अर्थशास्त्र केवल संख्याओं, आंकड़ों और तालिकाओं का शुष्क अध्ययन नहीं है, बल्कि यह मानवीय व्यवहार, राष्ट्रों की संप्रभुता, संसाधनों के न्यायसंगत आवंटन और समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर का जीवंत विज्ञान है। किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र की प्रगति, स्थिरता और वैश्विक शक्ति का वास्तविक पैमाना उसकी आर्थिक नीतियों की सुदृढ़ता और वित्तीय तंत्र के लचीलेपन पर निर्भर करता है। भारत जैसी 1.4 अरब की विशाल और विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता (Price Stability) बनाए रखने और साथ ही तीव्र समावेशी विकास को गति देने के लिए मौद्रिक नीति (Monetary Policy) और राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) के मध्य एक अत्यंत नाजुक और कुशल संतुलन साधना अपरिहार्य होता है। जब भी बाजार में मुद्रास्फीति (महंगाई) बढ़ती है, अथवा रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो उसका सीधा प्रभाव आम नागरिक की जेब और देश के विकास पहिए पर पड़ता है।
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), राज्य लोक सेवा आयोग (State PSCs), बैंकिंग कार्मिक चयन (IBPS PO/Clerk), कर्मचारी चयन आयोग (SSC CGL) और नियामक निकायों (RBI Grade B, SEBI) की सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं में समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) और भारतीय वित्तीय प्रणाली का अध्ययन सबसे अनिवार्य और अवधारणात्मक माना जाता है। इस विषय में केवल रटने से सफलता प्राप्त नहीं हो सकती; इसके लिए रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, नकद आरक्षित अनुपात (CRR), वैधानिक तरलता अनुपात (SLR), राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit), राजस्व घाटा, प्राथमिक घाटा, सीपीआई और डब्ल्यूपीआई मुद्रास्फीति, और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) जैसे बुनियादी सिद्धांतों की वैज्ञानिक समझ आवश्यक है। इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति रूपरेखा, केंद्रीय बजट के घाटा प्रबंधन, मुद्रास्फीति के प्रकारों और कारणों, बैंकिंग सुधारों और आवश्यक वित्तीय शब्दावलियों का संपूर्ण विश्लेषणात्मक आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं।
समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) के बुनियादी स्तंभ: जीडीपी, जीएनपी, एनडीपी और एनएनपी
किसी भी देश की आर्थिक प्रगति को मापने के लिए राष्ट्रीय आय (National Income) के चार मौलिक समुच्चय सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक बिंदु हैं:
1. सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product – GDP): एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के दौरान किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य जीडीपी कहलाता है। इसमें विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में किया गया उत्पादन शामिल होता है, किंतु विदेश में रहने वाले भारतीयों की आय शामिल नहीं होती।
– नॉमिनल जीडीपी (Nominal GDP): चालू बाजार मूल्यों पर मापी गई जीडीपी जिसमें मुद्रास्फीति का प्रभाव जुड़ा रहता है।
– वास्तविक जीडीपी (Real GDP): किसी आधार वर्ष (Base Year – वर्तमान में 2011-12) के स्थिर मूल्यों पर मापी गई जीडीपी जो उत्पादन में वास्तविक भौतिक वृद्धि को दर्शाती है।
2. सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product – GNP): यह देश के नागरिकों द्वारा उत्पादित कुल मूल्य है, चाहे वे देश के भीतर हों या विदेश में। इसकी गणना का सूत्र है: GNP = GDP + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय (NFIA)। यदि भारतीय कंपनियां विदेश से लाभ कमाकर भारत भेजती हैं तो वह जुड़ता है और विदेशी कंपनियां भारत से जो लाभ बाहर ले जाती हैं वह घट जाता है।
3. शुद्ध घरेलू उत्पाद (Net Domestic Product – NDP): उत्पादन प्रक्रिया में मशीनों, औजारों और कारखानों में होने वाली घिसावट को ‘मूल्यह्रास’ (Depreciation) कहते हैं। जब जीडीपी में से मूल्यह्रास घटा दिया जाता है, तो हमें शुद्ध घरेलू उत्पाद प्राप्त होता है (NDP = GDP – Depreciation)।
4. शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product – NNP) और राष्ट्रीय आय: जब जीएनपी में से मूल्यह्रास घटाया जाता है, तो NNP प्राप्त होता है (NNP = GNP – Depreciation)। साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at Factor Cost) को ही अर्थशास्त्र में औपचारिक रूप से ‘राष्ट्रीय आय’ (National Income) कहा जाता है। जब राष्ट्रीय आय को देश की कुल जनसंख्या से विभाजित किया जाता है, तो ‘प्रति व्यक्ति आय’ (Per Capita Income) प्राप्त होती है। आधिकारिक राष्ट्रीय आय सांख्यिकी और आर्थिक रुझानों का विवरण वित्त मंत्रालय भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन
भारतीय रिजर्व बैंक (स्थापना: 1 अप्रैल 1935, हिल्टन यंग आयोग की सिफारिश पर; राष्ट्रीयकरण: 1 जनवरी 1949) देश का सर्वोच्च केंद्रीय बैंक है। आरबीआई का प्राथमिक दायित्व देश में मुद्रा जारी करना, बैंकिंग प्रणाली का विनियमन करना, विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन करना और सरकार व बैंकों के बैंकर के रूप में कार्य करना है।
2016 में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 में ऐतिहासिक संशोधन कर ‘मौद्रिक नीति समिति’ (Monetary Policy Committee – MPC) का गठन किया गया। एमपीसी एक 6 सदस्यीय स्वायत्त समिति है जिसमें 3 सदस्य आरबीआई से (आरबीआई गवर्नर पदेन अध्यक्ष, डिप्टी गवर्नर, और एक कार्यकारी अधिकारी) तथा 3 स्वतंत्र अर्थशास्त्री केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। एमपीसी को संसद द्वारा ‘लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण’ (Flexible Inflation Targeting – FIT) का विधिक अधिदेश सौंपा गया है जिसके तहत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत (2 प्रतिशत की न्यूनतम और 6 प्रतिशत की अधिकतम सहनशील सीमा, 4% ± 2%) के भीतर बनाए रखना अनिवार्य होता है। एमपीसी प्रतिवर्ष कम से कम 4 बार (सामान्यतः द्वि-मासिक) बैठक कर ब्याज दरों पर निर्णय लेती है। मौद्रिक नीतिगत फैसलों और ब्याज दरों की आधिकारिक अधिसूचनाएं भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आधिकारिक पोर्टल पर प्रकाशित की जाती हैं।
मौद्रिक नीति के मात्रात्मक उपकरण (Quantitative Tools)
आरबीआई अर्थव्यवस्था में धन की तरलता (Money Supply) और ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए दो प्रकार के उपकरणों का उपयोग करता है: मात्रात्मक और गुणात्मक उपकरण। मात्रात्मक उपकरण पूरी अर्थव्यवस्था में ऋण की कुल मात्रा को सीधे प्रभावित करते हैं:
1. रेपो दर (Repo Rate – Repurchase Option): यह वह ब्याज दर है जिस पर व्यावसायिक बैंक अपनी अल्पकालिक नकदी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी सरकारी प्रतिभूतियों को गिरवी रखकर भारतीय रिजर्व बैंक से ऋण प्राप्त करते हैं। जब अर्थव्यवस्था में महंगाई बढ़ती है, तो आरबीआई रेपो रेट बढ़ा देता है जिससे बैंकों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है और वे आम जनता व उद्योगों को अधिक ब्याज दर पर लोन देते हैं। इससे बाजार में मांग और मुद्रा प्रवाह घटता है और मुद्रास्फीति नियंत्रित होती है। मंदी के समय आरबीआई रेपो रेट घटाकर कर्ज को सस्ता करता है ताकि निवेश और उपभोग बढ़े।
2. रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate): यह वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों से उनकी अधिशेष नकदी को अल्पकाल के लिए अपने पास जमा स्वीकार करता है। यह बाजार से अतिरिक्त तरलता को सोखने का साधन है।
3. स्थायी जमा सुविधा (Standing Deposit Facility – SDF): 2022 में आरबीआई ने बिना किसी सरकारी प्रतिभूति (कोलेटरल) के बैंकों से अधिशेष तरलता को अवशोषित करने के लिए एसडीएफ को तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के निचले गलियारे के रूप में लागू किया है।
4. सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility – MSF): जब व्यावसायिक बैंकों को रात भर (Overnight) के लिए अचानक अत्यधिक आपातकालीन नकदी की आवश्यकता होती है, तो वे अपनी एसएलआर प्रतिभूतियों के एक निश्चित प्रतिशत को गिरवी रखकर एमएसएफ दर पर आरबीआई से आपातकालीन ऋण ले सकते हैं। एमएसएफ दर सामान्यतः रेपो दर से अधिक होती है।
5. नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR): यह प्रत्येक व्यावसायिक बैंक की कुल शुद्ध मांग और समय देनदारियों (NDTL – बचत, चालू, एफडी, आरडी) का वह न्यूनतम प्रतिशत है जिसे बैंक को अनिवार्य रूप से ‘शुद्ध नकद’ के रूप में आरबीआई के पास सुरक्षित रखना होता है। इस पर बैंक को कोई ब्याज नहीं मिलता। यदि आरबीआई सीआरआर को 4 प्रतिशत से बढ़ाकर 4.5 प्रतिशत करता है, तो बैंकों के पास बाजार में ऋण देने के लिए नकदी कम हो जाती है जिससे मुद्रा आपूर्ति घटती है।
6. वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR): यह एनडीटीएल का वह न्यूनतम प्रतिशत है जिसे प्रत्येक बैंक को स्वयं अपने पास नकदी, स्वर्ण (सोना) या अनुमोदित सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) के रूप में सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है। वर्तमान में एसएलआर 18 प्रतिशत है जो बैंकों को सुरक्षित और शोधनक्षम बनाए रखता है।
