरों में ‘एकीकृत कमान और नियंत्रण केंद्र’ (ICCC) स्थापित किए गए हैं जो यातायात नियंत्रण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जल आपूर्ति और नागरिक सुरक्षा की 24×7 डिजिटल निगरानी करते हैं। देश के 20 से अधिक प्रमुख शहरों में 900 किलोमीटर से अधिक का आधुनिक मेट्रो रेल नेटवर्क सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है और 1,000 किलोमीटर से अधिक नए मेट्रो ट्रैक निर्माणाधीन हैं। इसके साथ ही देश के विभिन्न राज्यों के बीच तीव्र गति वाली 100 से अधिक ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ ट्रेनों का सफल संचालन भारतीय रेल के आधुनिकीकरण का नया चेहरा बन चुका है। स्वच्छ भारत मिशन (नगरीय) के तहत शहरों में कचरे के पहाड़ों (लीगेसी वेस्ट) को बायो-माइनिंग द्वारा समाप्त कर हरित पार्कों में बदला जा रहा है।
महिला आर्थिक सशक्तिकरण: ‘लखपति दीदी’ और ग्रामीण महिला उद्यमिता
किसी भी देश की आधी आबादी को आर्थिक रूप से सशक्त बनाए बिना 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। भारत सरकार ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत 83 लाख महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जुड़ी 10 करोड़ से अधिक महिलाओं के आर्थिक उत्थान के लिए ‘लखपति दीदी’ योजना आरंभ की है। इसका लक्ष्य कम से कम 3 करोड़ ग्रामीण महिलाओं की वार्षिक आय 1 लाख रुपये से अधिक सुनिश्चित करना है।
महिलाओं को केवल पारंपरिक सिलाई या आचार बनाने तक सीमित नहीं रखा जा रहा है, बल्कि उन्हें आधुनिक प्रौद्योगिकी से जोड़ा जा रहा है। ‘नमो ड्रोन दीदी’ पहल के तहत ग्रामीण महिलाओं को कृषि ड्रोनों के संचालन, फसलों में नैनो-यूरिया के छिड़काव और ड्रोन मरम्मत का पेशेवर पायलट प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके साथ ही ‘स्टैंड-अप इंडिया’ योजना के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला उद्यमियों को 10 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के बैंक ऋण दिए जा रहे हैं, जबकि ‘पीएम मुद्रा योजना’ के तहत 70 प्रतिशत से अधिक ऋण महिला उद्यमियों को स्वीकृत किए गए हैं। यह महिला आर्थिक क्रांति ग्रामीण भारत के क्रय-विक्रय चक्र को अभूतपूर्व गतिशीलता प्रदान कर रही है।
पीएम मित्र टेक्सटाइल पार्क्स: वैश्विक वस्त्र बाजार में भारत की पुनर्स्थापना
भारतीय कपड़ा और वस्त्र उद्योग देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता क्षेत्र है जो प्रत्यक्ष रूप से 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को (विशेषकर महिलाओं को) आजीविका प्रदान करता है। भारत को वैश्विक कपड़ा विनिर्माण और निर्यात का शीर्ष केंद्र बनाने के लिए सरकार ने 7 राज्यों में विशाल ‘पीएम मित्र’ (PM Mega Integrated Textile Regions and Apparel – MITRA) पार्क्स की स्थापना को मंजूरी दी है।
यह परियोजना प्रधानमंत्री के ‘5F’ विजन पर आधारित है: फार्म टू फाइबर (Farm to Fibre), फाइबर टू फैक्ट्री (Fibre to Factory), फैक्ट्री टू फैशन (Factory to Fashion), और फैशन टू फॉरेन (Fashion to Foreign)। इन अत्याधुनिक पार्कों में कताई, बुनाई, रंगाई, छपाई से लेकर वस्त्र निर्माण और पैकेजिंग की संपूर्ण एकीकृत मूल्य शृंखला एक ही परिसर में उपलब्ध होगी, जिससे उत्पादन लागत में भारी कमी आएगी। वैश्विक खरीदार जो बांग्लादेश, वियतनाम और कंबोडिया से हटकर सुरक्षित और टिकाऊ वस्त्र आपूर्ति की तलाश में हैं, उनके लिए भारत का पीएम मित्र पार्क सबसे पसंदीदा वैश्विक गंतव्य बनकर उभर रहा है।
राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM) और भारत 6जी विजन: भविष्य की आर्थिक महाक्रांति
21वीं सदी के मध्य में वही राष्ट्र वैश्विक अर्थव्यवस्था पर शासन करेंगे जो अगली पीढ़ी की विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के स्वामी होंगे। भारत ने इस दूरदर्शिता के साथ 6,003 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन के साथ ‘राष्ट्रीय क्वांटम मिशन’ (National Quantum Mission – NQM) को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य 50 से 1000 भौतिक क्यूबिट्स वाले मध्यवर्ती-पैमाने के सुपरकंप्यूटिंग क्वांटम कंप्यूटर विकसित करना, सुरक्षित उपग्रह-आधारित क्वांटम संचार नेटवर्क स्थापित करना और क्वांटम सेंसर्स का निर्माण करना है। क्वांटम तकनीक दवा खोज, वित्तीय जोखिम मॉडलिंग, जटिल लॉजिस्टिक्स अनुकूलन और साइबर सुरक्षा में अभूतपूर्व गति प्रदान करेगी।
इसके साथ ही जहां 5जी नेटवर्क का देशव्यापी रोलआउट विश्व में सबसे तेज गति से संपन्न हुआ, वहीं भारत ने ‘भारत 6जी अलायंस’ (Bharat 6G Alliance) के माध्यम से 2030 तक 6जी दूरसंचार प्रौद्योगिकी में वैश्विक बौद्धिक संपदा (पेटेंट्स) और मानक स्थापित करने का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया है। दूरसंचार उपकरणों के स्वदेशी निर्माण और ‘ओपन रैन’ (Open RAN) आर्किटेक्चर के विकास से भारत न केवल अपनी संचार संप्रभुता को सुरक्षित रखेगा बल्कि भविष्य में खरबों डॉलर के वैश्विक 6जी उपकरणों का निर्यातक बनकर अपनी आर्थिक संवृद्धि को स्थायी मजबूती प्रदान करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
1. भारतीय अर्थव्यवस्था के 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक कब तक पहुंचने का अनुमान है?
वर्तमान विकास दर (6.5 से 7 प्रतिशत वास्तविक जीडीपी वृद्धि) और स्थिर विनिमय दर के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक का अनुमान है कि भारत वर्ष 2027-28 तक 5 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक मील के पत्थर को पार कर लेगा और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
2. ‘मेक इन इंडिया’ और पीएलआई योजना से आम जनता को क्या लाभ हुआ है?
मेक इन इंडिया और पीएलआई योजनाओं से देश में लाखों नए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं। भारत में बनने वाले स्मार्टफोन, टीवी और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सस्ते हुए हैं, विदेशों पर निर्भरता समाप्त हुई है और देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी बचत हुई है।
3. भारत की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना क्यों इतना आवश्यक है?
लॉजिस्टिक्स लागत (माल परिवहन और भंडारण का खर्च) अधिक होने से भारतीय कारखानों में बने उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे हो जाते हैं। लॉजिस्टिक्स लागत को 14 प्रतिशत से घटाकर 8 प्रतिशत करने से भारतीय निर्यात अत्यधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे और देश के उपभोक्ताओं को भी दैनिक वस्तुएं सस्ती मिलेंगी।
4. क्या भारत का बढ़ता विदेशी मुद्रा भंडार अर्थव्यवस्था को सुरक्षा प्रदान करता है?
