भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आर्थिक स्वावलंबन के सुदीर्घ इतिहास में पारंपरिक शिल्पकारों, दस्तकारों और कारीगरों का स्थान सदैव रीढ़ की हड्डी के समान रहा है। हमारे गांवों और कस्बों में अपने हाथों और पारंपरिक औजारों से मिट्टी, लोहे, लकड़ी, सोने, पीतल, चमड़े और कपड़ों को सजीव कलाकृतियों में बदलने वाले ये परिश्रमी शिल्पी समाज के वास्तविक ‘विश्वकर्मा’ हैं। सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा और पारिवारिक विरासत के माध्यम से चली आ रही यह कौशल संपदा न केवल करोड़ों परिवारों को आजीविका प्रदान करती रही है, बल्कि इसने भारत के समृद्ध हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध किया है। परंतु आधुनिक औद्योगीकरण, मशीनी विनिर्माण, पूंजी के अभाव और बिचौलियों के शोषण के कारण यह पारंपरिक कौशल वर्ग हासिए पर चला गया था। इस उपेक्षित वर्ग को सामाजिक सम्मान, संस्थागत वित्तीय पोषण, आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण और वैश्विक बाजार तक सीधी पहुंच प्रदान करने के लिए 17 सितंबर 2023 को विश्वकर्मा जयंती के पावन अवसर पर केंद्र सरकार द्वारा 13,000 करोड़ रुपये के पूर्ण केंद्रीय वित्तीय परिव्यय के साथ ‘प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना’ (PM Vishwakarma Scheme) का ऐतिहासिक शुभारंभ किया गया। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME), कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय और वित्तीय सेवा विभाग (DFS) के संयुक्त सहयोग से संचालित यह योजना भारत के 18 पारंपरिक शिल्पों से जुड़े लाखों कारीगरों को आत्मनिर्भर, समर्थ और सशक्त बनाने का एक युगांतकारी जन-कल्याणकारी अभियान है।
योजना का राष्ट्रीय विजन और बुनियादी उद्देश्य
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना केवल एक वित्तीय सब्सिडी या कर्ज बांटने का सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन कारीगरी परंपरा को आधुनिक तकनीक और वैश्विक मूल्य श्रृंखला से जोड़ने का एक समग्र परिवर्तनकारी मॉडल है। इस योजना के चार प्रमुख रणनीतिक उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. औपचारिक पहचान और सामाजिक सम्मान: सदियों से असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले कारीगरों को आधिकारिक पहचान पत्र और ‘पीएम विश्वकर्मा प्रमाण पत्र’ देकर उन्हें समाज और बैंकिंग प्रणाली में सम्मानित दर्जा दिलाना।
2. कौशल संवर्धन (Skill Upgradation): पारंपरिक औजारों और पुरानी विधियों से काम करने वाले शिल्पकारों को आधुनिक तकनीक, नए डिजाइनों और समय की बचत करने वाले उन्नत उपकरणों का प्रशिक्षण देना।
3. वित्तीय समावेशन और संपार्श्विक-मुक्त सस्ता ऋण: कारीगरों को स्थानीय सूदखोरों और साहूकारों के भारी ब्याज के चंगुल से मुक्त कर बैंकों के माध्यम से नाममात्र की 5 प्रतिशत ब्याज दर पर बिना किसी गिरवी (Collateral-Free) के 3 लाख रुपये तक का संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना।
4. बाजार पहुंच और वैश्विक ब्रांडिंग: पारंपरिक उत्पादों को स्थानीय हाट-बाजारों से निकालकर आधुनिक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स (GeM, ONDC, Amazon, Flipkart) पर वैश्विक उपभोक्ताओं तक पहुंचाना और उनकी ब्रांडिंग व पैकेजिंग में मदद करना।
योजना के अंतर्गत शामिल 18 पारंपरिक व्यवसाय (Trades)
पीएम विश्वकर्मा योजना के प्रथम चरण में 18 पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कारीगरों और शिल्पकारों को शामिल किया गया है जो अपने हाथों और पारंपरिक औजारों से कार्य करते हैं:
1. लकड़ी आधारित शिल्प:
– बढ़ई (Carpenter / Suthar): लकड़ी के फर्नीचर, दरवाजे, खिड़कियां और घरेलू सामान बनाने वाले कारीगर।
– नाव निर्माता (Boat Maker): नदियों और तटीय क्षेत्रों में पारंपरिक लकड़ी की नावें बनाने वाले कारीगर।
2. लौह एवं धातु आधारित शिल्प:
– लोहार (Blacksmith): कृषि औजार, कुल्हाड़ी, फावड़ा और लोहे के दैनिक उपकरण बनाने वाले कारीगर।
– अस्त्र निर्माता (Armourer): पारंपरिक तलवारें, ढाल और ऐतिहासिक धातु कलाकृतियां बनाने वाले।
– हथौड़ा और टूलकिट निर्माता (Hammer and Tool Kit Maker): औजार बनाने और उनकी धार तेज करने वाले कारीगर।
– ताला बनाने वाले (Locksmith): पारंपरिक चाबी-ताले की मरम्मत और निर्माण करने वाले।
– कांस्य, पीतल और तांबे के बर्तन निर्माता: धातु ढलाई और बर्तन बनाने वाले शिल्पी।
3. मिट्टी आधारित शिल्प:
– कुम्हार (Potter): मिट्टी के बर्तन, दीये, मटके, सुराही और सजावटी टेराकोटा कलाकृतियां बनाने वाले।
4. पत्थर एवं मूर्तिकला आधारित शिल्प:
– मूर्तिकार (Sculptor / Stone Carver): पत्थर की मूर्तियां, नक्काशीदार खंभे और शिलाशिल्प तराशने वाले।
– पत्थर तोड़ने वाले (Stone Breaker): निर्माण कार्यों के लिए पत्थर तराशने वाले श्रमिक।
5. चमड़ा आधारित शिल्प:
