भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां की 1.4 अरब आबादी का पोषण करने और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी खाद्य सुरक्षा को अक्षुण्ण बनाए रखने का पवित्रतम दायित्व हमारे कर्मठ अन्नदाता किसानों के कंधों पर है। भारतीय संस्कृति में किसान को केवल एक उत्पादक नहीं बल्कि साक्षात ‘अन्नदाता’ और जीवनदाता का दर्जा दिया गया है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान भले ही 16 से 18 प्रतिशत हो, किंतु देश की 45 प्रतिशत से अधिक कार्यशील जनसंख्या आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका, पारिवारिक सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने के लिए कृषि पर निर्भर करती है। इसके बावजूद दशकों तक भारत के लघु एवं सीमांत किसान साहूकारों के चंगुल, मौसम की अनिश्चितताओं, बीज-खाद की बढ़ती लागत और बिचौलियों के शोषण के भीषण चक्रव्यूह में फंसे रहे हैं। बुवाई के समय नकदी के अभाव में किसानों को अत्यधिक ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता था जिससे उनकी उपज का बड़ा हिस्सा केवल ब्याज चुकाने में ही चला जाता था।
इस ऐतिहासिक संकट का स्थायी समाधान करने और किसानों को एक सम्मानजनक, सुरक्षित और स्वावलंबी जीवन प्रदान करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 24 फरवरी 2019 को ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ (PM-KISAN) योजना का शुभारंभ किया। यह विश्व की सबसे बड़ी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer – DBT) योजनाओं में से एक है, जिसके तहत देश के 11 करोड़ से अधिक पात्र किसान परिवारों के बैंक खातों में प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की सुनिश्चित आर्थिक सहायता (2,000 रुपये की तीन समान किस्तों में) सीधे हस्तांतरित की जाती है। अब तक 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की ऐतिहासिक धनराशि बिना किसी बिचौलिए, दलाल या कमीशन के सीधे किसानों के खातों में पहुंच चुकी है। इसके साथ ही ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ (PMFBY), ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ (KCC), ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ (Soil Health Card), ‘पीएम कृषि सिंचाई योजना’ (PMKSY) और ‘कृषि अवसंरचना कोष’ (AIF) ने मिलकर भारतीय कृषि को एक नया सुरक्षा कवच और विकास की अभूतपूर्व गति प्रदान की है। इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम पीएम-किसान योजना की पात्रता शर्तों, ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया, ई-केवाईसी सत्यापन, भूमि रिकॉर्ड लिंकिंग, फसल बीमा के दावे, नैनो-उर्वरक तकनीक और किसान समृद्धि केंद्रों का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उद्देश्य
पीएम-किसान योजना 1 दिसंबर 2018 से प्रभावी मानी गई थी और इसका विधिवत राष्ट्रीय शुभारंभ 24 फरवरी 2019 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य देश के सभी भूमिधारक किसान परिवारों को कृषि और संबद्ध गतिविधियों तथा घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करना है। बुवाई के मौसम (खरीफ और रबी) से ठीक पहले जब किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक और जुताई के लिए नकदी की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, यह 2,000 रुपये की किस्त उनके लिए संजीवनी का कार्य करती है।
प्रारंभ में यह योजना केवल 2 हेक्टेयर तक की कृषि भूमि वाले छोटे और सीमांत किसानों के लिए थी, किंतु 1 जून 2019 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए इसके दायरे का विस्तार कर देश के सभी भूमिधारक किसान परिवारों (बिना किसी जोत सीमा के) को इसमें शामिल कर लिया। यह शत-प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित (Central Sector Scheme) योजना है जिसका संपूर्ण वित्तीय भार भारत सरकार वहन करती है। आधिकारिक योजना नियमों और किस्त स्थिति की जांच पीएम-किसान आधिकारिक पोर्टल पर की जा सकती है।
पात्रता मानदंड और बहिष्करण श्रेणियां (Exclusion Criteria)
पीएम-किसान योजना का लाभ केवल वास्तविक और जरूरतमंद किसानों तक पहुंचे तथा संपन्न व गैर-पात्र व्यक्ति इसका दुरुपयोग न कर सकें, इसके लिए सरकार ने अत्यंत स्पष्ट और सख्त पात्रता मानदंड निर्धारित किए हैं। वे सभी किसान परिवार जिनके नाम पर संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के भू-अभिलेखों (Land Records) में खेती योग्य भूमि दर्ज है, वे इसके पात्र हैं। योजना में परिवार की परिभाषा ‘पति, पत्नी और नाबालिग बच्चे’ है।