हां, 650 अरब डॉलर से अधिक का भारत का विदेशी मुद्रा भंडार विश्व के शीर्ष 4 भंडारों में शामिल है। यह भंडार 11 महीनों से अधिक के आयात के भुगतान हेतु पर्याप्त है और विदेशी निवेशकों को यह भरोसा दिलाता है कि किसी भी वैश्विक मुद्रा संकट या रुपये में गिरावट के समय भारत पूरी तरह आर्थिक रूप से सुरक्षित है।
5. जीएसटी (GST) सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत बनाया है?
जीएसटी ने राज्यों के बीच लगने वाले दर्जनों अप्रत्यक्ष करों और चेक-पोस्टों को समाप्त कर भारत को एक एकीकृत साझा राष्ट्रीय बाजार बना दिया है। मासिक जीएसटी संग्रह 1.7 लाख करोड़ से 2 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है, जिसने केंद्र और राज्य सरकारों को विकास कार्यों हेतु प्रचुर वित्तीय संसाधन दिए हैं।
6. जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का क्या अर्थ है?
जब किसी देश की कुल आबादी में कार्यशील आयु वर्ग (15 से 64 वर्ष) के लोगों का अनुपात बच्चों और बुजुर्गों (आश्रित आबादी) की तुलना में बहुत अधिक होता है, तो उसे जनसांख्यिकीय लाभांश कहते हैं। भारत में 65 प्रतिशत से अधिक आबादी युवा है जो देश की उत्पादकता और बचत दर को उच्चतम स्तर पर बनाए रखती है।
7. क्या उच्च सरकारी पूंजीगत व्यय (Capex) से देश पर कर्ज का बोझ बढ़ता है?
नहीं, पूंजीगत व्यय सड़कों, रेलवे, पुलों और बिजली संयंत्रों जैसी स्थायी और उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण पर किया जाता है। ये परिसंपत्तियां दशकों तक आर्थिक रिटर्न देती हैं, निजी निवेश को आकर्षित करती हैं और नए कर राजस्व का सृजन करती हैं, जिससे जीडीपी-टू-ऋण अनुपात स्वतः कम होता है।
8. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) 5 ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?
एमएसएमई भारत के विनिर्माण उत्पादन का 36 प्रतिशत, कुल निर्यात का 45 प्रतिशत और 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। जब छोटे कारखाने और स्थानीय उद्योग बढ़ते हैं, तभी देश में संतुलित क्षेत्रीय विकास और जमीनी स्तर पर रोजगार का निर्माण होता है।
9. ‘विकसित भारत 2047’ का दीर्घकालिक विजन क्या है?
आजादी के 100वें वर्ष (2047) तक भारत को एक उच्च-आय वाला विकसित राष्ट्र बनाना इसका लक्ष्य है। इसके तहत भारतीय अर्थव्यवस्था को 30 ट्रिलियन डॉलर तक ले जाना, प्रति व्यक्ति आय को 18,000 डॉलर से अधिक करना और देश के प्रत्येक नागरिक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना निर्धारित किया गया है।
निष्कर्ष एवं आत्मनिर्भर भारत का आत्मविश्वास
भारतीय अर्थव्यवस्था का 5 ट्रिलियन डॉलर बनने का मार्ग केवल एक आर्थिक संकल्प नहीं है, बल्कि यह सदियों की गुलामी और अभावों से उबरकर अपने खोए हुए आर्थिक गौरव को पुनः प्राप्त करने का राष्ट्रीय पुनर्जागरण है। भारत आज किसी विदेशी सहायता या संरक्षण का मोहताज नहीं है; भारत की संवृद्धि का ईंधन उसके अपने 1.4 अरब नागरिकों का पसीना, युवा उद्यमियों की मेधा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की परिपक्वता है। विनिर्माण, निर्यात और अवसंरचना के तीन शक्तिशाली इंजनों पर सवार होकर भारतीय अर्थव्यवस्था जिस अदम्य आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही है, वह संपूर्ण विश्व को यह संदेश देती है कि 21वीं सदी भारत की सदी है। आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय और सतत विकास के समन्वय से भारत न केवल अपने नागरिकों को समृद्धि प्रदान करेगा बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी स्थिरता और गति का नया संबल प्रदान करता रहेगा।