7. खुले बाजार की कार्यवाही (Open Market Operations – OMO): बाजार में तरलता के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए जब आरबीआई खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) को बेचता है, तो बाजार से नकदी आरबीआई के पास आ जाती है (तरलता संकुचन)। जब आरबीआई प्रतिभूतियां खरीदता है, तो बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ जाता है (तरलता विस्तार)।
अनुशासित मौद्रिक नीति और विवेकपूर्ण राजकोषीय प्रबंधन भारतीय अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीति के झटकों से सुरक्षित रखते हैं।
मौद्रिक नीति के गुणात्मक उपकरण (Qualitative Tools)
गुणात्मक उपकरण पूरी अर्थव्यवस्था के कुल ऋण को प्रभावित करने के स्थान पर विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे रियल एस्टेट, शेयर बाजार या सट्टेबाजी) में ऋण के प्रवाह को दिशा देते हैं:
1. मार्जिन आवश्यकता में परिवर्तन (Margin Requirements): गिरवी रखी जाने वाली संपत्ति के बाजार मूल्य और स्वीकृत ऋण राशि के अंतर को मार्जिन कहते हैं। यदि कोई 10 लाख के सोने पर 8 लाख का कर्ज पाता है तो मार्जिन 20% है। यदि आरबीआई को किसी क्षेत्र में सट्टेबाजी रोकनी हो, तो वह मार्जिन बढ़ाकर 40% कर देता है जिससे ऋण मिलना कठिन हो जाता है।
2. उपभोक्ता साख का नियमन: ईएमआई और डाउन पेमेंट की शर्तों को सख्त या ढीला करके टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को नियंत्रित करना।
3. साख की राशनिंग (Credit Rationing): विभिन्न क्षेत्रों के लिए अधिकतम ऋण सीमा निर्धारित करना।
4. नैतिक दबाव (Moral Suasion): आरबीआई गवर्नर द्वारा बैंकों के प्रमुखों के साथ बैठक कर उन्हें जनहित और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार ब्याज दरें घटाने या बढ़ाने का अनौपचारिक परामर्श देना।
5. प्रत्यक्ष कार्रवाई (Direct Action): दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाले बैंकों पर जुर्माना लगाना या उनके परिचालन को प्रतिबंधित करना।
राजकोषीय नीति और बजट घाटे: राजकोषीय, राजस्व और प्राथमिक घाटा
जहां मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक (RBI) द्वारा संचालित होती है, वहीं ‘राजकोषीय नीति’ (Fiscal Policy) निर्वाचित केंद्र सरकार द्वारा अपने वार्षिक केंद्रीय बजट के माध्यम से कराधान (Taxation) और सार्वजनिक व्यय (Public Expenditure) द्वारा संचालित होती है। सरकार के बजट में विभिन्न प्रकार के घाटे अर्थव्यवस्था के वित्तीय स्वास्थ्य के सूचक होते हैं:
1. राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): यह सरकार के कुल व्यय (राजस्व व्यय + पूंजीगत व्यय) और कुल प्राप्तियों (उधारियों को छोड़कर राजस्व प्राप्तियां + गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां) के बीच का अंतर होता है। सरल शब्दों में, राजकोषीय घाटा यह दर्शाता है कि सरकार को अपने बजट खर्चों को पूरा करने के लिए उस वर्ष बाजार से कुल कितना उधार (Borrowing) लेना पड़ेगा। उच्च राजकोषीय घाटा मुद्रास्फीति और भविष्य में कर्ज के जाल का जोखिम बढ़ाता है। एफआरबीएम (FRBM) अधिनियम 2003 के तहत राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वर्तमान में सरकार इसे 4.5 प्रतिशत से नीचे लाने के पथ पर अग्रसर है।
2. राजस्व घाटा (Revenue Deficit): यह सरकार के दैनिक परिचालन खर्चों (वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान, सब्सिडी) और शुद्ध कर व गैर-कर राजस्व प्राप्तियों का अंतर होता है (Revenue Deficit = Revenue Expenditure – Revenue Receipts)। राजस्व घाटा यह दर्शाता है कि सरकार अपने दैनिक घर-खर्च को चलाने में भी असमर्थ है और उसे दैनिक खर्चों के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है जो अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत हानिकारक माना जाता है।
3. प्राथमिक घाटा (Primary Deficit): जब चालू वर्ष के राजकोषीय घाटे में से सरकार द्वारा पुराने कर्जों पर चुकाए जाने वाले ‘ब्याज भुगतान’ (Interest Payments) को घटा दिया जाता है, तो उसे प्राथमिक घाटा कहते हैं (Primary Deficit = Fiscal Deficit – Interest Payments)। यह घाटा यह स्पष्ट करता है कि सरकार की चालू वर्ष की नीतियों के कारण कितना नया कर्ज लेना पड़ रहा है, बिना पुराने कर्जों के ब्याज के बोझ के।
मुद्रास्फीति (Inflation): प्रकार, कारण और मापन सूचकांक
मुद्रास्फीति का सामान्य अर्थ है वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में निरंतर और व्यापक वृद्धि, जिसके परिणामस्वरूप मुद्रा की क्रय शक्ति (Purchasing Power) में गिरावट आ जाती है। यदि 100 रुपये में पहले 5 किलो आटा आता था और अब केवल 3 किलो आता है, तो यह मुद्रास्फीति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मुद्रास्फीति के दो मुख्य कारण होते हैं:
1. मांग-प्रेरित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation): जब अर्थव्यवस्था में कुल मांग (Aggregate Demand) कुल आपूर्ति से बहुत अधिक बढ़ जाती है। ‘टू मच मनी चेसिंग टू फ्यू गुड्स’ (जब अत्यधिक धन कम वस्तुओं के पीछे दौड़ता है)।
2. लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation): जब उत्पादन लागत (कच्चे माल की कीमतें, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय दरें, मजदूरों का वेतन, या अप्रत्यक्ष कर) बढ़ जाने के कारण उत्पादक वस्तुओं के दाम बढ़ा देते हैं।
मुद्रास्फीति की गति के आधार पर इसके चार प्रकार होते हैं: रेंगती हुई (Creeping – 1 से 3%), चलती हुई (Walking – 3 से 10%), दौड़ती हुई (Running – 10 से 20%), और बेतहाशा या अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation – जब कीमतें प्रतिदिन सैकड़ों प्रतिशत बढ़ती हैं, जैसे 1923 में जर्मनी या हाल ही में जिम्बाब्वे और वेनेजुएला में)।
मुद्रास्फीति को मापने के दो प्रमुख राष्ट्रीय सूचकांक हैं:
– उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI – Consumer Price Index): यह राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा मासिक रूप से जारी किया जाता है। यह खुदरा स्तर पर आम उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं दोनों की टोकरी (Basket) के मूल्य परिवर्तन को मापता है। आरबीआई मौद्रिक नीति हेतु इसी सीपीआई-संयुक्त (Combined) सूचकांक को आधार बनाता है।
– थोक मूल्य सूचकांक (WPI – Wholesale Price Index): यह उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) द्वारा जारी किया जाता है। यह थोक बाजार के स्तर पर वस्तुओं के मूल्य परिवर्तन को मापता है। इसमें सेवाओं (Services) को शामिल नहीं किया जाता। पूंजी बाजार, प्रतिभूतियों और सेबी के वित्तीय नियमों का संदर्भ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पोर्टल से प्राप्त किया जा सकता है।
स्टैगफ्लेशन, अपस्फीति और अवस्फीति: विशिष्ट आर्थिक स्थितियां
1. स्टैगफ्लेशन (Stagflation): यह अर्थव्यवस्था की सबसे खतरनाक और विषम स्थिति होती है जहां ‘मुद्रास्फीति’ (Inflation) और ‘आर्थिक मंदी या ठहराव’ (Stagnation) तथा ‘उच्च बेरोजगारी’ तीनों एक साथ विद्यमान होते हैं। पारंपरिक फिलिप्स वक्र (Phillips Curve – जो यह मानता था कि मुद्रास्फीति बढ़ने से बेरोजगारी घटती है) इस स्थिति में पूरी तरह विफल हो जाता है। 1970 के दशक में वैश्विक तेल संकट के समय दुनिया ने स्टैगफ्लेशन का सामना किया था।
2. अपस्फीति (Deflation): जब वस्तुओं और सेवाओं की सामान्य कीमतों में लगातार गिरावट आती है (नकारात्मक मुद्रास्फीति दर)। यह उपभोक्ता को भले ही सुखद लगे, किंतु अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत विनाशकारी होती है क्योंकि कीमतें गिरने से उत्पादक उत्पादन बंद कर देते हैं, जिससे कारखाने बंद होते हैं और भारी बेरोजगारी फैलती है।
3. अवस्फीति (Disinflation): जब मुद्रास्फीति की दर में कमी आती है, किंतु वह धनात्मक बनी रहती है। उदाहरणार्थ यदि महंगाई दर 8 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत हो जाती है, तो उसे डिसइन्फ्लेशन कहते हैं। यह मूल्य स्थिरता की ओर सकारात्मक कदम है।
आवश्यक बैंकिंग शब्दावली: एनपीए, बेसल मानक, कैमल्स और पीसीए
प्रतियोगी परीक्षाओं के बैंकिंग और वित्तीय जागरूकता खंड में पूछे जाने वाले प्रमुख तकनीकी शब्द इस प्रकार हैं:
1. गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (Non-Performing Assets – NPA): जब किसी बैंक ऋण का मूलधन अथवा ब्याज निर्धारित देय तिथि के बाद 90 दिनों तक लगातार जमा नहीं होता, तो बैंक उसे एनपीए (फंसा हुआ कर्ज) घोषित कर देता है। एनपीए की तीन श्रेणियां होती हैं: सब-स्टैंडर्ड (12 माह तक एनपीए), डाउटफुल (12 माह से अधिक एनपीए), और लॉस एसेट (जिसकी वसूली पूरी तरह असंभव मान ली गई हो)।
2. बेसल मानक (Basel Accords): स्विट्जरलैंड के बेसल शहर में स्थित ‘बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स’ (BIS) द्वारा वैश्विक बैंकिंग प्रणाली को वित्तीय संकटों और दिवालियापन से बचाने हेतु बनाए गए अंतरराष्ट्रीय पूंजी पर्याप्तता नियम। वर्तमान में ‘बेसल-III’ मानक लागू हैं जिसके तहत बैंकों को अपने जोखिम-भारित परिसंपत्तियों (RWA) के न्यूनतम 9 प्रतिशत के बराबर पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR / Capital Adequacy Ratio) बनाए रखना अनिवार्य होता है।
3. त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (Prompt Corrective Action – PCA): जब किसी बैंक का वित्तीय स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाता है—अर्थात उसका एनपीए बहुत अधिक बढ़ जाए, पूंजी पर्याप्तता अनुपात सीमा से नीचे गिर जाए, या वह लगातार घाटे में चल रहा हो—तो आरबीआई उस बैंक पर पीसीए ढांचा लागू कर देता है। पीसीए के तहत बैंक के नए जोखिम भरे ऋण देने, नई शाखाएं खोलने, प्रबंधन के वेतन बढ़ाने और लाभांश बांटने पर कड़े प्रतिबंध लग जाते हैं।