निम्नलिखित उच्च आर्थिक स्थिति वाले व्यक्तियों और परिवारों को योजना के लाभ से पूर्णतः बाहर (Ineligible) रखा गया है:
1. सभी संस्थागत भूमिधारक (Institutional Landholders जैसे ट्रस्ट, कंपनियां, सहकारी समितियां)।
2. वर्तमान या पूर्व में संवैधानिक पदों पर रहे व्यक्ति (जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल)।
3. वर्तमान या पूर्व मंत्री, सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य, नगर निगमों के महापौर और जिला पंचायतों के अध्यक्ष।
4. केंद्र या राज्य सरकार के मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और स्वायत्त संस्थाओं के सभी सेवारत या सेवानिवृत्त अधिकारी व कर्मचारी (चतुर्थ श्रेणी / ग्रुप-डी / एमटीएस कर्मचारियों को छोड़कर)।
5. वे सभी सेवानिवृत्त पेंशनभोगी जिनकी मासिक पेंशन 10,000 रुपये या उससे अधिक है (मल्टी-टास्किंग स्टाफ को छोड़कर)।
6. वे सभी व्यक्ति जिन्होंने पिछले वित्तीय वर्ष में आयकर (Income Tax) का भुगतान किया है।
7. पेशेवर पेशेवर व्यक्ति जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA), और आर्किटेक्ट जो पेशेवर निकायों में पंजीकृत होकर कार्य कर रहे हैं।
ई-केवाईसी (e-KYC) अनिवार्यता और आधार-सीडेड बैंक खाते
योजना में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और फर्जी लाभार्थियों को बाहर निकालने के लिए सरकार ने प्रत्येक पंजीकृत किसान के लिए ‘ई-केवाईसी’ (e-KYC) को अनिवार्य बना दिया है। बिना ई-केवाईसी पूर्ण किए अगली किस्तों का भुगतान स्वतः रोक दिया जाता है। ई-केवाईसी पूर्ण करने के तीन सुगम माध्यम उपलब्ध हैं:
1. ओटीपी-आधारित ई-केवाईसी: किसान पीएम-किसान पोर्टल (pmkisan.gov.in) पर जाकर ‘e-KYC’ विकल्प पर क्लिक कर अपना आधार नंबर दर्ज करते हैं। आधार से लिंक मोबाइल नंबर पर 6 अंकों का ओटीपी आता है जिसे सबमिट करते ही ई-केवाईसी तुरंत पूर्ण हो जाती है। यह सेवा पूर्णतः निःशुल्क है।
2. बायोमेट्रिक-आधारित ई-केवाईसी: जिन किसानों के आधार से मोबाइल नंबर लिंक नहीं है, वे नजदीकी ‘सामान्य सेवा केंद्र’ (CSC) पर जाकर बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट स्कैनर के माध्यम से मात्र 15 रुपये के निर्धारित शुल्क पर अपनी ई-केवाईसी करा सकते हैं।
3. पीएम-किसान मोबाइल ऐप और फेस-ऑथेंटिकेशन: भारत सरकार ने पहली बार अत्याधुनिक ‘चेहरा प्रमाणीकरण’ (Face Authentication) तकनीक वाला मोबाइल ऐप लॉन्च किया है। इसके माध्यम से किसान बिना किसी ओटीपी या फिंगरप्रिंट के केवल अपने स्मार्टफोन के कैमरे से अपना चेहरा स्कैन करके घर बैठे 1 मिनट में अपनी और अपने गांव के अन्य किसानों की ई-केवाईसी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त बैंक खाते का आधार से ‘डीबीटी-सक्षम’ (Aadhaar Seeding / NPCI Mapping) होना अनिवार्य है ताकि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण में कोई विफलता न हो।
प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आधुनिक कृषि तकनीक और वित्तीय संबल भारतीय अन्नदाता के जीवन में समृद्धि ला रहे हैं।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): मौसम के जोखिमों से सुरक्षा कवच
प्राकृतिक आपदाओं (सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, बेमौसम बारिश, कीट और बीमारियां) से फसलों के नष्ट होने पर किसानों को आर्थिक तबाही से बचाने के लिए 18 फरवरी 2016 को ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ (PMFBY) लागू की गई। यह ‘एक राष्ट्र, एक योजना’ के सिद्धांत पर आधारित दुनिया की सबसे बड़ी फसल बीमा योजना है।
इस योजना की सबसे क्रांतिकारी विशेषता किसानों द्वारा देय न्यूनतम और अत्यधिक रियायती प्रीमियम दरें हैं:
– खरीफ फसलों (जैसे धान, मक्का, बाजरा, कपास) के लिए बीमित राशि का मात्र 2.0 प्रतिशत।
– रबी फसलों (जैसे गेहूं, चना, सरसों, जौ) के लिए बीमित राशि का मात्र 1.5 प्रतिशत।
– वाणिज्यिक और बागवानी फसलों (जैसे आलू, गन्ना, फल, सब्जियां) के लिए मात्र 5.0 प्रतिशत।
