भारत का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास में त्याग, बलिदान, जन-प्रतिरोध और नैतिक शक्ति का सबसे रोमांचक और प्रेरणादायी महाकाव्य है। यह केवल एक विदेशी औपनिवेशिक साम्राज्य (ब्रिटिश राज) को उखाड़ फेंकने की राजनीतिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह भारत के आत्म-सम्मान, प्राचीन सांस्कृतिक अस्मिता, आर्थिक स्वावलंबन और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना का युगांतरकारी राष्ट्रीय पुनर्जागरण था। लगभग दो शताब्दियों (1757 में प्लासी के युद्ध से 1947 में आजादी तक) तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और तत्पश्चात ब्रिटिश क्राउन ने भारत के अपार आर्थिक संसाधनों का क्रूरतापूर्वक दोहन किया। भारत जो कभी विश्व की कुल जीडीपी में 27 प्रतिशत से अधिक का योगदान देने वाली ‘सोने की चिड़िया’ था, उसे 1947 में मात्र 3 प्रतिशत से कम की वैश्विक हिस्सेदारी, भयानक भुखमरी और 88 प्रतिशत निरक्षरता की दयनीय अवस्था में धकेल दिया गया था।
किंतु भारत की अदम्य आत्मा ने कभी पराजय स्वीकार नहीं की। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के शौर्य से सुलगी चिंगारी आगे चलकर 20वीं सदी में एक विशाल दावानल में रूपांतरित हो गई। महात्मा गांधी के अहिंसक सत्याग्रह (असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो) ने जहां करोड़ों सामान्य ग्रामीणों, महिलाओं और किसानों को आंदोलन का सिपाही बना दिया, वहीं दूसरी ओर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के सशस्त्र संघर्ष ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में आधुनिक भारत का इतिहास सबसे प्रमुख, विस्तृत और सर्वाधिक प्रश्न पूछे जाने वाला विषय होता है। इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम 1857 की महाक्रांति के कारणों, नरमपंथी और गरमपंथी धाराओं, क्रांतिकारी आंदोलनों, गांधीवादी जन-आंदोलनों, गोलमेज सम्मेलनों, कैबिनेट मिशन और 15 अगस्त 1947 के सत्ता हस्तांतरण के संपूर्ण ऐतिहासिक कालक्रम का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: भारत की प्रथम सशस्त्र राष्ट्रीय क्रांति
1857 का विद्रोह अचानक हुआ कोई सैन्य असंतोष मात्र नहीं था, बल्कि यह 100 वर्षों के संचित औपनिवेशिक शोषण, आर्थिक बर्बादी और धार्मिक हस्तक्षेप का विस्फोटक प्रकटीकरण था। लॉर्ड डलहौजी की ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) के तहत सतारा, झांसी, नागपुर और संबलपुर जैसी रियासतों का विलय तथा अवध का कुशासन के आधार पर विलय भारतीय रजवाड़ों में गहरा आक्रोश भर चुका था। अंग्रेजों की रैयतवाड़ी, महालवाड़ी और स्थायी बंदोबस्त जैसी क्रूर भू-राजस्व नीतियों ने भारतीय किसानों और बुनकरों को तबाह कर दिया था।
तात्कालिक कारण ‘एनफील्ड राइफल’ के नए कारतूस बने जिनमें गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की पुष्टि हुई जिसे लोड करने से पूर्व दांतों से काटना पड़ता था। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी (पश्चिम बंगाल) में 34वीं नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडे ने इस अपवित्र कारतूस का उपयोग करने से इनकार कर दिया और अंग्रेज अधिकारियों पर गोली चला दी। 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी दे दी गई।
10 मई 1857 को मेरठ छावनी में भारतीय सिपाहियों ने खुला विद्रोह कर दिया। वे ‘दिल्ली चलो’ का नारा लगाते हुए लाल किले पहुंचे और वृद्ध मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट (शहंशाह-ए-हिंदुस्तान) घोषित कर दिया। यह विद्रोह देखते ही देखते उत्तरी और मध्य भारत में फैल गया। कानपुर में नाना साहेब और तात्या टोपे, झांसी में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई (‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’), लखनऊ में बेगम हजरत महल, बिहार के जगदीशपुर में 80 वर्षीय वीर कुंवर सिंह, फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्लाह, और बरेली में खान बहादुर खान ने अंग्रेजी सेना को नाकों चने चबवा दिए। यद्यपि आधुनिक हथियारों की कमी, केंद्रीय संगठन के अभाव और कुछ स्थानीय रजवाड़ों के गद्दारी के कारण यह आंदोलन दबा दिया गया, किंतु इसने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया। विनायक दामोदर सावरकर ने इसे ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ घोषित किया। इस क्रांति के परिणामस्वरूप ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और 1858 के भारत शासन अधिनियम द्वारा भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी विक्टोरिया) के अधीन आ गया। भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के ऐतिहासिक दस्तावेजों का संपूर्ण संग्रह भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के पोर्टल पर देखा जा सकता है।
सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना का जागरण
19वीं सदी के सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए वैचारिक जमीन तैयार की। राजा राममोहन राय को ‘भारतीय पुनर्जागरण का जनक’ माना जाता है जिन्होंने 1828 में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की और सती प्रथा के उन्मूलन में निर्णायक भूमिका निभाई। स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की और ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा देते हुए ‘स्वराज’ शब्द का पहली बार प्रयोग किया।
स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो की धर्म संसद में भारतीय वेदांत दर्शन की श्रेष्ठता स्थापित की और ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ का उद्घोष कर भारतीय युवाओं में राष्ट्रीय स्वाभिमान भर दिया। रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसायटी (एनी बेसेंट), ज्योतिबा फुले का सत्यशोधक समाज, और सर सैयद अहमद खान के अलीगढ़ आंदोलन ने समाज में तर्कशीलता, शिक्षा और कुरीतियों के विरुद्ध चेतना का संचार किया। इन आंदोलनों ने भारतीयों को यह अहसास कराया कि वे एक महान संस्कृति के वारिस हैं और विदेशी दासता उनके सम्मान के सर्वथा प्रतिकूल है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और नरमपंथी युग (1885 से 1905)
28 दिसंबर 1885 को बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना हुई। इसके संस्थापक एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश आईसीएस अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) थे, और प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी बने। लॉर्ड डफरिन उस समय भारत के वायसराय थे।
1885 से 1905 के काल को ‘नरमपंथी युग’ (Moderate Era) कहा जाता है। दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले, दिनशॉ वाचा और सुरेंद्रनाथ बनर्जी इस दौर के प्रमुख नेता थे। इनका विश्वास ब्रिटिश न्यायप्रियता में था और वे ‘प्रार्थना, याचिका और प्रतिवाद’ (3P – Prayer, Petition, Protest) की संवैधानिक सीमाओं में रहकर सुधारों की मांग करते थे। यद्यपि गरमपंथी उन्हें ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ कहते थे, किंतु नरमपंथियों का सबसे बड़ा योगदान अंग्रेजों के आर्थिक शोषण का पर्दाफाश करना था। दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में ‘धन की निकासी का सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि अंग्रेज किस प्रकार भारत की संपत्ति को प्रतिवर्ष ब्रिटेन खींचकर ले जा रहे हैं।
अमर शहीदों का त्याग, अदम्य साहस और स्वदेशी का संकल्प 1857 से 1947 तक स्वाधीनता संग्राम की अमर ज्योति बना रहा।
बंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन (1905): गरमपंथी राष्ट्रवाद का उदय
1905 में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने हिंदू और मुस्लिम एकता को तोड़ने तथा बंगाल के राष्ट्रवादी केंद्र को कुचलने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति के तहत ‘बंगाल विभाजन’ की घोषणा की। 16 अक्टूबर 1905 को जब विभाजन प्रभावी हुआ, पूरे बंगाल में ‘शोक दिवस’ मनाया गया, लोगों ने गंगा में स्नान कर एक-दूसरे की कलाई पर राखियां बांधीं और रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘आमार सोनार बांग्ला’ गाते हुए सड़कों पर उतरे।