– मोची / जूता निर्माता (Cobbler / Shoemaker): पारंपरिक चमड़े के जूते, मोजड़ी, चप्पल और चमड़े के सामान बनाने व मरम्मत करने वाले।
6. निर्माण एवं वास्तु आधारित शिल्प:
– राजमिस्त्री (Mason): मकान, मंदिर और भवनों का ईंट-गारे से निर्माण करने वाले कारीगर।
7. प्राकृतिक रेशा एवं हस्तशिल्प:
– टोकरी, चटाई, झाड़ू निर्माता (Basket/Mat/Broom Maker / Coir Weaver): बांस, बेंत, जूट और नारियल के रेशे से उत्पाद बनाने वाले।
– पारंपरिक गुड़िया और खिलौना निर्माता (Doll and Toy Maker): लकड़ी, कपड़े और मिट्टी के पारंपरिक देशी खिलौने बनाने वाले।
8. व्यक्तिगत सेवाएं एवं स्वच्छता शिल्प:
– नाई (Barber / Hairdresser): बाल काटने और सौंदर्य सेवाएं देने वाले।
– मालाकार / फूल माला निर्माता (Garland Maker): पूजा, उत्सवों और विवाह के लिए फूल मालाएं तैयार करने वाले।
– धोबी (Washerman): कपड़े धोने और प्रेस करने वाले।
– दर्जी (Tailor): कपड़े सिलने और परिधान तैयार करने वाले।
– मछली का जाल निर्माता (Fishing Net Maker): तटीय और अंतर्देशीय मछुआरों के लिए जाल बुनने वाले कारीगर।
चित्र: प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत पारंपरिक शिल्पकारों को आधुनिक कौशल, टूलकिट और वित्तीय संबल
योजना के प्रमुख लाभ: पांच-स्तरीय समग्र सहायता तंत्र
पीएम विश्वकर्मा योजना पात्र कारीगरों को निम्नलिखित पांच प्रत्यक्ष लाभ प्रदान करती है:
1. आधिकारिक पहचान और सम्मान:
योजना में पंजीकृत होते ही लाभार्थी को एक विशिष्ट डिजिटल ‘पीएम विश्वकर्मा प्रमाण पत्र’ (PM Vishwakarma Certificate) और एक फोटोयुक्त ‘डिजिटल आईडी कार्ड’ प्रदान किया जाता है। यह प्रमाण पत्र राष्ट्रीय स्तर पर उसकी पेशेवर कारीगरी का आधिकारिक दस्तावेज होता है जिसकी मान्यता पूरे देश के बैंकों, सरकारी विभागों और उद्योगों में होती है।
2. कौशल संवर्धन (Skill Training) और दैनिक वजीफा:
कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय द्वारा पंजीकृत कारीगरों को दो स्तरों पर अत्याधुनिक प्रशिक्षण दिया जाता है:
– बुनियादी कौशल प्रशिक्षण (Basic Training): 5 से 7 दिनों (लगभग 40 घंटे) का सघन व्यावहारिक प्रशिक्षण जिसमें नए टूल्स का संचालन, सुरक्षा मानक और आधुनिक ग्राहक मांग के अनुरूप डिजाइन सिखाए जाते हैं।
– उन्नत कौशल प्रशिक्षण (Advanced Training): जो कारीगर अपने हुनर को और अधिक निखारना चाहते हैं, उन्हें 15 दिन या उससे अधिक का विशेष मास्टर-क्लास प्रशिक्षण दिया जाता है।
– ₹500 प्रतिदिन का वजीफा: प्रशिक्षण के दौरान कारीगर की दैनिक मजदूरी का नुकसान न हो, इसके लिए सरकार द्वारा प्रशिक्षण के प्रत्येक दिन ₹500 का प्रत्यक्ष वजीफा (Stipend) सीधे उसके बैंक खाते में डीबीटी (DBT) के माध्यम से जमा किया जाता है।
3. टूलकिट प्रोत्साहन: ₹15,000 की सीधी सहायता:
बुनियादी कौशल प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने पर प्रत्येक विश्वकर्मा को आधुनिक, डिजिटल और उच्च-सटीक टूलकिट खरीदने के लिए 15,000 रुपये का वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाता है। यह सहायता ‘ई-रूपी’ (e-RUPI) डिजिटल वाउचर या सीधे डीबीटी के माध्यम से बैंक खाते में हस्तांतरित की जाती है। उदाहरण के लिए बढ़ई को इलेक्ट्रिक कटर और सैंडर, दर्जी को ऑटोमैटिक मोटर सिलाई मशीन, और नाई को आधुनिक ट्रिमर व सेनेटरी किट खरीदने की सुविधा मिलती है।
4. संपार्श्विक-मुक्त रियायती ऋण सहायता (₹3 लाख तक):
अपने व्यवसाय के विस्तार, कच्चा माल खरीदने और आधुनिक वर्कशॉप स्थापित करने के लिए बिना किसी अचल संपत्ति को गिरवी रखे (Collateral-Free) दो किस्तों में रियायती ऋण दिया जाता है:
– प्रथम किस्त (First Tranche): बुनियादी प्रशिक्षण पूरा करने पर ₹1,00,000 तक का ऋण, जिसे 18 महीने की आसान मासिक किस्तों में चुकाना होता है।
– द्वितीय किस्त (Second Tranche): पहली किस्त का समय पर पुनर्भुगतान करने और डिजिटल लेनदेन अपनाने पर ₹2,00,000 तक का अतिरिक्त ऋण, जिसे 30 महीने की अवधि में चुकाया जा सकता है।
– मात्र 5% की रियायती ब्याज दर: वाणिज्यिक बैंक इस ऋण पर बाजार दर (लगभग 13%) लगाते हैं, परंतु केंद्र सरकार द्वारा 8 प्रतिशत की सीधी ब्याज छूट (Interest Subvention) वहन की जाती है, जिससे लाभार्थी को केवल 5 प्रतिशत की न्यूनतम वार्षिक ब्याज दर चुकानी होती है। इसके अतिरिक्त ऋण की पूरी क्रेडिट गारंटी (Credit Guarantee) केंद्र सरकार स्वयं वहन करती है।
5. डिजिटल लेनदेन प्रोत्साहन और विपणन सहायता:
कारीगरों को कैशलेस अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए प्रत्येक डिजिटल बिक्री लेन-देन पर ₹1 का प्रत्यक्ष कैशबैक (प्रतिमाह अधिकतम 100 लेन-देन तक ₹100 प्रतिमाह) दिया जाता है। इसके साथ ही राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC) के माध्यम से कारीगरों के उत्पादों को सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM), ओएनडीसी (ONDC) और बड़े खुदरा शोरूमों में सूचीबद्ध कराकर वैश्विक बिक्री के अवसर दिए जाते हैं।