शेष प्रीमियम का संपूर्ण भार केंद्र और संबंधित राज्य सरकार द्वारा 50:50 के अनुपात में (पूर्वोत्तर राज्यों में 90:10) सब्सिडी के रूप में वहन किया जाता है। योजना में बुवाई न कर पाने से लेकर, खड़ी फसल के नुकसान, और फसल कटाई के बाद खेत में सूखने के लिए रखी फसल के 14 दिनों के भीतर चक्रवात या ओलावृष्टि से नुकसान पर भी क्षतिपूर्ति दी जाती है। फसल नुकसान के 72 घंटे के भीतर ‘क्रॉप इंश्योरेंस ऐप’ पर सूचना दर्ज करने पर उपग्रह इमेजरी और रिमोट सेंसिंग के जरिए त्वरित क्लेम सेटलमेंट किया जाता है। फसल बीमा नीतियों और क्लेम कैलकुलेटर का संदर्भ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के आधिकारिक पोर्टल पर देखा जा सकता है।
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC): 4 प्रतिशत की रियायती दर पर संस्थागत ऋण
साहूकारों के 24 से 36 प्रतिशत के शोषणकारी ब्याज से किसानों को मुक्ति दिलाने के लिए ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ (KCC) योजना का अभूतपूर्व सरलीकरण किया गया है। वर्तमान में केसीसी के तहत किसानों को 3 लाख रुपये तक का अल्पकालिक फसली ऋण मात्र 7 प्रतिशत की सामान्य ब्याज दर पर दिया जाता है। यदि किसान समय पर अपने ऋण का भुगतान करता है, तो केंद्र सरकार उसे 3 प्रतिशत की अतिरिक्त ब्याज छूट (Interest Subvention) प्रदान करती है, जिससे किसान को वास्तविक ब्याज मात्र 4 प्रतिशत ही देना पड़ता है।
सरकार ने 1.6 लाख रुपये तक के केसीसी ऋण के लिए किसी भी प्रकार की जमीन गिरवी रखने (Collateral-Free) की अनिवार्यता को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसके साथ ही केसीसी का विस्तार पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन करने वाले किसानों के लिए भी कर दिया गया है जिसके तहत उन्हें 2 लाख रुपये तक का रियायती कार्यशील पूंजी ऋण मिलता है। ‘किसान ऋण पोर्टल’ (KRP) के माध्यम से अब केसीसी का पूर्ण डिजिटलीकरण कर दिया गया है जिससे किसान मात्र कुछ ही दिनों में बिना बैंक के चक्कर लगाए डिजिटल स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card): वैज्ञानिक खेती और उर्वरक बचत
पारंपरिक रूप से भारतीय किसान अपनी फसलों में अंधाधुंध यूरिया और डीएपी का छिड़काव करते थे जिससे न केवल खेती की लागत बढ़ती थी बल्कि जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही थी और भूजल प्रदूषित हो रहा था। इस समस्या के समाधान हेतु 19 फरवरी 2015 को राजस्थान के सूरतगढ़ से ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना’ (Soil Health Card Scheme) आरंभ की गई जिसका नारा था: ‘स्वस्थ धरा, खेत हरा’।
इस योजना के तहत प्रत्येक 3 वर्ष में किसान के खेत की मिट्टी का वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में 12 महत्वपूर्ण मानकों पर परीक्षण किया जाता है:
– प्राथमिक पोषक तत्व: नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटाश (K)।
– द्वितीयक पोषक तत्व: सल्फर (S)।
– सूक्ष्म पोषक तत्व: जिंक (Zn), आयरन (Fe), कॉपर (Cu), मैंगनीज (Mn), बोरॉन (B)।
– भौतिक मानक: पीएच (pH), विद्युत चालकता (EC), और जैविक कार्बन (OC)।
परीक्षण के आधार पर किसान को एक रंगीन कार्ड दिया जाता है जिसमें स्पष्ट लिखा होता है कि उसकी मिट्टी में किस पोषक तत्व की कमी है और उसे कौन सी फसल में कितनी मात्रा में खाद डालनी चाहिए। इस वैज्ञानिक परामर्श से रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 15 से 20 प्रतिशत की कमी आई है और फसलों की उत्पादकता में 10 से 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि कल्याण और किसान सहयोग के राष्ट्रीय कार्यक्रमों का संपूर्ण विवरण कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): हर खेत को पानी, प्रति बूंद अधिक फसल
भारतीय कृषि को मानसून के जुए से मुक्त कराने और देश के सिंचित क्षेत्र का विस्तार करने के लिए 1 जुलाई 2015 को ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (PMKSY) आरंभ की गई। इसके दो प्रमुख घटक हैं: ‘हर खेत को पानी’ (दशकों से अधूरी पड़ी 99 बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करना) और ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ (Per Drop More Crop)।
‘प्रति बूंद अधिक फसल’ घटक के तहत ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई) जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने पर छोटे और सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत तक और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत तक की सरकारी सब्सिडी दी जाती है। ड्रिप सिंचाई से पानी सीधे पौधे की जड़ों तक पहुंचता है जिससे 40 से 50 प्रतिशत पानी की बचत होती है, खरपतवारों का प्रकोप कम होता है और उर्वरकों को पानी के साथ ही घोलकर देने (फर्टिगेशन) से खाद की भारी बचत होती है।