इसके विरोध में कलकत्ता के टाउन हॉल से ‘स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन’ आरंभ हुआ। विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई, स्वदेशी उद्योगों (जैसे बंगाल केमिकल्स), राष्ट्रीय विद्यालयों और अदालतों की स्थापना हुई। इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में ‘लाल-बाल-पाल’ (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) और अरबिंदो घोष के ‘गरमपंथी युग’ (Extremist Era) को जन्म दिया। लोकमान्य तिलक ने सिंहनाद किया: ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा!’ तिलक ने जन-चेतना जगाने के लिए ‘केसरी’ व ‘मराठा’ समाचार पत्र निकाले और गणेश उत्सव व शिवाजी महोत्सव आरंभ किए। 1907 के कांग्रेस के ‘सूरत अधिवेशन’ में नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच गहरा मतभेद हुआ जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस का पहला विभाजन हुआ। ऐतिहासिक शोध और आधुनिक इतिहास के प्रामाणिक संदर्भ भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध हैं।
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का प्रथम चरण: चापेकर बंधुओं से गदर आंदोलन तक
ब्रिटिश दमन और नरमपंथियों की निष्क्रियता से असंतुष्ट देशभक्त युवाओं ने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना। 1897 में पुणे में चापेकर बंधुओं (दामोदर और बालकृष्ण) ने प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या कर क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की नींव रखी। बंगाल में ‘अनुशीलन समिति’ और ‘युगांतर’ संगठन बने जहां बारिंद्र घोष और भूपेंद्रनाथ दत्त ने क्रांति का बिगुल फूंका।
1908 में मात्र 18 वर्ष के खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के क्रूर जज किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका। प्रफुल्ल चाकी ने स्वयं को गोली मार ली और खुदीराम बोस मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए। महाराष्ट्र में वीडी सावरकर ने 1904 में गुप्त क्रांतिकारी संगठन ‘अभिनव भारत’ की स्थापना की। विदेश में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना की जहां मदनलाल ढींगरा ने कर्जन विली को गोली मारी। मैडम भीकाजी कामा ने 1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में पहली बार विदेशी धरती पर भारतीय स्वतंत्रता का तिरंगा फहराया। 1913 में सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में लाला हरदयाल और सोहन सिंह भकना ने ‘गदर पार्टी’ की स्थापना की जिसने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में सैन्य विद्रोह की साहसिक योजना बनाई।
गांधीजी का भारत आगमन और चंपारण, खेड़ा व अहमदाबाद सत्याग्रह
9 जनवरी 1915 को जब मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्षों तक रंगभेद के विरुद्ध अहिंसक सत्याग्रह की अग्निपरीक्षा देकर भारत लौटे, तो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक नए युग का उदय हुआ। गोपाल कृष्ण गोखले के परामर्श पर गांधीजी ने दो वर्षों तक पूरे भारत का तीसरे दर्जे के रेल डिब्बे में भ्रमण कर आम जनता की वास्तविक पीड़ा को समझा।
1917 का ‘चंपारण सत्याग्रह’ (बिहार) भारत में गांधीजी का पहला सविनय अवज्ञा प्रयोग था। यहां राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर गांधीजी पहुंचे और अंग्रेजों की क्रूर ‘तिनकठिया प्रणाली’ (जमीन के 3/20 भाग पर नील की जबरन खेती) के शोषण से गरीब किसानों को मुक्त कराया। 1918 में गुजरात में ‘अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन’ में गांधीजी ने मजदूरों के 35 प्रतिशत बोनस के लिए पहली बार ‘भूख हड़ताल’ की। उसी वर्ष ‘खेड़ा सत्याग्रह’ में फसल बर्बाद होने के बावजूद लगान वसूली के विरुद्ध सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ मिलकर कर-मुक्त आंदोलन सफल कराया। इन तीनों सफलताओं ने गांधीजी को देश के करोड़ों किसानों और मजदूरों का निर्विवाद राष्ट्रनेता बना दिया।
रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और असहयोग आंदोलन (1919-1922)
प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने 1919 में काला कानून ‘रॉलेट एक्ट’ (बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील) पारित किया जिसके तहत किसी भी भारतीय को मात्र संदेह के आधार पर अनिश्चितकाल के लिए जेल में डाला जा सकता था। इसके विरोध में पूरे देश में हड़ताल हुई। पंजाब में लोकप्रिय नेता डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी का दिन) को अमृतसर के ‘जलियांवाला बाग’ में एक शांतिपूर्ण जनसभा आयोजित हुई।