पात्रता मानदंड और अपात्रता की शर्तें
योजना का लाभ केवल वास्तविक और जरूरतमंद पारंपरिक कारीगरों तक पहुंचे, इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं:
1. पात्रता मानदंड:
– आवेदक की न्यूनतम आयु आवेदन की तिथि पर कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।
– आवेदक हाथों और औजारों से काम करने वाले उल्लिखित 18 पारंपरिक शिल्पों में से किसी एक में सक्रिय रूप से कार्यरत होना चाहिए।
– परिवार की परिभाषा: योजना के तहत एक परिवार (पति, पत्नी और अविवाहित बच्चे) में से केवल एक ही सदस्य को योजना का लाभ मिल सकता है।
2. अपात्रता की शर्तें:
– आवेदक या उसके परिवार का कोई भी सदस्य सरकारी सेवा (केंद्र या राज्य सरकार, सार्वजनिक उपक्रम) में नहीं होना चाहिए।
– आवेदक ने पिछले 5 वर्षों में केंद्र या राज्य सरकार की किसी अन्य समान स्वरोजगार या ऋण योजना (जैसे पीएमईजीपी – PMEGP, पीएम स्वनिधि, या मुद्रा लोन) के तहत ऋण न लिया हो (यदि पूर्व ऋण पूरी तरह चुकता हो चुका हो, तो वह पात्र हो सकता है)।
ऑनलाइन आवेदन और तीन-स्तरीय सत्यापन प्रक्रिया
योजना में आवेदन करने की प्रक्रिया पूर्णतः डिजिटल, पारदर्शी और निःशुल्क है। कारीगर अपने नजदीकी सामान्य सेवा केंद्र (CSC – Common Services Centre) पर जाकर आधार बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के माध्यम से ‘pmvishwakarma.gov.in’ पोर्टल पर आवेदन कर सकते हैं:
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए तीन-स्तरीय सत्यापन (Three-tier Verification) व्यवस्था लागू है:
1. प्रथम स्तर: ग्रामीण क्षेत्रों में संबंधित ग्राम पंचायत के मुखिया/प्रधान द्वारा और शहरी क्षेत्रों में नगर निकाय (ULB) के कार्यकारी अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन।
2. द्वितीय स्तर: जिला कार्यान्वयन समिति (District Implementation Committee – DIC), जिसकी अध्यक्षता जिला कलेक्टर या महाप्रबंधक (GM DIC) करते हैं, द्वारा दस्तावेजों की गहन जांच।
3. तृतीय स्तर: राज्य स्तरीय एवं राष्ट्रीय संचालन समिति द्वारा अंतिम अनुमोदन और डिजिटल आईडी कार्ड का निर्गमन।
आधिकारिक संदर्भ एवं अधिकृत जानकारी के स्रोत
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के आधिकारिक दिशा-निर्देशों, ऑनलाइन पंजीकरण, पात्रता नियमों और हेल्पलाइन की अधिकृत जानकारी हेतु नागरिक निम्नलिखित आधिकारिक सरकारी पोर्टलों का संदर्भ ले सकते हैं:
1. प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना आधिकारिक राष्ट्रीय पोर्टल (PM Vishwakarma)
2. सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार (Ministry of MSME)
3. कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE India)
4. वित्तीय सेवाएं विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार (DFS Portal)
5. कॉमन सर्विसेज सेंटर आधिकारिक पोर्टल (CSC e-Governance Services)
6. गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM – सरकारी खरीद एवं कारीगर उत्पाद पोर्टल)
पारंपरिक अनौपचारिक व्यवस्था बनाम पीएम विश्वकर्मा योजना का संस्थागत मॉडल
स्वतंत्रता के सात दशकों तक भारतीय शिल्पकारों की जो असहाय स्थिति थी और वर्तमान पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत जो संस्थागत क्रांति आई है, उसके बीच का अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। जहां पुरानी व्यवस्था में कारीगर स्थानीय साहूकारों के भारी कर्ज और बिचौलियों के शोषण में पिसते थे, वहीं नई व्यवस्था उन्हें वित्तीय संप्रभुता, आधुनिक तकनीक और वैश्विक पहचान प्रदान करती है।
नीचे दी गई तुलनात्मक तालिका पारंपरिक अनौपचारिक कार्यप्रणाली और पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत क्रियान्वित आधुनिक संस्थागत मॉडल के प्रमुख मापदंडों का स्पष्ट और निष्पक्ष विश्लेषण प्रस्तुत करती है:
| प्रमुख मापदंड (Parameter) | पारंपरिक अनौपचारिक व्यवस्था (पूर्ववर्ती स्थिति) | पीएम विश्वकर्मा योजना (वर्तमान संस्थागत मॉडल) |
|---|---|---|
| व्यावसायिक पहचान | कोई आधिकारिक पहचान नहीं, असंगठित मजदूर का दर्जा | डिजिटल पीएम विश्वकर्मा प्रमाण पत्र और राष्ट्रीय पहचान पत्र (ID Card) |
| ऋण एवं ब्याज दर | साहूकारों से 24% से 36% वार्षिक भारी ब्याज, बंधुआ मजदूरी का खतरा | बिना किसी गारंटी (Collateral-free) के ₹3 लाख तक ऋण, मात्र 5% ब्याज दर |
| औजार एवं उपकरण | पीढ़ियों पुराने धीमे और अत्यधिक थकाने वाले हस्तनिर्मित औजार | आधुनिक टूल्स खरीदने के लिए ₹15,000 का निःशुल्क ई-वाउचर अनुदान |
| कौशल विकास प्रशिक्षण | शून्य औपचारिक प्रशिक्षण, नए डिजाइनों और तकनीक से अनभिज्ञ | मास्टर ट्रेनर्स द्वारा 5-15 दिन का प्रशिक्षण + ₹500 प्रतिदिन का नकद वजीफा |
| बाजार एवं बिक्री दायरा | स्थानीय साप्ताहिक हाट या गांव तक सीमित, बिचौलियों द्वारा भारी कमीशन | GeM, ONDC, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर राष्ट्रीय एवं वैश्विक सीधी बिक्री |