नैनो-यूरिया, नैनो-डीएपी और पीएम-प्रणाम योजना
रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने और जैव-उर्वरकों को बढ़ावा देने के लिए भारत ने विश्व का पहला तरल ‘नैनो-यूरिया’ और ‘नैनो-डीएपी’ स्वदेशी रूप से विकसित कर कृषि में हरित क्रांति ला दी है। पारंपरिक 45 किलोग्राम की भारी यूरिया बोरी के स्थान पर मात्र 500 मिलीलीटर की एक नैनो-यूरिया बोतल पर्याप्त होती है। यह सीधे पौधों की पत्तियों द्वारा 80 प्रतिशत से अधिक दक्षता से अवशोषित हो जाती है (पारंपरिक यूरिया की दक्षता मात्र 30% होती है)।
इसके साथ ही केंद्र सरकार ने ‘पीएम-प्रणाम’ (PM-PRANAM – Program for Restoration, Awareness, Nourishment and Amelioration of Mother Earth) योजना आरंभ की है। इस योजना के तहत जो राज्य रासायनिक उर्वरकों के उपभोग में जितनी कमी लाते हैं, केंद्र सरकार द्वारा उर्वरक सब्सिडी में बची हुई राशि का 50 प्रतिशत अनुदान के रूप में उस राज्य को वैकल्पिक उर्वरकों (जैविक खाद, वर्मीकम्पोस्ट) और पर्यावरण अनुकूल कृषि तकनीकों के विकास हेतु वापस दे दिया जाता है। देश भर में 1.75 लाख से अधिक ‘प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र’ (PM-KSK) स्थापित किए गए हैं जो खाद, बीज, मिट्टी परीक्षण, ड्रोन किराए पर लेने और कृषि विशेषज्ञों की सलाह का ‘वन-स्टॉप सेंटर’ बन चुके हैं।
प्रमुख कृषि कल्याण योजनाओं का समग्र तुलनात्मक विश्लेषण
भारत सरकार द्वारा किसानों के आर्थिक उत्थान और जोखिम प्रबंधन के लिए संचालित प्रमुख योजनाओं के उद्देश्य, वित्तीय लाभ और क्रियान्वयन तंत्र विशिष्ट हैं। नीचे दी गई तालिका में भारत की चार सबसे बड़ी किसान कल्याण योजनाओं का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
| योजना का नाम | प्रारंभ वर्ष एवं प्रकार | वित्तीय सहायता / लाभ स्वरूप | प्राथमिक प्रभाव एवं लाभार्थी |
| पीएम-किसान (PM-KISAN) | वर्ष 2019 (100% केंद्रीय क्षेत्र योजना) | 6,000 रुपये प्रतिवर्ष (2,000 रु की 3 किस्तें) डीबीटी द्वारा | 11 करोड़+ किसान परिवार, बुवाई पूर्व प्रत्यक्ष नकदी सहायता |
| पीएम फसल बीमा (PMFBY) | वर्ष 2016 (केंद्र-राज्य साझेदारी) | मात्र 1.5% से 2% प्रीमियम पर संपूर्ण फसल हानि का बीमा क्लेम | प्राकृतिक आपदाओं से फसल सुरक्षा, 1.5 लाख करोड़+ क्लेम भुगतान |
| किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) | सरलीकृत 2019 (संस्थागत ऋण) | 3 लाख तक का फसली ऋण मात्र 4% शुद्ध वार्षिक ब्याज दर पर | साहूकारों से मुक्ति, पशुपालन व मत्स्य पालन हेतु 2 लाख तक ऋण |
| पीएम कृषि सिंचाई (PMKSY) | वर्ष 2015 (प्रति बूंद अधिक फसल) | ड्रिप व स्प्रिंकलर सिस्टम पर 45% से 55% तक प्रत्यक्ष सब्सिडी | जल बचत 40-50%, उत्पादकता में वृद्धि, भूजल संरक्षण |
यह तुलनात्मक विश्लेषण प्रमाणित करता है कि भारत सरकार का कृषि मॉडल केवल किसी एक पहलू पर ध्यान केंद्रित नहीं करता, बल्कि यह आय सहायता, जोखिम बीमा, सस्ता संस्थागत ऋण और वैज्ञानिक सिंचाई का एक संपूर्ण सुरक्षा तंत्र प्रदान करता है।
कृषि अवसंरचना कोष (AIF): फसलोत्तर बर्बादी पर रोकथाम और ग्रामीण उद्यमिता
भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि फसल की बंपर पैदावार होने के बावजूद आधुनिक कटाई-उपरांत भंडारण और शीत-शृंखला (Cold Chain) के अभाव में प्रतिवर्ष 90,000 करोड़ रुपये से अधिक के फल, सब्जियां और खाद्यान्न बर्बाद हो जाते थे। किसान को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचने के लिए विवश होना पड़ता था। इस संकट के स्थायी समाधान हेतु भारत सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक वित्तीय परिव्यय के साथ ‘कृषि अवसंरचना कोष’ (Agriculture Infrastructure Fund – AIF) की शुरुआत की है।
एआईएफ योजना के तहत प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS), किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), कृषि उद्यमियों और स्टार्टअप्स को आधुनिक कोल्ड स्टोरेज, साइलो, वेयरहाउस, सॉर्टिंग और ग्रेडिंग इकाइयां, और प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करने के लिए बैंकों के माध्यम से 2 करोड़ रुपये तक के ऋण पर 3 प्रतिशत की वार्षिक ब्याज छूट (Interest Subvention) और सीजीटीएमएसई के तहत क्रेडिट गारंटी प्रदान की जाती है। यह वित्तपोषण किसानों को यह शक्ति देता है कि वे कटाई के तुरंत बाद अपनी उपज को संकटकालीन बिक्री (Distress Sale) में न बेचें, बल्कि उसे आधुनिक गोदामों में रखकर ई-एनएएम (e-NAM) पोर्टल के माध्यम से देश की किसी भी मंडी में उच्चतम भाव पर बेच सकें।