क्रूर ब्रिटिश जनरल डायर ने बाग के एकमात्र संकरे निकास द्वार को बख्तरबंद गाड़ियों से बंद कर निहत्थी, निर्दोष भीड़ पर बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। सैकड़ों मासूम स्त्री, पुरुष और बच्चे शहीद हो गए। इस वीभत्स नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि और गांधीजी ने ‘कैसर-ए-हिंद’ पदक लौटा दिया।
1 अगस्त 1920 को लोकमान्य तिलक के देहावसान के दिन गांधीजी ने ‘असहयोग आंदोलन’ (Non-Cooperation Movement) आरंभ किया। इसके साथ ही प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की के खलीफा के पद की रक्षा हेतु चल रहे ‘खिलाफत आंदोलन’ को जोड़कर अभूतपूर्व हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित की गई। विदेशी वस्त्रों, सरकारी स्कूलों, अदालतों, उपाधियों और चुनावों का पूर्ण बहिष्कार किया गया। लाखों छात्रों ने स्कूल छोड़े और चरखा व खादी स्वावलंबन का प्रतीक बन गए। किंतु 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के ‘चौरी-चौरा’ में उग्र भीड़ ने एक पुलिस थाने को आग लगा दी जिसमें 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गए। हिंसा से व्यथित होकर गांधीजी ने 12 फरवरी 1922 को बारदोली बैठक में असहयोग आंदोलन को अचानक वापस ले लिया जिससे युवा क्रांतिकारी स्तब्ध रह गए।
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का दूसरा चरण: HRA, काकोरी, भगत सिंह और चटगांव शस्त्रागार
असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी से युवाओं का गांधीवादी राजनीति से मोहभंग हुआ और उन्होंने ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) का गठन किया। 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह ने सरकारी खजाना ले जा रही 8-डाउन ट्रेन को सहारनपुर-लखनऊ लाइन पर ‘काकोरी’ में लूटा। बिस्मिल, अशफाक, लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा दी गई। बिस्मिल की अमर पंक्तियां ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ देश के प्रत्येक युवा का राष्ट्रगान बन गईं।
चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में संगठन का पुनर्गठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) के रूप में हुआ जिसमें समाजवाद को स्वाधीनता का अंतिम लक्ष्य घोषित किया गया। 1928 में जब साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में लाठीचार्ज से लाला लाजपत राय की शहादत हुई, तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने 17 दिसंबर 1928 को पुलिस अधिकारी सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ‘बहरी सरकार को सुनाने के लिए’ केंद्रीय विधानसभा (सेंट्रल असेंबली) में खाली बेंचों पर धुआं फैलाने वाले बम फेंके और पर्चे बांटे। 63 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद जेल में जतिन दास शहीद हुए। 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु मुस्कुराते हुए ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों के साथ फांसी के फंदे पर झूल गए। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद ने अंतिम गोली स्वयं को मारकर अपने नाम को सार्थक किया (‘आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे’)। बंगाल में ‘मास्टर दा’ सूर्य सेन ने 1930 में चटगांव शस्त्रागार पर सफल छापा मारकर कुछ दिनों के लिए ब्रिटिश सत्ता को पूरी तरह उखाड़ फेंका था।
सविनय अवज्ञा आंदोलन और ऐतिहासिक दांडी यात्रा (1930-1934)
1929 के ऐतिहासिक ‘लाहौर अधिवेशन’ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ को अपना एकमात्र राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित किया और 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पहला ‘स्वाधीनता दिवस’ मनाया गया।