4. एनडीटीएल (Net Demand and Time Liabilities – NDTL): बैंक के पास जमा कुल मांग देनदारियां (चालू खाता व बचत खाता – CASA) और सावधि देनदारियां (एफडी व आरडी) में से अन्य बैंकों के दावों को घटाने पर प्राप्त शुद्ध राशि जिस पर सीआरआर और एसएलआर की गणना की जाती है।
5. भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BoP): किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच एक वित्तीय वर्ष में होने वाले सभी आर्थिक लेन-देन का विधिवत लेखा-जोखा। इसके दो मुख्य खाते होते हैं: चालू खाता (Current Account – वस्तुओं व सेवाओं का आयात-निर्यात और रेमिटेंस) और पूंजी खाता (Capital Account – विदेशी प्रत्यक्ष निवेश FDI, एफपीआई, और विदेशी वाणिज्यिक उधारियां ECB)।
मौद्रिक नीति बनाम राजकोषीय नीति का समग्र तुलनात्मक विश्लेषण
अर्थव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति दोनों पहियों की तरह कार्य करती हैं। दोनों के प्राधिकारी, उद्देश्य, उपकरण और आर्थिक प्रभाव विशिष्ट होते हैं। नीचे दी गई तालिका में इन दोनों नीतियों का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
| तुलना मानक | मौद्रिक नीति (Monetary Policy) | राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) |
| नियामक प्राधिकारी | देश का केंद्रीय बैंक (भारतीय रिजर्व बैंक – RBI / MPC) | निर्वाचित केंद्र सरकार (वित्त मंत्रालय / संसद) |
| प्राथमिक उद्देश्य | मूल्य स्थिरता (महंगाई नियंत्रण 4% ± 2%) एवं तरलता प्रबंधन | आर्थिक संवृद्धि, रोजगार सृजन, अवसंरचना विकास व सामाजिक न्याय |
| प्रमुख नीतिगत उपकरण | रेपो दर, रिवर्स रेपो, सीआरआर, एसएलआर, ओएमओ, बैंक दर | प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर दरें, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, सब्सिडी, ऋण |
| निर्णय की समयावधि | द्वि-मासिक (वर्ष में 6 बार समीक्षा) अथवा तात्कालिक आवश्यकता अनुसार | वार्षिक (केंद्रीय बजट के माध्यम से, 1 फरवरी को प्रस्तुति) |
| अर्थव्यवस्था पर प्रभाव | मुद्रा आपूर्ति, ऋण की लागत और बैंकिंग तरलता पर अप्रत्यक्ष प्रभाव | नागरिकों की प्रयोज्य आय, सरकारी मांग और सार्वजनिक संपत्तियों पर प्रत्यक्ष प्रभाव |
| राजनीतिक प्रभाव | अधिकांशतः स्वायत्त, गैर-राजनीतिक एवं तकनीकी निर्णय | राजनीतिक प्राथमिकताओं, जनमत और चुनावी वादों से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित |
यह तुलनात्मक विश्लेषण प्रमाणित करता है कि किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता तभी संभव है जब मौद्रिक और राजकोषीय नीतियां एक-दूसरे के विरोध में न होकर एक समन्वित राष्ट्रीय आर्थिक दृष्टि के तहत कार्य करें।
भारतीय बैंकिंग प्रणाली का ऐतिहासिक विकास: 1969 के राष्ट्रीयकरण से मेगा मर्जर तक
भारतीय बैंकिंग का इतिहास सामाजिक प्राथमिकताओं और आर्थिक सुधारों के साथ निरंतर रूपांतरण का दर्पण है। 1947 में स्वतंत्रता के समय भारतीय बैंकिंग पर बड़े औद्योगिक घरानों और साहूकारों का वर्चस्व था जो केवल अपने निजी उद्योगों को ही ऋण वितरित करते थे जबकि कृषि, लघु उद्योग और ग्रामीण भारत बैंकिंग सेवाओं से पूरी तरह वंचित थे। इस विसंगति को समाप्त करने के लिए 19 जुलाई 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 50 करोड़ रुपये से अधिक जमा पूंजी वाले देश के 14 बड़े निजी व्यावसायिक बैंकों का ऐतिहासिक राष्ट्रीयकरण किया। इसके पश्चात 1980 में 6 अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया जिससे देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) का सशक्त संजाल स्थापित हुआ।
राष्ट्रीयकरण ने बैंकों की शाखाओं को देश के सुदूर गांवों तक पहुंचाया और ‘प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण’ (Priority Sector Lending – PSL) की व्यवस्था आरंभ की जिसके तहत प्रत्येक बैंक के लिए अपने कुल ऋण का 40 प्रतिशत कृषि, एमएसएमई, शिक्षा और कमजोर वर्गों को देना अनिवार्य किया गया। 1991 में नरसिम्हम समिति की सिफारिशों के आधार पर निजी बैंकों (जैसे एचडीएफसी, आईसीआईसीआई, एक्सिस बैंक) को नए सिरे से लाइसेंस दिए गए जिससे बैंकिंग में आधुनिक कंप्यूटर तकनीक और एटीएम क्रांति आई। हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की प्रतिस्पर्धात्मकता और पूंजीगत आधार को मजबूत करने के लिए सरकार ने 27 सार्वजनिक बैंकों का विलय करके मात्र 12 विशाल और आर्थिक रूप से सुदृढ़ मेगा-बैंकों का गठन किया है (जैसे पंजाब नेशनल बैंक में ओरिएंटल बैंक और यूनाइटेड बैंक का विलय, तथा बैंक ऑफ बड़ौदा में देना और विजया बैंक का विलय)।
मुद्रा बाजार बनाम पूंजी बाजार: वित्तीय प्रणालियों का संरचनात्मक अंतर