किसान उत्पादक संगठन (FPOs): छोटे किसानों की सामूहिक सौदेबाजी शक्ति
भारत में 86 प्रतिशत से अधिक किसान लघु और सीमांत हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। अकेले होने पर छोटा किसान न तो थोक भाव पर सस्ता बीज-खाद खरीद सकता है और न ही अपनी उपज का अच्छा दाम पाने के लिए बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों से मोलभाव कर सकता है। इस कमजोरी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने देश भर में ‘10,000 नए किसान उत्पादक संगठन’ (FPOs) बनाने का महाअभियान आरंभ किया है।
एफपीओ किसानों की एक ऐसी स्वायत्त कंपनी या सहकारी समिति होती है जिसके शेयरधारक स्वयं स्थानीय किसान होते हैं। 300 से 500 किसान एक साथ जुड़कर अपनी सामूहिक शक्ति से सीधे कंपनियों से थोक दरों पर उर्वरक और कीटनाशक खरीदते हैं जिससे उनकी उत्पादन लागत में 20 से 25 प्रतिशत की भारी कमी आती है। इसके अतिरिक्त वे अपनी फसलों की छंटाई, पैकेजिंग और ब्रांडिंग करके सीधे रिलायंस रिटेल, बिगबास्केट या विदेशी निर्यातकों को बेचते हैं जिससे बिचौलियों का कमीशन समाप्त हो जाता है और किसानों को उनकी उपज का 30 से 40 प्रतिशत अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। सरकार प्रत्येक नए एफपीओ को 18 लाख रुपये तक का वित्तीय अनुदान और 2 करोड़ रुपये तक की क्रेडिट गारंटी सहायता प्रदान करती है।
प्राकृतिक खेती और भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP)
हरित क्रांति के समय रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो बनाया, किंतु दशकों के अनियंत्रित उपयोग से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भूमि बंजर होने लगी, कैंसर जैसी बीमारियां फैलीं और खेती की लागत असहनीय हो गई। इस चक्रव्यूह से मुक्ति पाने के लिए भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन’ (NMNF) और ‘परंपरागत कृषि विकास योजना’ (PKVY) के तहत शून्य-लागत प्राकृतिक खेती को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।
प्राकृतिक खेती रासायनिक खादों और कीटनाशकों के स्थान पर प्रकृति के नियमों पर आधारित है। इसमें गाय के गोबर और गोमूत्र से निर्मित ‘जीवामृत’ और ‘बीजामृत’ का उपयोग किया जाता है जो मिट्टी में मित्र सूक्ष्म जीवाणुओं और केंचुओं की संख्या को लाखों गुना बढ़ा देते हैं। ‘मल्चिंग’ (आच्छादन) द्वारा मिट्टी की नमी को सुरक्षित रखा जाता है और ‘वापसा’ (हवा और पानी का संतुलन) द्वारा जल की 60 प्रतिशत बचत होती है। प्राकृतिक खेती से उत्पादित रासायनिक-मुक्त जैविक खाद्यान्न और सब्जियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सामान्य फसलों से दोगुने भाव पर प्रीमियम उत्पाद के रूप में खरीदा जा रहा है जिससे किसानों की आय में क्रांतिकारी वृद्धि हो रही है।
नमो ड्रोन दीदी और कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
21वीं सदी की भारतीय कृषि अब पारंपरिक हल-बैल से आगे बढ़कर आधुनिक ड्रोन तकनीक, सेंसर और उपग्रह आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुकी है। केंद्र सरकार ने महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से 15,000 ग्रामीण महिलाओं को ड्रोन पायलट बनाने के लिए ‘नमो ड्रोन दीदी’ (NaMo Drone Didi) योजना आरंभ की है।
कृषि ड्रोन मात्र 10 मिनट में 1 एकड़ खेत में नैनो-यूरिया या कीटनाशक का समानुपातिक छिड़काव कर देते हैं, जिस कार्य को करने में मजदूर को पूरा दिन लग जाता था। इससे किसानों के समय और श्रम की भारी बचत होती है और कीटनाशकों के मानव शरीर के सीधे संपर्क में आने से होने वाली विषाक्तता का खतरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है। ड्रोन दीदी प्रति एकड़ छिड़काव का न्यूनतम किराया लेकर प्रति माह 15,000 से 20,000 रुपये की सम्मानजनक आजीविका अर्जित कर रही हैं। इसके अतिरिक्त उपग्रह आधारित एआई प्रणालियों के माध्यम से किसानों के मोबाइल फोन पर फसलों में लगने वाले रोगों की प्रारंभिक चेतावनी और मौसम पूर्वानुमान के सटीक अलर्ट सीधे भेजे जा रहे हैं जो भारतीय कृषि को स्मार्ट और जलवायु-अनुकूल बना रहे हैं।
प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (PM-KMY): अन्नदाताओं के लिए वृद्धावस्था पेंशन सुरक्षा