गांधीजी ने अपनी 11-सूत्रीय मांगों को वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा ठुकरा दिए जाने पर 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से 78 चुने हुए अनुयायियों के साथ 240 मील लंबी ऐतिहासिक ‘दांडी यात्रा’ आरंभ की। 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर दांडी पहुंचकर गांधीजी ने एक मुट्ठी प्राकृतिक नमक उठाकर ब्रिटिश नमक कानून को तोड़ा। इस प्रतीकात्मक कार्य ने ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ (Civil Disobedience Movement) की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। पूरे देश में नमक कानून तोड़ा गया, कर देने से मना किया गया, शराब और विदेशी दुकानों पर महिलाओं ने धरने दिए। पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान (‘सीमांत गांधी’) के नेतृत्व में ‘खुदाई खिदमतगार’ (लाल कुर्ती आंदोलन) ने अभूतपूर्व अहिंसक वीरता दिखाई। गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया।
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए गोलमेज सम्मेलनों का सहारा लिया। 1931 में ‘गांधी-इरविन समझौता’ हुआ और गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए। किंतु वहां सांप्रदायिक निर्वाचन के मुद्दे पर निराशा हाथ लगी। 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने ‘सांप्रदायिक पंचाट’ (Communal Award) की घोषणा की जिसके तहत दलितों को हिंदुओं से अलग पृथक निर्वाचक मंडल दिया गया। इसके विरोध में गांधीजी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया जिसके फलस्वरूप 24 सितंबर 1932 को डॉ. भीमराव अंबेडकर और गांधीजी के अनुयायियों के मध्य ऐतिहासिक ‘पूना पैक्ट’ (Poona Pact) संपन्न हुआ जिसमें पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज (INA) का महापराक्रम
1938 के हरिपुरा और 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष चुने जाने के बाद गांधीजी से वैचारिक मतभेदों के चलते नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब अंग्रेजों ने उन्हें नजरबंद कर दिया, नेताजी जनवरी 1941 में भेष बदलकर पेशावर, काबुल, मॉस्को होते हुए जर्मनी पहुंचे जहां उन्होंने हिटलर से मुलाकात की और ‘फ्री इंडिया लीजन’ का गठन किया।
इसके पश्चात एक खतरनाक पनडुब्बी यात्रा (यू-बोट) से नेताजी 1943 में जापान और सिंगापुर पहुंचे। वहां उन्होंने रास बिहारी बोस द्वारा स्थापित ‘आजाद हिंद फौज’ (Indian National Army – INA) की कमान संभाली और 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में ‘आजाद हिंद की अंतरिम सरकार’ की स्थापना की। नेताजी ने ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का अमर सिंहनाद किया। उन्होंने रानी झांसी रेजिमेंट के रूप में एशिया की पहली महिला लड़ाकू सैन्य टुकड़ी का गठन किया जिसकी कमांडर कैप्टन लक्ष्मी सहगल थीं।
आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से बर्मा के जंगलों को पार कर पूर्वोत्तर भारत के कोहिमा और इम्फाल तक तिरंगा फहराया और अंडमान-निकोबार द्वीपों का नाम ‘शहीद और स्वराज द्वीप’ रखा। युद्धोपरांत लाल किले में आजाद हिंद फौज के जनरलों (प्रेम सहगल, गुरुबख्श सिंह ढिल्लों, शाहनवाज खान) पर चले ऐतिहासिक मुकदमे ने पूरे देश में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अभूतपूर्व जन-विद्रोह खड़ा कर दिया। तेज बहादुर सप्रू, भूलाभाई देसाई और जवाहरलाल नेहरू ने वकीलों के गाउन पहनकर उनकी पैरवी की। 1946 में बंबई में हुए ‘शाही नौसेना विद्रोह’ (Royal Indian Navy Mutiny) ने ब्रिटिश हुकूमत को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब भारतीय सेना और नौसेना पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहा और उन्हें भारत छोड़ना ही पड़ेगा।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) और 15 अगस्त 1947: स्वाधीनता का सूर्योदय
1942 में क्रिप्स मिशन की विफलता के पश्चात 8 अगस्त 1942 को बंबई के ऐतिहासिक गोवालिया टैंक मैदान (अगस्त क्रांति मैदान) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) का प्रस्ताव पारित किया। गांधीजी ने देश को अपना अंतिम महामंत्र दिया: ‘करो या मरो’ (Do or Die)।