देश की संपूर्ण वित्तीय प्रणाली को दो प्रमुख बाजारों में विभाजित किया गया है:
1. मुद्रा बाजार (Money Market): यह अल्पकालिक वित्तीय परिसंपत्तियों (जिनकी परिपक्वता अवधि 1 वर्ष से कम होती है) का बाजार है जिसका विनियमन भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है। इसके प्रमुख साधन हैं:
– ट्रेजरी बिल्स (T-Bills): केंद्र सरकार की अल्पकालिक उधारियों हेतु आरबीआई द्वारा जारी किए जाने वाले 91-दिन, 182-दिन और 364-दिन के शून्य-कूपन बॉन्ड्स जिन पर कोई ब्याज नहीं मिलता बल्कि वे बट्टे (Discount) पर जारी होकर अंकित मूल्य पर भुनाए जाते हैं।
– कमर्शियल पेपर (CP): अत्यधिक क्रेडिट रेटिंग वाली कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा अपनी कार्यशील पूंजी जुटाने हेतु जारी अल्पकालिक असुरक्षित प्रॉमिसरी नोट।
– सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD): अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों द्वारा जारी सावधि जमा का हस्तांतरणीय प्रमाण पत्र।
– कॉल मनी और नोटिस मनी: बैंकों द्वारा अपनी आकस्मिक दैनिक सीआरआर आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु आपस में 1 दिन (कॉल मनी) या 2 से 14 दिन (नोटिस मनी) के लिए लिया जाने वाला अंतर-बैंक ऋण।
2. पूंजी बाजार (Capital Market): यह दीर्घकालिक वित्तीय संसाधनों (1 वर्ष से अधिक) का बाजार है जहां उद्योग और सरकारें लंबी अवधि की परियोजनाओं हेतु पूंजी जुटाती हैं। इसका विनियमन सेबी (SEBI) करता है। इसके दो भाग होते हैं:
– प्राथमिक बाजार (Primary Market): जहां नई प्रतिभूतियां पहली बार जारी होती हैं (जैसे इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग – IPO)।
– द्वितीयक बाजार (Secondary Market): जहां पूर्व-जारी शेयरों और बॉन्ड्स की निवेशकों के बीच दैनिक खरीद-बिक्री होती है (जैसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज – BSE का सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज – NSE का निफ्टी)।
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC 2016) और बैड बैंक (NARCL)
2016 से पूर्व भारत में फंसे हुए कर्जों (एनपीए) की वसूली की कानूनी प्रक्रिया इतनी जटिल और धीमी थी कि बैंकों को अपना फंसा हुआ पैसा निकालने में औसतन 4 से 5 वर्ष लग जाते थे और कर्जदार कंपनियां संपत्ति हड़पकर कानूनी दांवपेच खेलती रहती थीं। इस समस्या के ऐतिहासिक समाधान के लिए संसद ने ‘दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता’ (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC 2016) पारित किया।
आईबीसी ने ‘ऋणदाता के नियंत्रण’ (Creditor-in-Control) का नया क्रांतिकारी सिद्धांत स्थापित किया। यदि कोई कंपनी 1 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण में डिफॉल्ट करती है, तो बैंक राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में याचिका दायर कर सकते हैं। कंपनी का मौजूदा निदेशक मंडल तुरंत निलंबित हो जाता है और एक स्वतंत्र ‘इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल’ कंपनी का कार्यभार संभालता है। 180 से 270 दिनों की समय सीमा के भीतर कंपनी के पुनरुद्धार की नई योजना स्वीकृत की जाती है अथवा कंपनी का परिसमापन (Liquidation) कर बैंकों का पैसा वसूला जाता है। इसके अतिरिक्त भारी एनपीए को बैंकों की बैलेंस शीट से साफ करने के लिए ‘नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड’ (NARCL – जिसे लोकप्रिय रूप से ‘बैड बैंक’ कहा जाता है) की स्थापना की गई है जो बैंकों से डूबे हुए कर्जों को खरीदकर उनका त्वरित निस्तारण करती है।
भुगतान संतुलन संकट और 1991 के बाद विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन
किसी भी देश की वैश्विक आर्थिक संप्रभुता का अंतिम पैमाना उसका ‘विदेशी मुद्रा भंडार’ (Foreign Exchange Reserves) होता है। 1991 के भुगतान संतुलन संकट के समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र 1.2 अरब डॉलर रह गया था, किंतु आज भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 650 अरब डॉलर से अधिक के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है जो विश्व के शीर्ष चार भंडारों में शामिल है।
आरबीआई इस भंडार का प्रबंधन चार घटकों में करता है:
1. विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां (FCA – अमेरिकी डॉलर, यूरो, पाउंड, येन आदि)
2. स्वर्ण भंडार (Gold Reserves – आरबीआई के पास रखा सैकड़ों टन शुद्ध सोना)
3. विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights – SDR, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूरक विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति)
4. आईएमएफ के पास रिजर्व ट्रेंच स्थिति (RTP)।