जीवन भर खेत में कठोर परिश्रम करके देश का पेट भरने वाले छोटे और सीमांत किसानों के पास वृद्धावस्था में कोई सामाजिक सुरक्षा या पेंशन नहीं होती थी। शारीरिक शक्ति क्षीण होने पर वे दूसरों पर आश्रित होने के लिए विवश हो जाते थे। इस मानवीय संकट का समाधान करने के लिए केंद्र सरकार ने ‘प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना’ (PM-KMY) लागू की है जो किसानों के लिए एक स्वैच्छिक और अंशदायी पेंशन योजना है।
इस योजना के तहत 18 से 40 वर्ष की आयु के 2 हेक्टेयर तक भूमि वाले छोटे और सीमांत किसान पात्र हैं। किसान की प्रवेश आयु के अनुसार उसे 55 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रतिमाह का मामूली अंशदान करना होता है, और ठीक उतनी ही बराबर राशि (50%) केंद्र सरकार द्वारा किसान के पेंशन खाते में जमा की जाती है। 60 वर्ष की आयु पूर्ण होने के उपरांत किसान को जीवन भर 3,000 रुपये प्रतिमाह (36,000 रुपये वार्षिक) की सुनिश्चित न्यूनतम पेंशन सीधे बैंक खाते में प्रदान की जाती है। किसान की मृत्यु की दशा में उसकी पत्नी को पारिवारिक पेंशन के रूप में 50 प्रतिशत (1,500 रुपये प्रतिमाह) सहायता मिलती है। किसान चाहे तो पीएम-किसान की मिलने वाली 2,000 रुपये की किस्त में से ही इस मासिक अंशदान की स्वतः कटौती (Auto-Debit) का विकल्प चुन सकता है जिससे उसे जेब से कोई अतिरिक्त पैसा नहीं देना पड़ता।
ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM): बिचौलियों से मुक्ति और ‘एक राष्ट्र, एक कृषि बाजार’
पारंपरिक कृषि मंडियों में आढ़तियों और बिचौलियों का ऐसा गठजोड़ रहता था कि किसान को अपनी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता था और मंडी शुल्क, दलाली तथा तौल में कटौती के कारण किसान का शोषण होता था। इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए 14 अप्रैल 2016 को ‘ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार’ (e-NAM) का राष्ट्रीय शुभारंभ किया गया।
ई-एनएएम एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है जो देश भर की 1,361 से अधिक थोक विनियमित कृषि मंडियों (APMCs) को एक साझा डिजिटल नेटवर्क से जोड़ता है। किसान अपनी उपज को मंडी में लाता है जहां आधुनिक प्रयोगशालाओं में उसकी गुणवत्ता का वैज्ञानिक परीक्षण (Assaying) कर ग्रेडिंग की जाती है। इसके पश्चात उस लॉट की जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर प्रदर्शित होती है जहां देश भर के हजारों व्यापारी और कॉर्पोरेट खरीदार ऑनलाइन पारदर्शी बोली (Bidding) लगाते हैं। उच्चतम बोली लगाने वाले खरीदार को माल बेचा जाता है और बिक्री की पूरी राशि सीधे किसान के बैंक खाते में ऑनलाइन ट्रांसफर हो जाती है। किसान को यह स्वतंत्रता होती है कि यदि उसे बोली की कीमत पसंद न आए तो वह अपनी फसल बेचने से इनकार कर सकता है। ई-एनएएम ने देश के किसानों को स्थानीय मंडी की सीमाओं से मुक्त कर पूरे देश के विशाल बाजार का स्वामी बना दिया है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): नीली क्रांति और जलीय कृषि संवर्धन
किसानों की आय को केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित न रखकर कृषि विविधीकरण को गति देने के लिए 20,050 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक वित्तीय निवेश के साथ ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ (PMMSY) संचालित की जा रही है। यह मत्स्य पालन के क्षेत्र में अब तक की सबसे बड़ी राष्ट्रीय निवेश योजना है जिसका उद्देश्य देश में मछली उत्पादन को 220 लाख टन तक पहुंचाना और मत्स्य निर्यात को 1 लाख करोड़ रुपये तक ले जाना है।
इस योजना के तहत मीठे पानी और समुद्री दोनों क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ‘बायोफ्लॉक’ (Biofloc) और ‘रिसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) जैसी गहन जलीय कृषि तकनीकों पर किसानों और युवाओं को 40 से 60 प्रतिशत तक की सरकारी सब्सिडी दी जाती है, जिससे बहुत कम भूमि और न्यूनतम जल में भी अत्यधिक मछली उत्पादन संभव होता है। गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले पारंपरिक मछुआरों को आधुनिक नौकाएं, जीपीएस और सेटेलाइट नेविगेशन उपकरण, तथा कोल्ड-चेन वैन उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके साथ ही मछुआरों को आकस्मिक मृत्यु या स्थायी अपंगता पर 5 लाख रुपये तक का निःशुल्क दुर्घटना बीमा सुरक्षा प्रदान की जाती है।
पीएम कुसुम योजना (PM-KUSUM): अन्नदाता से ऊर्जादाता बनने का क्रांतिकारी अभियान