9 अगस्त 1942 की भोर में ही अंग्रेजों ने ‘ऑपरेशन जीरो ऑवर’ चलाकर गांधीजी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद सहित सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात जेलों में डाल दिया। नेतृत्वविहीन आंदोलन स्वतः स्फूर्त जनक्रांति में बदल गया। जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अरुणा आसफ अली ने भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन किया। उषा मेहता ने गुप्त कांग्रेस रेडियो संचालित किया। बलिया (चित्तू पांडे), सतारा (नाना पाटिल), और तामलुक (मातंगिनी हाजरा) में समानांतर राष्ट्रीय सरकारें स्थापित कर दी गईं। अंग्रेजों ने अमानवीय दमन किया किंतु स्वाधीनता की इस ज्वाला को बुझाना अब असंभव था।
1946 में ‘कैबिनेट मिशन’ भारत आया जिसने अंतरिम सरकार और संविधान सभा के गठन की रूपरेखा तैयार की। अंततः लॉर्ड माउंटबेटन की ‘3 जून 1947 की योजना’ के तहत ब्रिटिश संसद ने ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947’ पारित किया। 14-15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को जब पूरी दुनिया सो रही थी, भारत ने स्वाधीनता, संप्रभुता और जीवन के नए युग में प्रवेश किया। पंडित नेहरू ने लाल किले से अपना ऐतिहासिक भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny) दिया और सैकड़ों वर्षों की गुलामी की जंजीरें तोड़कर स्वतंत्र भारत का तिरंगा गगनचुंबी शान से लहरा उठा।
स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख आंदोलनों का समग्र तुलनात्मक विश्लेषण
1857 से 1947 तक चले भारत के स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न चरणों ने स्वतंत्रता की मंजिल तक पहुंचने में अपनी अनूठी भूमिका निभाई। इन आंदोलनों के नेतृत्व, कार्यप्रणाली और ऐतिहासिक प्रभावों का तुलनात्मक विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत किया गया है:
| आंदोलन / क्रांति | वर्ष एवं मुख्य नेतृत्वकर्ता | रणनीति एवं संघर्ष की पद्धति | ऐतिहासिक प्रभाव एवं परिणाम |
| 1857 की महाक्रांति | 1857 (मंगल पांडे, लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह) | सशस्त्र सैन्य विद्रोह, देशी रियासतों और किसानों की प्रत्यक्ष भागीदारी | ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत, ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन, राष्ट्रीय चेतना का बीजारोपण |
| स्वदेशी आंदोलन | 1905 (लाल-बाल-पाल, अरबिंदो घोष) | विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी उद्योगों व राष्ट्रीय शिक्षा का संवर्धन | 1911 में बंगाल विभाजन रद्द, भारतीय राजनीति में गरमपंथी राष्ट्रवाद की स्थायी स्थापना |
| असहयोग आंदोलन | 1920-1922 (महात्मा गांधी) | सत्याग्रह, उपाधियों का त्याग, सरकारी संस्थानों का अहिंसक बहिष्कार | राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन में बदला, चौरी-चौरा की घटना के बाद वापसी |
| सविनय अवज्ञा आंदोलन | 1930-1934 (महात्मा गांधी) | दांडी यात्रा, नमक कानून का उल्लंघन, कर न देने का अभियान | गांधी-इरविन समझौता, गोलमेज सम्मेलन, पूना पैक्ट, 1935 का भारत शासन अधिनियम |
| भारत छोड़ो एवं आईएनए | 1942-1945 (गांधीजी, सुभाष चंद्र बोस) | ‘करो या मरो’, समानांतर सरकारें, आजाद हिंद फौज का सैन्य अभियान | शाही नौसेना विद्रोह, ब्रिटिश सत्ता का पूर्ण पराभव, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता |
यह तुलनात्मक विश्लेषण प्रमाणित करता है कि भारत की स्वाधीनता किसी एक व्यक्ति, दल या विचारधारा का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह अहिंसक सत्याग्रहियों, सशस्त्र क्रांतिकारियों, किसानों, मजदूरों और सैनिकों के संयुक्त रक्त और पसीने से अर्जित महाविजय थी।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाचार पत्रों, साहित्य और प्रेस की भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कलम और विचारों की ताकत तोपों और बंदूकों से भी अधिक मारक सिद्ध हुई। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जब अंग्रेजों ने असंतोष को दबाने के लिए क्रूर सेंसरशिप लागू की, तब भारतीय पत्रकारों और साहित्यकारों ने अपने समाचार पत्रों और कालजयी कृतियों के माध्यम से जन-जन तक क्रांति का संदेश पहुंचाया। 1878 में लॉर्ड लिटन द्वारा लाया गया ‘वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट’ (देसी भाषा समाचार पत्र अधिनियम) भारतीय भाषाओं के अखबारों का गला घोंटने का प्रयास था, जिसके विरोध में शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष के ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने रातों-रात अपनी भाषा को बंगाली से अंग्रेजी में बदल लिया था।
बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’ और ‘मराठा’ ने महाराष्ट्र और पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला जलाई। तिलक को उनके आलेखों के कारण ही 6 वर्ष के कठोर कारावास की सजा देकर बर्मा की मांडले जेल भेजा गया था जहां उन्होंने अमर ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ की रचना की। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के 1882 में प्रकाशित उपन्यास ‘आनंदमठ’ में संकलित ‘वंदे मातरम’ गीत पूरे स्वाधीनता संग्राम का सबसे पवित्र और प्रेरक महामंत्र बन गया जिसे गाते हुए हजारों वीर फांसी के फंदे पर झूल गए।
महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ के माध्यम से सत्याग्रह और सामाजिक सुधारों का संदेश दिया। मौलाना अबुल कलाम आजाद के ‘अल-हिलाल’, गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ (जिसने बिजोलिया किसान आंदोलन को राष्ट्रीय ख्याति दिलाई), और डॉ. भीमराव अंबेडकर के ‘मूकनायक’ व ‘बहिष्कृत भारत’ ने शोषित और वंचित वर्गों में अधिकारों की चेतना फूंकी। यह निर्भीक पत्रकारिता ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों को उजागर करने का सबसे सशक्त माध्यम बनी।
जनजातीय और कृषक विद्रोह: स्वाधीनता संग्राम की अनकही गौरवगाथा
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल शहरों और शिक्षित मध्यम वर्ग तक सीमित नहीं था; वास्तव में ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध सबसे पहला और सबसे उग्र सशस्त्र प्रतिरोध देश के आदिवासियों और किसानों ने किया था। 1855-56 में बिहार और झारखंड के संथाल परगना में सिदो, कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में हुआ ‘संथाल हूल’ (संथाल विद्रोह) ब्रिटिश सेना और साहूकारों के शोषण के विरुद्ध पहला विशाल जनविद्रोह था जिसमें 20,000 से अधिक संथाल वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
छोटानागपुर के वनों में ‘भगवान’ बिरसा मुंडा के नेतृत्व में 1899-1900 में हुआ ‘उलगुलान’ (महाविद्रोह) आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की रक्षा का अमर संग्राम था। बिरसा मुंडा ने ‘दुकु’ (विदेशी शोषकों) को बाहर निकालने और मुंडा राज स्थापित करने का आह्वान किया। आंध्र प्रदेश के रम्पा क्षेत्र में अल्लूरी सीताराम राजू ने आदिवासियों को एकजुट कर ब्रिटिश पुलिस स्टेशनों पर गुरिल्ला हमले किए। मणिपुर में रानी गाइदिनल्यू ने मात्र 13 वर्ष की आयु में ब्रिटिश राज के विरुद्ध नागा विद्रोह का नेतृत्व किया जिन्हें बाद में पंडित नेहरू ने ‘पहाड़ों की बेटी’ और ‘रानी’ की उपाधि दी। राजस्थान में गोविंद गुरु के नेतृत्व में 1913 में ‘मानगढ़ धाम’ में जुटी भील आदिवासियों की सभा पर अंग्रेजी सेना ने गोलियां बरसाईं जिसमें 1,500 से अधिक आदिवासी शहीद हो गए जिसे ‘राजस्थान का जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम में वीरांगनाओं का अद्वितीय योगदान
भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सबसे गौरवशाली विशेषता देश की माताओं, बहनों और बेटियों की सक्रिय और निर्भीक भागीदारी थी। उन्होंने केवल गृहस्थी नहीं संभाली, बल्कि पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर लाठियां खाईं, जेल गईं और गोलियों का सामना किया। 1857 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, अवध की बेगम हजरत महल, और रामगढ़ की रानी अवंतीबाई लोधी ने रणचंडी बनकर अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे किए।