यह तुलनात्मक विश्लेषण सिद्ध करता है कि पीएम विश्वकर्मा योजना ने पारंपरिक कारीगरी को केवल एक गुजारे का पेशा न रखकर उसे एक सम्मानजनक, लाभदायक और आधुनिक उद्यम में बदल दिया है।
ओडीओपी (One District One Product) और जीआई टैग्स (GI Tags) के साथ अभिसरण
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ‘एक जिला एक उत्पाद’ (One District One Product – ODOP) योजना और भौगोलिक उपदर्शन (Geographical Indications – GI Tags) के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। भारत के प्रत्येक जिले की अपनी एक विशिष्ट हस्तशिल्प और कला पहचान है:
1. विरासत शिल्पों का संरक्षण: उत्तर प्रदेश के भदोही के हस्तनिर्मित कालीन, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन, वाराणसी की रेशमी साड़ियां, कर्नाटक के चन्नापटना के लकड़ी के खिलौने, राजस्थान की ब्लू पॉटरी, और कश्मीर की पश्मीना शॉल जैसे विश्व-प्रसिद्ध शिल्पों के कारीगरों को पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत विशेष सहायता दी जा रही है।
2. जीआई टैगिंग और नकली उत्पादों से सुरक्षा: स्थानीय कारीगरों को जीआई टैग के तहत पंजीकृत कराया जा रहा है ताकि मशीनी फैक्ट्रियों द्वारा उनके डिजाइनों की नकली प्रतियां बनाकर बाजार में बेचने पर कड़ा कानूनी प्रतिबंध लगाया जा सके।
3. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी: दिल्ली हाट, सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला और वैश्विक व्यापार मेलों में विश्वकर्मा कारीगरों के लिए निःशुल्क स्टॉल आवंटित किए जाते हैं जिससे उन्हें बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों से सीधे थोक ऑर्डर प्राप्त होते हैं।
कौशल विकास केंद्रों की भूमिका और राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (NOS)
पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत दिया जाने वाला प्रशिक्षण किसी पारंपरिक अनौपचारिक कक्षा की तरह नहीं होता। इसे ‘राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण परिषद’ (NCVET) और संबंधित सेक्टर स्किल काउंसिल्स (जैसे Furniture & Fittings SSC, Leather SSC, Apparel SSC) द्वारा तैयार किए गए ‘राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों’ (National Occupational Standards – NOS) के अनुसार संचालित किया जाता है:
प्रशिक्षण के मुख्य तकनीकी आयाम:
1. आधुनिक उपकरण संचालन: पारंपरिक हाथ की आरी के स्थान पर सर्कुलर सॉ, जिग सॉ, राउटर मशीन और सीएनसी मशीनों का व्यावहारिक संचालन सिखाना।
2. डिजिटल डिजाइन और 3डी मॉडलिंग: कारीगरों को कंप्यूटर और टैबलेट पर 3डी कैड (CAD) डिजाइनों को समझना और आधुनिक ग्राहकों की पसंद के अनुसार मिनिमलिस्टिक व एर्गोनॉमिक उत्पाद बनाना सिखाया जाता है।
3. वित्तीय साक्षरता और डिजिटल बैंकिंग: यूपीआई क्यूआर कोड (QR Code) जनरेट करना, ऑनलाइन भुगतान स्वीकार करना, जीएसटी के बुनियादी नियम और बैंक खातों का सुरक्षित संचालन।
4. कार्यस्थल सुरक्षा और व्यावसायिक स्वास्थ्य: जहरीली धूल, रसायनों और औजारों के संचालन के दौरान दस्ताने, सुरक्षात्मक चश्मे और फेस मास्क के उपयोग की आदत डालना जिससे कारीगरों के स्वास्थ्य की रक्षा हो सके।
डिजिटल कॉमर्स में एकीकरण: ओएनडीसी (ONDC) और जेम (GeM) पोर्टल
कारीगरों के शोषण का सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि उनके और अंतिम उपभोक्ता के बीच 3 से 4 स्तरों के बिचौलिए (दलाल और आढ़ती) होते थे जो कारीगर को मात्र 100 रुपये देकर वही उत्पाद महानगरों में 1,000 रुपये में बेचते थे। डिजिटल इंडिया ने इस बिचौलिया संस्कृति पर अंतिम प्रहार किया है:
1. ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC): वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया ओएनडीसी एक खुला ई-कॉमर्स प्रोटोकॉल है। इसके माध्यम से एक सुदूर गांव का छोटा बढ़ई या कुम्हार भी बिना किसी भारी कमीशन के सीधे देश भर के करोड़ों ऑनलाइन खरीदारों से जुड़ जाता है।
2. गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM): केंद्र और राज्य सरकारों के सभी विभागों और मंत्रालयों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे अपने कार्यालयों के लिए आवश्यक फर्नीचर, उपहार, पर्दे और हस्तशिल्प उत्पादों का एक निश्चित कोटा सीधे जेम पोर्टल पर पंजीकृत पीएम विश्वकर्मा कारीगरों से ही खरीदें।
3. भारतीय डाक और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क: इंडिया पोस्ट के विशाल ग्रामीण डाकघरों के नेटवर्क को ओएनडीसी से जोड़ा गया है, जिससे खरीदार द्वारा ऑनलाइन ऑर्डर करते ही ग्रामीण डाकिया कारीगर के घर से पार्सल पिकअप कर देश के किसी भी कोने में सुरक्षित डिलीवर कर देता है।
सामाजिक सुरक्षा और बीमा कवच का विस्तार