खेती की लागत में डीजल पंपों का खर्च और बिजली की अनियमित आपूर्ति किसानों की बहुत बड़ी समस्या रही है। इस समस्या को एक स्थायी अवसर में बदलते हुए केंद्र सरकार ने ‘प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान’ (PM-KUSUM) योजना लागू की है जिसका उद्देश्य किसानों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना और उनकी अतिरिक्त आय का साधन सृजित करना है।
पीएम-कुसुम योजना के तीन मुख्य घटक हैं:
– घटक ‘ए’: किसान अपनी बंजर या अनुपयोगी जमीन पर 500 किलोवाट से 2 मेगावाट तक के सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर सकते हैं और उत्पादित बिजली को स्थानीय डिस्कॉम को 25 वर्षों तक पूर्व-निर्धारित दरों पर बेचकर प्रतिवर्ष लाखों रुपये की नियमित आय अर्जित कर सकते हैं।
– घटक ‘बी’: दूरदराज के बिना बिजली वाले क्षेत्रों में व्यक्तिगत किसानों को 7.5 हॉर्सपावर तक के स्टैंडअलोन सोलर कृषि पंप लगाने हेतु 60 प्रतिशत तक की भारी सब्सिडी (30% केंद्र + 30% राज्य) प्रदान की जाती है, किसान को केवल 10% अंशदान देना होता है और शेष 30% बैंक ऋण मिल जाता है।
– घटक ‘सी’: ग्रिड से जुड़े मौजूदा पारंपरिक बिजली कृषि पंपों का सौरीकरण किया जाता है जिससे दिन के समय मुफ्त सौर बिजली से निर्बाध सिंचाई होती है और अतिरिक्त बची हुई बिजली को किसान ग्रिड को बेचकर पैसा कमाते हैं। यह योजना देश के कृषि क्षेत्र को शून्य-कार्बन और अत्यधिक लाभप्रद बना रही है।
राष्ट्रीय गोकुल मिशन और पशुधन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF)
भारत में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा एटीएम है जो किसानों को पूरे वर्ष नियमित नकद आय प्रदान करता है। भारत विश्व में दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है जो वैश्विक दूध का 24 प्रतिशत अकेले उत्पादित करता है। देशी गोवंश की नस्लों के संरक्षण और उत्पादकता बढ़ाने के लिए ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ संचालित किया जा रहा है। इसके तहत गिर, साहीवाल, थारपारकर, राठी और कांकरेज जैसी उच्च गुणवत्ता वाली स्वदेशी नस्लों के वीर्य बैंक और कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों की स्थापना की गई है।
इसके अतिरिक्त 15,000 करोड़ रुपये के ‘पशुपालन अवसंरचना विकास कोष’ (AHIDF) के माध्यम से निजी उद्यमियों और डेयरी किसानों को दूध प्रसंस्करण इकाइयों, पनीर-मक्खन निर्माण संयंत्रों, आधुनिक पशु आहार संयंत्रों और मांस प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना हेतु 3 प्रतिशत की ब्याज छूट पर रियायती बैंक ऋण दिया जा रहा है। ‘राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ (NADCP) के तहत खुरपका-मुंहपका (FMD) और ब्रुसेलोसिस जैसी जानलेवा बीमारियों से पशुओं की रक्षा हेतु 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्तपोषण से निःशुल्क टीकाकरण किया जा रहा है। यह समग्र पशुधन सुरक्षा तंत्र किसानों को सूखे या फसल बर्बादी के समय भी एक मजबूत आर्थिक संबल प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
1. क्या परिवार के सभी सदस्यों (पति, पत्नी और बालिग बच्चों) को पीएम-किसान की किस्त मिल सकती है?
नहीं, योजना के नियमों के अनुसार किसान परिवार की परिभाषा ‘पति, पत्नी और नाबालिग बच्चे’ है। अतः एक ही राशन कार्ड या परिवार में पति और पत्नी दोनों को अलग-अलग किस्त नहीं मिल सकती; दोनों में से किसी एक को ही लाभ मिलेगा। यदि बालिग पुत्र का नाम अलग भूमि रिकॉर्ड (खतौनी) में दर्ज है और उसका पृथक राशन कार्ड है, तो वह स्वतंत्र रूप से आवेदन कर सकता है।
2. पीएम-किसान पोर्टल पर ‘Land Seeding’ ‘NO’ दिखने पर उसे ‘YES’ कैसे कराएं?
यदि पोर्टल पर स्टेटस में लैंड सीडिंग ‘NO’ प्रदर्शित हो रहा है, तो किसान को अपनी जमीन की नवीनतम खतौनी (भूलेख नकल), आधार कार्ड और बैंक पासबुक की स्व-प्रमाणित प्रति लेकर अपने क्षेत्र के उप-कृषि निदेशक कार्यालय अथवा तहसील में लेखपाल/पटवारी से संपर्क करना चाहिए। लेखपाल द्वारा भौतिक सत्यापन के बाद पोर्टल पर लैंड सीडिंग ‘YES’ हो जाती है।
3. पीएम-किसान की रुकी हुई किस्तें क्या बाद में एक साथ मिलती हैं?
हां, यदि किसी तकनीकी कारण (जैसे ई-केवाईसी न होना, आधार सीडिंग न होना या भूमि रिकॉर्ड का सत्यापन न होना) से किसी पात्र किसान की एक या दो किस्तें रुक गई थीं, तो जैसे ही वह अपनी तकनीकी त्रुटि को पोर्टल पर सुधार लेता है, उसकी रुकी हुई सभी किस्तें अगली नियमित किस्त के साथ एकमुश्त उसके बैंक खाते में जमा कर दी जाती हैं।
4. क्या किराये या बटाई पर खेती करने वाले किसान पीएम-किसान के पात्र हैं?