यह मजबूत विदेशी मुद्रा कवच भारतीय रुपये को वैश्विक सट्टेबाजी के हमलों से बचाता है, आयात बिलों के निर्बाध भुगतान की गारंटी देता है और विदेशी निवेशकों को भारत की आर्थिक संप्रभुता के प्रति अटूट विश्वास प्रदान करता है।
गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFCs) और स्केल-आधारित विनियामक ढांचा
गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFCs) भारत के वित्तीय तंत्र में उन क्षेत्रों और व्यक्तियों तक ऋण पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं जहां पारंपरिक बैंक नहीं पहुंच पाते। एनबीएफसी कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत होती हैं और ऋण देने, शेयर व बॉन्ड खरीदने का कार्य करती हैं, किंतु वे मांग जमा (CASA) स्वीकार नहीं कर सकतीं और न ही वे स्वयं के चेक जारी कर सकती हैं।
2018 में आईएलएंडएफएस (IL&FS) और डीएचएफएल संकट के पश्चात भारतीय रिजर्व बैंक ने संपूर्ण एनबीएफसी क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी ‘स्केल-आधारित विनियामक ढांचा’ (Scale-Based Regulation – SBR) लागू किया है। इसके तहत एनबीएफसी को उनके आकार, जोखिम और प्रणालीगत महत्व के आधार पर चार स्तरों में विभाजित किया गया है: बेस लेयर, मिडिल लेयर, अपर लेयर, और टॉप लेयर। जो एनबीएफसी प्रणालीगत दृष्टि से अत्यंत विशाल हैं (जैसे बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस, एलआईसी हाउसिंग आदि), उन पर लगभग अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों जैसे ही कड़े पूंजी पर्याप्तता अनुपात, एनपीए वर्गीकरण और कॉर्पोरेट गवर्नेंस नियम लागू किए गए हैं ताकि देश के वित्तीय तंत्र में कोई ‘शैडो बैंकिंग’ (Shadow Banking) संकट उत्पन्न न हो सके।
प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण (PSL) और पीएसएलसी प्रमाण पत्र
भारतीय बैंकिंग का एक सबसे विशिष्ट सामाजिक अधिदेश ‘प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण’ (Priority Sector Lending – PSL) है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के आर्थिक विकास की गति केवल बड़े शहरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि उन उपेक्षित क्षेत्रों तक भी संस्थागत ऋण पहुंचे जो रोजगार सृजन और ग्रामीण आजीविका के मुख्य आधार हैं।
आरबीआई के नियमों के अनुसार सभी घरेलू अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों और विदेशी बैंकों (20 से अधिक शाखाओं वाले) के लिए अपने कुल समायोजित शुद्ध बैंक ऋण (ANBC) का न्यूनतम 40 प्रतिशत प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को देना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। इसमें 18 प्रतिशत अकेले कृषि क्षेत्र हेतु (जिसमें 10 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों के लिए), 7.5 प्रतिशत सूक्ष्म उद्यमों (Micro Enterprises) के लिए, और 12 प्रतिशत कमजोर वर्गों (एससी, एसटी, दिव्यांग, महिला स्वयं सहायता समूह) के लिए निर्धारित होता है। जो बैंक अपने निर्धारित पीएसएल लक्ष्यों को पूरा करने में असमर्थ रहते हैं, उन्हें अपनी कमी की भरपाई ‘प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण प्रमाण पत्र’ (PSLC) की खरीद के माध्यम से अथवा नाबार्ड के ‘ग्रामीण अवसंरचना विकास कोष’ (RIDF) में अनिवार्य राशि जमा कराकर करनी होती है। यह व्यवस्था देश के वित्तीय समावेशन को धरातल पर सुनिश्चित करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
1. जब आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है, तो आम नागरिक की बैंक ईएमआई (EMI) क्यों बढ़ जाती है?
रेपो रेट बढ़ने से व्यावसायिक बैंकों को आरबीआई से मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाता है। अपनी लाभप्रदता बनाए रखने के लिए बैंक अपने ‘एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट’ (EBLR) को बढ़ा देते हैं, जिसके कारण होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ जाती हैं और ग्राहकों की मासिक ईएमआई स्वतः बढ़ जाती है।
2. राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) हमेशा बुरा क्यों नहीं माना जाता?
यदि सरकार द्वारा लिया गया कर्ज फिजूलखर्ची या सब्सिडी में उड़ाने के स्थान पर नए एक्सप्रेसवे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, बंदरगाह और एम्स जैसे उच्च-उत्पादक पूंजीगत बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खर्च किया जाता है, तो वह भविष्य में आर्थिक विकास दर को बढ़ाता है और नए कर राजस्व का सृजन करता है। अतः उत्पादक कैपेक्स हेतु किया गया संतुलित राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था के लिए स्वस्थ माना जाता है।
3. हेडलाइन मुद्रास्फीति (Headline Inflation) और कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation) में क्या अंतर है?