पारंपरिक कारीगर असंगठित क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण किसी भी आकस्मिक बीमारी, दुर्घटना या बुढ़ापे में पूर्णतः असहाय हो जाते थे। पीएम विश्वकर्मा योजना इन कारीगरों को भारत सरकार की प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के साथ अभिसरित (Converge) करती है:
1. प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY): मात्र ₹20 प्रतिवर्ष के प्रीमियम पर ₹2 लाख का दुर्घटना मृत्यु और पूर्ण दिव्यांगता बीमा कवर।
2. प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY): ₹436 प्रतिवर्ष के प्रीमियम पर ₹2 लाख का सामान्य जीवन बीमा कवर।
3. आयुष्मान भारत (PM-JAY): कारीगर और उसके पूरे परिवार को देश के सर्वश्रेष्ठ अस्पतालों में प्रतिवर्ष ₹5 लाख तक का शत-प्रतिशत निःशुल्क इलाज का गोल्डन कार्ड।
4. प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना (PM-SYM): 60 वर्ष की आयु पूरी होने के पश्चात कारीगर को जीवन भर ₹3,000 प्रतिमाह की सुनिश्चित न्यूनतम पेंशन की गारंटी।
महिला विश्वकर्माओं का सशक्तिकरण: सिलाई, खिलौने और टोकरी निर्माण
पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत 18 व्यवसायों में महिलाओं की भारी भागीदारी दर्ज की जा रही है। विशेष रूप से दर्जी (Tailor), पारंपरिक गुड़िया व खिलौना निर्माता, टोकरी व चटाई निर्माता और मालाकार व्यवसायों में लाखों ग्रामीण महिलाएं पंजीकृत हो रही हैं:
1. स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के साथ तालमेल: दीनदयाल अंत्योदय योजना (DAY-NRLM) के तहत गठित महिला स्वयं सहायता समूहों को सीधे पीएम विश्वकर्मा योजना से जोड़ा गया है।
2. आधुनिक सिलाई और बुटीक केंद्र: ग्रामीण महिलाओं को आधुनिक एम्ब्रॉयडरी, पिको और इंटरलॉकिंग मशीनों की टूलकिट मिलने से वे अपने ही गांव में स्वतंत्र गारमेंट और बुटीक सेंटर चला रही हैं।
3. आर्थिक स्वावलंबन और सम्मान: घर की दहलीज पर बैठकर प्रतिमाह ₹15,000 से ₹25,000 की नियमित आमदनी अर्जित कर महिलाएं अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा और परिवार की समृद्धि में निर्णायक योगदान दे रही हैं।
भारत में पारंपरिक शिल्पों का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विकासक्रम
भारत की सभ्यतागत यात्रा में विश्वकर्मा समुदाय और पारंपरिक शिल्पियों का योगदान अत्यंत गौरवशाली रहा है। प्राचीन वैदिक काल से लेकर मध्यकाल तक भारत का सामाजिक और आर्थिक ढांचा इन हुनरमंद शिल्पकारों की कुशलता पर टिका हुआ था:
1. प्राचीन श्रेणी व्यवस्था: प्राचीन भारत में शिल्पकारों और व्यापारियों के संगठित गिल्ड्स जिन्हें ‘श्रेणी’ (Shreni) कहा जाता था, अत्यंत शक्तिशाली और स्वायत्त संस्थान थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और बौद्ध जातक कथाओं में विभिन्न श्रेणियों के नियमों, गुणवत्ता मानकों और मूल्य निर्धारण का विस्तृत वर्णन मिलता है।
2. सिंधु घाटी से चोल कांस्य मूर्तियां: हड़प्पा सभ्यता की धातु विज्ञान और मूर्तिकला की तकनीक से लेकर दक्षिण भारत के चोल राजवंश की नटराज और देवी-देवताओं की विख्यात कांस्य मूर्तियों का निर्माण लॉस्ट-वैक्स पद्धति (Lost-wax casting) द्वारा विश्वकर्मा मूर्तिकारों ने ही संपन्न किया था।
3. स्थापत्य और मंदिर वास्तुकला: कोणार्क का सूर्य मंदिर, एलोरा का कैलास मंदिर, तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर और खजुराहो के भव्य मंदिरों का निर्माण इन्हीं पारंपरिक पाषाण शिल्पियों और वास्तुकारों के अद्वितीय वैज्ञानिक और ज्यामितीय ज्ञान का जीवंत प्रमाण है।
4. वस्त्र और काष्ठ कला: ढाका की मलमल, चंदेरी और बनारसी रेशम के बुनकर तथा कश्मीर की नक्काशीदार अखरोट की लकड़ी की कलाकृतियों ने दुनिया भर के बाजारों में भारत को ‘सोने की चिड़िया’ की उपाधि दिलाई थी। औपनिवेशिक काल में मशीनी औद्योगीकरण के कारण यह वैभव प्रभावित हुआ था, जिसे अब पीएम विश्वकर्मा योजना के माध्यम से पुनः जीवित किया जा रहा है।
क्रेडिट गारंटी और जोखिम शमन संरचना: CGTMSE की रणनीतिक भूमिका
पारंपरिक कारीगरों को बैंकों से बिना किसी गिरवी संपत्ति के ऋण दिलाना हमेशा से एक बड़ी बैंकिंग चुनौती रहा है क्योंकि वाणिज्यिक बैंक अनौपचारिक क्षेत्र के कारीगरों को उच्च जोखिम श्रेणी में मानते थे। भारत सरकार ने इस बाधा को समाप्त करने के लिए एक विशेष गारंटी तंत्र स्थापित किया है:
1. क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट (CGTMSE): सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए स्थापित क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट इस योजना के तहत दिए जाने वाले शत-प्रतिशत ऋणों को गारंटी कवरेज प्रदान करता है। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई कारीगर प्राकृतिक आपदा या गंभीर संकट के कारण ऋण चुकाने में असमर्थ होता है, तो बैंक को वित्तीय हानि नहीं होती।