नहीं, वर्तमान नियमों के अनुसार पीएम-किसान योजना का लाभ केवल उन किसानों को ही मिलता है जिनके स्वयं के नाम पर वैध कृषि भूमि का मालिकाना हक राज्य के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है। केवल बटाईदार या किरायेदार किसान इसके पात्र नहीं हैं।
5. पीएम फसल बीमा योजना (PMFBY) में फसल नुकसान की सूचना कितने समय में देनी होती है?
ओलावृष्टि, जलभराव, बादल फटना या भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से स्थानीय फसल नुकसान की स्थिति में किसान को घटना के अधिकतम ’72 घंटे के भीतर’ अपने संबंधित बैंक, बीमा कंपनी के टोल-फ्री नंबर अथवा ‘क्रॉप इंश्योरेंस मोबाइल ऐप’ के माध्यम से सूचना दर्ज कराना अनिवार्य होता है।
6. किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) पर 3 लाख रुपये के ऋण पर 4 प्रतिशत ब्याज दर कैसे लागू होती है?
बैंकों की सामान्य ब्याज दर 9 प्रतिशत होती है। केंद्र सरकार 2 प्रतिशत की अग्रिम ब्याज छूट देती है जिससे दर 7 प्रतिशत हो जाती है। जब किसान नियत तिथि पर अपने ऋण का समय पर भुगतान (Prompt Repayment) करता है, तो सरकार उसे 3 प्रतिशत की अतिरिक्त छूट देती है, जिससे शुद्ध प्रभावी ब्याज दर मात्र 4 प्रतिशत रह जाती है।
7. क्या नैनो-यूरिया के उपयोग से सचमुच पारंपरिक यूरिया की बोरी जितनी पैदावार होती है?
हां, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के 11,000 से अधिक खेतों में किए गए वैज्ञानिक परीक्षणों ने सिद्ध किया है कि 500 मिलीलीटर की एक नैनो-यूरिया बोतल 45 किग्रा की एक बोरी के बराबर नाइट्रोजन पोषण प्रदान करती है। इसका पत्तियों पर सीधा छिड़काव होने से अवशोषण दक्षता 80% से अधिक होती है और फसल की गुणवत्ता व पैदावार में 8% तक की वृद्धि होती है।
8. पीएम किसान समृद्धि केंद्र (PM-KSK) क्या हैं?
देश भर की उर्वरक दुकानों को उन्नत करके ‘प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र’ बनाया गया है। ये केंद्र किसानों को प्रमाणित बीज, खाद और कीटनाशकों की बिक्री के साथ-साथ मिट्टी परीक्षण सुविधा, आधुनिक कृषि यंत्र व ड्रोन किराए पर उपलब्ध कराने और मौसम व बाजार भाव की सटीक जानकारी देने वाले एकल केंद्र के रूप में कार्य करते हैं।
9. क्या किसी सरकारी नौकरी वाले व्यक्ति के परिवार को पीएम-किसान का लाभ मिल सकता है?
नहीं, यदि परिवार में कोई भी सदस्य केंद्र या राज्य सरकार, निगमों अथवा स्वायत्त संस्थाओं में नियमित सेवारत या सेवानिवृत्त कर्मचारी है (केवल चतुर्थ श्रेणी / ग्रुप-डी / चपरासी को छोड़कर), तो वह परिवार पीएम-किसान योजना के लिए पूर्णतः अपात्र होता है। गलत तरीके से लिया गया पैसा सरकार द्वारा भू-राजस्व की तरह वसूला जाता है।
निष्कर्ष एवं भारतीय कृषि का स्वर्णिम भविष्य
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और संबद्ध कृषि कल्याण योजनाएं केवल आर्थिक राहत के चेक बांटने की योजनाएं नहीं हैं, बल्कि वे देश के अन्नदाता के आत्म-सम्मान, स्वाभिमान और समृद्धि की पुनर्स्थापना का राष्ट्रीय महायज्ञ हैं। इन योजनाओं ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि जब देश का नेतृत्व अपने किसानों के प्रति संवेदनशील होता है और भ्रष्टाचार-मुक्त डिजिटल तकनीक का उपयोग करता है, तो विकास की किरणें देश के अंतिम छोर पर खड़े सबसे निर्धन किसान की झोपड़ी तक बिना किसी रुकावट के पहुंचती हैं। पीएम-किसान की निश्चित नकदी, फसल बीमा का सुरक्षा कवच, किसान क्रेडिट कार्ड का सस्ता ऋण और नैनो-उर्वरकों की वैज्ञानिक तकनीक ने भारतीय किसान को ऋणग्रस्तता के अंधेरे से निकालकर समृद्धि के प्रकाश की ओर अग्रसर किया है। जैसे-जैसे भारतीय कृषि आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती और वैश्विक निर्यात के नए क्षितिज छू रही है, हमारे अन्नदाता भारत को न केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाए रखेंगे बल्कि संपूर्ण विश्व की खाद्य सुरक्षा के सबसे बड़े संबल बनकर देश के गौरव को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाएंगे।