हेडलाइन मुद्रास्फीति में सीपीआई टोकरी की सभी वस्तुएं शामिल होती हैं। जबकि कोर मुद्रास्फीति की गणना करते समय अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाली वस्तुओं—अर्थात ‘खाद्य पदार्थ’ (Food) और ‘ईंधन व ऊर्जा’ (Fuel & Power)—को बाहर निकाल दिया जाता है ताकि अर्थव्यवस्था में अंतर्निहित दीर्घकालिक महंगाई के वास्तविक रुझान को समझा जा सके।
4. क्या भारत में बैंक में जमा सारा पैसा सुरक्षित रहता है या कोई सीमा है?
आरबीआई की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी ‘जमा बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम’ (DICGC) के तहत प्रत्येक बैंक जमाकर्ता को बैंक के दिवालिया या विफल होने की स्थिति में मूलधन और ब्याज सहित अधिकतम 5 लाख रुपये तक की पूर्ण कानूनी बीमा सुरक्षा की गारंटी प्राप्त होती है।
5. ‘हॉक’ (Hawkish) और ‘डोव’ (Dovish) मौद्रिक नीति रुख क्या होता है?
जब केंद्रीय बैंक का मुख्य ध्यान महंगाई को नियंत्रित करने पर होता है और वह ब्याज दरें बढ़ाने की प्रवृत्ति रखता है, तो उसे ‘हॉकिश’ (Hawkish) रुख कहते हैं। इसके विपरीत जब केंद्रीय बैंक का मुख्य ध्यान आर्थिक विकास और रोजगार को बढ़ावा देने पर होता है और वह ब्याज दरें घटाने या सुगम रखने की नीति अपनाता है, तो उसे ‘डोविश’ (Dovish) रुख कहते हैं।
6. सीपीआई (CPI) और डब्ल्यूपीआई (WPI) में प्राथमिक अंतर क्या है?
सीपीआई खुदरा बाजार में उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं दोनों के मूल्य को मापता है और इसका आधार वर्ष 2012 है। डब्ल्यूपीआई केवल थोक बाजार में बिकने वाली भौतिक वस्तुओं (Goods) के मूल्य को मापता है, इसमें सेवाओं का कोई स्थान नहीं होता और इसका आधार वर्ष 2011-12 है।
7. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में क्या अंतर है?
एफडीआई एक दीर्घकालिक भौतिक निवेश है जहां विदेशी कंपनी भारत में नए कारखाने, कार्यालय स्थापित करती है या किसी भारतीय कंपनी में 10% से अधिक की स्थायी हिस्सेदारी खरीदती है। इसे रातों-रात बाहर नहीं निकाला जा सकता। एफपीआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) शेयर बाजार और बॉन्ड्स में किया गया अल्पकालिक वित्तीय निवेश होता है जिसे ‘हॉट मनी’ कहा जाता है क्योंकि निवेशक बाजार में जोखिम देखते ही तुरंत अपना पैसा बेचकर बाहर ले जा सकते हैं।
8. भारतीय रुपये की परिवर्तनीयता (Convertibility of Rupee) की वर्तमान स्थिति क्या है?
भारतीय रुपया ‘चालू खाते’ (Current Account) पर पूर्णतः परिवर्तनीय है अर्थात व्यापार, यात्रा, शिक्षा और चिकित्सा के लिए विदेशी मुद्रा का निर्बाध रूपांतरण किया जा सकता है। किंतु ‘पूंजी खाते’ (Capital Account) पर रुपया केवल आंशिक रूप से परिवर्तनीय है ताकि अचानक पूंजी के देश से बाहर भागने (Capital Flight) से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके।
9. ट्विन डेफिसिट (Twin Deficit) क्या होता है?
जब किसी देश की अर्थव्यवस्था में एक साथ उच्च ‘राजकोषीय घाटा’ (Fiscal Deficit) और उच्च ‘चालू खाता घाटा’ (Current Account Deficit – CAD) दोनों एक साथ विद्यमान होते हैं, तो उसे अर्थशास्त्र में ‘ट्विन डेफिसिट’ कहा जाता है जो मुद्रा के मूल्यह्रास और विदेशी मुद्रा संकट का जोखिम उत्पन्न करता है।
निष्कर्ष एवं वित्तीय साक्षरता का राष्ट्रीय महत्व
अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धांत केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने की बौद्धिक सामग्री नहीं हैं, बल्कि वे एक राष्ट्र के रूप में हमारे सामूहिक अस्तित्व, हमारी क्रय शक्ति और हमारी स्वतंत्रता के वास्तविक आधार स्तंभ हैं। जब देश का नागरिक मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति और बजट घाटों की कार्यप्रणाली को समझता है, तो वह न केवल अपने व्यक्तिगत वित्तीय निर्णयों (बचत, निवेश और ऋण) में विवेकपूर्ण बनता है बल्कि एक सजग मतदाता के रूप में लोकलुभावन मुफ्त की रेवड़ियों की राजनीति के स्थान पर दीर्घकालिक राष्ट्र-निर्माण की आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन करने में सक्षम होता है। भारतीय रिजर्व बैंक की सुदृढ़ मौद्रिक नीति और भारत सरकार के अनुशासित राजकोषीय प्रबंधन ने वैश्विक आर्थिक तूफानों के बीच भी देश को एक सुरक्षित आर्थिक द्वीप बनाए रखा है। वित्तीय साक्षरता और आर्थिक चेतना का यह प्रसार प्रत्येक भारतीय को सशक्त बनाकर देश को एक आत्मनिर्भर, समृद्ध और वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने की यात्रा में सबसे मजबूत संबल प्रदान करता रहेगा।