2. बैंक शाखाओं के लिए सरलीकृत दिशा-निर्देश: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) और सहकारी बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे विश्वकर्मा आवेदनों को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending – PSL) के तहत बिना किसी अनावश्यक आपत्ति के 15 दिनों के भीतर स्वीकृत करें।
3. ब्याज अनुदान (Interest Subvention) का सीधा हस्तांतरण: बैंक लाभार्थी से केवल 5 प्रतिशत की रियायती दर पर ब्याज वसूलते हैं, जबकि शेष 8 प्रतिशत तक की ब्याज राशि केंद्र सरकार द्वारा सीधे बैंक को सब्सिडी के रूप में प्रतिपूर्ति की जाती है।
डिजिटल भुगतान प्रोत्साहन और वित्तीय समावेशन का माइक्रो-मॉडल
पीएम विश्वकर्मा योजना केवल ऋण और प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक कारीगरों को डिजिटल अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जोड़ने का एक व्यापक वित्तीय समावेशन अभियान है:
1. डिजिटल ट्रांजेक्शन इंसेंटिव (₹1 प्रति लेन-देन): प्रत्येक कारीगर को डिजिटल क्यूआर कोड और यूपीआई के माध्यम से भुगतान स्वीकार करने पर प्रति लेन-देन ₹1 का सीधा नकद प्रोत्साहन दिया जाता है, जो प्रति माह अधिकतम 100 लेन-देन (₹100 प्रतिमाह) तक मान्य है। यह राशि सीधे उनके बैंक खाते में क्रेडिट होती है।
2. डिजिटल फुटप्रिंट और क्रेडिट स्कोर निर्माण: नियमित डिजिटल लेन-देन करने से कारीगरों का एक औपचारिक वित्तीय इतिहास (Credit Footprint) तैयार होता है। इस रिकॉर्ड के आधार पर भविष्य में बैंक उन्हें बिना किसी कागजी औपचारिकता के बड़े व्यावसायिक ऋण (Mudra Loan या SME Loan) आसानी से मंजूर कर देते हैं।
3. नाबार्ड और अग्रणी बैंकों द्वारा वित्तीय साक्षरता: ग्रामीण स्तर पर लीड बैंक प्रबंधकों (LDMs) और नाबार्ड के सहयोग से वित्तीय साक्षरता शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जहां कारीगरों को डिजिटल फ्रॉड से बचाव, पिन सुरक्षा और ऑनलाइन पासबुक संचालन का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाता है।
राज्य-स्तरीय नोडल एजेंसियां और त्रि-स्तरीय निगरानी तंत्र
योजना के पारदर्शी और प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच एक मजबूत त्रि-स्तरीय प्रशासनिक और तकनीकी समन्वय स्थापित किया गया है:
1. राष्ट्रीय संचालन समिति (National Steering Committee): केंद्रीय एमएसएमई मंत्री की अध्यक्षता में गठित यह सर्वोच्च समिति नीतिगत निर्णय, बजट आवंटन और अंतर-मंत्रालयी समन्वय की देखरेख करती है।
2. राज्य स्तरीय निगरानी समिति (SLMC): प्रत्येक राज्य के उद्योग एवं एमएसएमई विभाग के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में राज्य समिति जिलों में प्रशिक्षण केंद्रों, मास्टर ट्रेनर्स की उपलब्धता और बैंकों के साथ ऋण समन्वय की समीक्षा करती है।
3. जिला क्रियान्वयन समिति (DIC): प्रत्येक जिले में जिला कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट (DM) की अध्यक्षता में जिला उद्योग केंद्र (DIC) के महाप्रबंधक द्वारा दैनिक संचालन की निगरानी की जाती है।
4. जमीनी सत्यापन की पारदर्शिता: ग्राम प्रधान और नगर पालिका अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले भौतिक सत्यापन में किसी भी प्रकार के पक्षपात को रोकने के लिए जियो-टैग्ड फोटोग्राफ और आधार बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन को अनिवार्य बनाया गया है।
सामुदायिक क्लस्टर विकास और कॉमन फैसिलिटी सेंटर्स (CFC)
व्यक्तिगत स्तर पर सहायता देने के साथ-साथ योजना के तहत कारीगरों के सामूहिक विकास के लिए शिल्प समूहों (Artisan Clusters) का गठन किया जा रहा है:
1. कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFC) की स्थापना: जिन क्षेत्रों में एक ही शिल्प के सैकड़ों कारीगर कार्यरत हैं, वहां केंद्र सरकार आधुनिक मशीनरी और सुविधाओं से युक्त साझा सुविधा केंद्र स्थापित कर रही है। उदाहरण के लिए, काष्ठ शिल्प क्लस्टर में लकड़ी को सुखाने (Kiln Seasoning) और रासायनिक उपचार के बड़े प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं, जिनका उपयोग सभी स्थानीय बढ़ई मामूली शुल्क देकर कर सकते हैं।
2. कच्चे माल की थोक खरीद में बचत: कारीगर सहकारी समितियों के माध्यम से स्टील, पीतल, लकड़ी और धागे जैसे कच्चे माल की थोक खरीद कर सकते हैं, जिससे उत्पादन लागत में 15 से 20 प्रतिशत की भारी कमी आती है।
3. आधुनिक पैकेजिंग और ब्रांडिंग यूनिट: क्लस्टर स्तर पर आकर्षक इको-फ्रेंडली पैकेजिंग और ब्रांड लेबलिंग की मशीनें लगाई जा रही हैं ताकि ग्रामीण कारीगरों के उत्पाद बड़े मॉल और सुपरमार्केट में रखे जाने योग्य बन सकें।
पर्यावरणीय संधारणीयता और हरित शिल्प पद्धतियां (Green Crafting)
वैश्विक स्तर पर पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। पीएम विश्वकर्मा योजना भारतीय शिल्पकारों को हरित तकनीकों को अपनाने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित कर रही है:
1. प्राकृतिक और गैर-विषाक्त रंगों का प्रयोग: वस्त्र और खिलौना निर्माण में रासायनिक रंगों के स्थान पर नील (Indigo), हल्दी, अनार के छिलके और प्राकृतिक गोंद से बने रंगों के उपयोग को प्रशिक्षण में सिखाया जा रहा है।
2. प्लास्टिक विकल्पों का प्रसार: कुम्हारों द्वारा मिट्टी के पानी के बर्तन, कुल्हड़ और सजावटी उत्पाद तथा टोकरी निर्माताओं द्वारा बांस और बेंत के उत्पाद सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के सबसे सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रहे हैं।
3. ऊर्जा-कुशल और सौर संचालित उपकरण: कुम्हारों के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाले आधुनिक चाक और धातु कारीगरों के लिए धुआं-मुक्त भट्ठियों (Smokeless Furnaces) को टूलकिट पैकेज में प्राथमिकता दी जा रही है जिससे कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आ रही है।
4. शून्य अपशिष्ट शिल्प संस्कृति: भारतीय कारीगर स्वभाव से ही चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के अग्रदूत रहे हैं। मोची पुराने चमड़े और रबर को रीसायकल करते हैं, जबकि लोहार स्क्रैप लोहे को पिघलाकर नए कृषि औजार बनाते हैं। इस परंपरा को वैज्ञानिक मान्यता प्रदान की जा रही है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और निर्यात संवर्धन: विश्वकर्मा से वैश्विक ब्रांड
भारत सरकार का दीर्घकालिक विजन देश के पारंपरिक शिल्पकारों को केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित न रखकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय निर्यात श्रृंखलाओं का अभिन्न अंग बनाना है:
1. निर्यात संवर्धन परिषदों (EPCH) के साथ साझेदारी: हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (Export Promotion Council for Handicrafts) के साथ मिलकर शिल्पकारों को निर्यात प्रक्रियाओं, अंतरराष्ट्रीय पैकेजिंग मानकों और बारकोड कोडिंग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
2. ई-कॉमर्स निर्यात हब (ECEH): प्रमुख डाकघरों और कंटेनर डिपो के पास ई-कॉमर्स निर्यात केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं जहां विश्वकर्मा कारीगरों के उत्पादों को सीमा शुल्क (Customs) और डाक औपचारिकताओं से तेजी से मंजूरी दी जाती है।
3. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ बी2बी लिंकेज: वैश्विक खुदरा कंपनियों और होटल श्रृंखलाओं के साथ सीधे करार किए जा रहे हैं ताकि वे अपने इंटीरियर डेकोरेशन, होटल लिनन और स्मृति चिन्हों (Souvenirs) के लिए सीधे पंजीकृत विश्वकर्मा कारीगरों से आपूर्ति प्राप्त करें।
विश्वकर्मा युवाओं के लिए नवाचार और उद्यमिता इनक्यूबेशन
पारंपरिक कारीगरी के क्षेत्र में नई पीढ़ी की रुचि बनाए रखने के लिए तकनीकी संस्थानों और डिजाइन अकादमियों को इस मिशन से जोड़ा गया है:
1. राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (NID) और आईआईटी इनक्यूबेशन: युवा शिल्पकारों को आधुनिक डिजाइन सिद्धांतों, उत्पाद सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) और एर्गोनॉमिक्स का विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है जिससे वे सदियों पुरानी परंपरा को आधुनिक युवा पीढ़ी की जीवनशैली के अनुरूप ढाल सकें।
2. क्राफ्ट स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन: विश्वकर्मा परिवारों के जो शिक्षित युवा अपने पैतृक कार्य को एक आधुनिक ब्रांड और स्टार्टअप के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, उन्हें ‘स्टार्टअप इंडिया’ के तहत सीड फंडिंग और बौद्धिक संपदा (IPR) पंजीकरण में विशेष रियायतें दी जा रही हैं।
3. डिजिटल कैटलॉगिंग और सोशल मीडिया मार्केटिंग: इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे सोशल प्लेटफॉर्म पर अपने हस्तशिल्प की निर्माण प्रक्रिया (Making Videos) साझा करके दुनिया भर के ग्राहकों को आकर्षित करने की तकनीक सिखाई जा रही है।
शिकायत निवारण तंत्र और पारदर्शी हेल्पलाइन संरचना
योजना के अंतर्गत किसी भी कारीगर को किसी बैंक, सीएससी केंद्र या प्रशिक्षण संस्थान में असुविधा न हो, इसके लिए एक मजबूत शिकायत निवारण प्रणाली लागू की गई है:
1. राष्ट्रीय विश्वकर्मा टोल-फ्री हेल्पलाइन: देश भर के कारीगर अपनी मातृभाषा में जानकारी प्राप्त करने या शिकायत दर्ज करने के लिए टोल-फ्री नंबर 1800-267-7777 अथवा 011-23061500 पर संपर्क कर सकते हैं।
2. सीपीग्राम्स (CPGRAMS) के साथ एकीकरण: पोर्टल पर दर्ज प्रत्येक शिकायत की नियमित निगरानी केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय द्वारा की जाती है और 7 कार्य दिवसों के भीतर समाधान सुनिश्चित किया जाता है।
3. फीडबैक लूप और गुणवत्ता ऑडिट: प्रशिक्षण पूरा करने वाले प्रत्येक लाभार्थी से फोन कॉल द्वारा सीधे फीडबैक लिया जाता है ताकि प्रशिक्षण की गुणवत्ता और टूलकिट वितरण में शत-प्रतिशत निष्पक्षता बनी रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पीएम विश्वकर्मा योजना का कुल बजट कितना है?
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के लिए भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2023-24 से 2027-28 तक की पांच वर्षों की अवधि के लिए 13,000 करोड़ रुपये का शत-प्रतिशत केंद्रीय बजट आवंटित किया है।
2. क्या इस योजना में आवेदन करने के लिए कोई फीस देनी पड़ती है?
बिल्कुल नहीं। सामान्य सेवा केंद्रों (CSC) पर आवेदन करने का पूरा खर्च सरकार वहन करती है। कारीगरों के लिए पंजीकरण, प्रमाण पत्र और पहचान पत्र पूरी तरह निःशुल्क है।
3. क्या ऋण लेने के लिए कोई जमीन या मकान के कागजात गिरवी रखने होते हैं?
कदापि नहीं। यह ऋण पूरी तरह संपार्श्विक-मुक्त (Collateral-Free) होता है। इसके लिए किसी गारंटर या गिरवी की आवश्यकता नहीं होती; भारत सरकार की क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट योजना इसके लिए गारंटी प्रदान करती है।
4. ₹15,000 की टूलकिट सहायता का उपयोग कैसे किया जाता है?
बुनियादी कौशल प्रशिक्षण पूरा होने के बाद लाभार्थी के मोबाइल पर ₹15,000 का ई-रूपी (e-RUPI) डिजिटल वाउचर भेजा जाता है। इस वाउचर को अधिकृत टूलकिट विक्रेताओं के पास दिखाकर कारीगर सीधे अपने ट्रेड के आधुनिक उपकरण प्राप्त कर सकते हैं।
5. क्या परिवार के दो सदस्य (जैसे पिता और पुत्र) अलग-अलग आवेदन कर सकते हैं?
योजना के नियमों के अनुसार एक परिवार (पति, पत्नी और अविवाहित बच्चे) से केवल एक ही सदस्य इस योजना का लाभ प्राप्त करने का पात्र होता है। यदि पुत्र विवाहित है और उसका राशन कार्ड अलग है, तो वह स्वतंत्र रूप से आवेदन कर सकता है।
6. पहली किस्त का ₹1 लाख का ऋण चुकाने के लिए कितना समय मिलता है?
प्रथम किस्त के ₹1 लाख के ऋण को चुकाने के लिए 18 महीने की अवधि मिलती है। इस अवधि में नियमित किस्तों का भुगतान करने पर लाभार्थी ₹2 लाख की दूसरी किस्त के लिए तुरंत पात्र हो जाता है।
7. क्या प्रशिक्षण के दौरान कोई परीक्षा भी होती है?
प्रशिक्षण के अंत में राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण परिषद (NCVET) द्वारा एक सरल व्यावहारिक कौशल मूल्यांकन किया जाता है और सफल उम्मीदवारों को राष्ट्रीय स्तर का मान्यता प्राप्त कौशल प्रमाण पत्र दिया जाता है।
8. आवेदन की स्थिति (Application Status) कैसे चेक करें?
कारीगर आधिकारिक पोर्टल ‘pmvishwakarma.gov.in’ पर जाकर अपने आधार लिंक मोबाइल नंबर पर प्राप्त ओटीपी (OTP) दर्ज करके अपने आवेदन की वर्तमान स्थिति, सत्यापन स्तर और प्रमाण पत्र डाउनलोड कर सकते हैं।
निष्कर्ष: शिल्पी स्वाभिमान से समृद्ध और विकसित भारत का निर्माण
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना स्वतंत्र भारत के सामाजिक-आर्थिक इतिहास में देश के पारंपरिक शिल्पकारों और दस्तकारों के आत्मसम्मान और गौरव की सबसे सशक्त पुनर्प्रतिष्ठा है। जो कारीगर सदियों से अपनी कला और पसीने से राष्ट्र की संस्कृति को सींचते रहे, उन्हें पहली बार एक ऐसा व्यापक मंच मिला है जो उनके हुनर को सिर आंखों पर बिठाता है। ₹15,000 की आधुनिक टूलकिट से जब एक बढ़ई, लोहार, कुम्हार या दर्जी अपने काम की गति और गुणवत्ता को दोगुना करता है, जब 5 प्रतिशत के सस्ते ऋण से वह बिचौलियों और साहूकारों के चंगुल से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र दुकान खोलता है, और जब उसका हस्तनिर्मित उत्पाद डिजिटल इंडिया के माध्यम से अमेरिका और यूरोप के बाजारों में शान से बिकता है, तो वह केवल एक परिवार की समृद्धि नहीं होती, बल्कि संपूर्ण भारत माता के स्वाभिमान की विजय होती है। विश्वकर्मा बंधुओं का यह सशक्तिकरण ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ के संकल्प को साकार करते हुए ‘विकसित भारत 2047’ के महान राष्ट्रीय स्वप्न की सबसे अटूट और सजीव आधारशिला सिद्ध होगा।