गांधीवादी युग में सरोजिनी नायडू (‘भारत कोकिला’) ने 1930 में धरासणा नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया जहां अंग्रेजी पुलिस ने निहत्थे सत्याग्रहियों पर बर्बर लाठीचार्ज किया किंतु वीरांगनाएं डिगी नहीं। सरोजिनी नायडू 1925 के कानपुर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। अरुणा आसफ अली ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बंबई के गोवालिया टैंक पर पुलिस की गोलियों के बीच तिरंगा फहराया और ‘1942 की नायिका’ कहलाईं। 73 वर्षीय वृद्धा मातंगिनी हाजरा (‘गांधी बूढ़ी’) ने बंगाल के तामलुक में सीने पर तीन गोलियां खाकर भी तिरंगे को हाथ से नहीं गिरने दिया। बीकाजी कामा, कस्तूरबा गांधी, कमला नेहरू, सुचेता कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित ने भारतीय नारी की अदम्य शक्ति का परिचय देकर विश्व को चकित कर दिया। इसके अतिरिक्त कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेजिमेंट की कमान संभालकर यह सिद्ध किया कि भारतीय नारी युद्ध के मोर्चे पर भी किसी से पीछे नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का यह त्याग भारतीय नारी शक्ति के अमर गौरव का सबसे उज्ज्वल अध्याय है।
गोलमेज सम्मेलन और 1935 का भारत शासन अधिनियम: संविधान की आधारशिला
साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करने और भारत के भावी संवैधानिक सुधारों पर चर्चा हेतु ब्रिटिश सरकार ने लंदन में तीन ‘गोलमेज सम्मेलन’ (Round Table Conferences – 1930, 1931, 1932) आयोजित किए। डॉ. भीमराव अंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले एकमात्र प्रमुख भारतीय नेता थे। कांग्रेस ने केवल दूसरे गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लिया जिसमें महात्मा गांधी एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन गए थे।
इन सम्मेलनों के निष्कर्षों के आधार पर 1935 में ब्रिटिश संसद ने ‘भारत शासन अधिनियम 1935’ (Government of India Act 1935) पारित किया। यह ब्रिटिश काल का सबसे बड़ा और विस्तृत कानून था जिसमें 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां थीं। इसने प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त कर ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ (Provincial Autonomy) की स्थापना की और केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान किया। एक अखिल भारतीय संघ और एक ‘संघीय न्यायालय’ (Federal Court – जो आज का सर्वोच्च न्यायालय है) तथा ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ (RBI) की स्थापना की गई। 1937 में इस अधिनियम के तहत 11 प्रांतों में चुनाव हुए जिनमें से 8 प्रांतों में कांग्रेस की लोकप्रिय सरकारें बनीं। आधुनिक भारतीय संविधान के 70 प्रतिशत से अधिक प्रशासनिक प्रावधान सीधे इसी 1935 के अधिनियम से ग्रहण किए गए हैं। इसके अतिरिक्त इस अधिनियम ने बर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग किया और सिंध व उड़ीसा के रूप में दो नए प्रांतों का सृजन किया। यद्यपि इसने पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान नहीं की, किंतु इसने भारतीयों को संसदीय शासन और विधायी प्रक्रियाओं का व्यावहारिक अनुभव प्रदान कर स्वतंत्र भारत के भविष्य के लोकतांत्रिक शासन की सुदृढ़ नींव रखी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
1. 1857 की क्रांति का प्रतीक चिह्न क्या था?
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का गुप्त संदेश और एकता का प्रतीक ‘कमल का फूल और रोटी’ (Lotus and Bread) था, जिसे गांव-गांव और छावनियों में एक हाथ से दूसरे हाथ पहुंचाकर क्रांति की योजना बनाई जाती थी।
2. जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए कौन सा ब्रिटिश अधिकारी जिम्मेदार था?
जनरल रेजीनाल्ड डायर ने जलियांवाला बाग में निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था। उस समय पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर था, जिसे 1940 में लंदन के कैक्सटन हॉल में सरदार उधम सिंह ने गोली मारकर जलियांवाला बाग के शहीदों का प्रतिशोध लिया था।
3. गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस क्यों लिया था?
4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में उग्र भीड़ ने एक पुलिस थाने को जला दिया था जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए थे। गांधीजी अहिंसा के सिद्धांत पर अडिग थे और उनका मानना था कि यदि आंदोलन हिंसक हो गया तो अंग्रेज इसका बर्बर दमन करेंगे, इसलिए उन्होंने 12 फरवरी 1922 को आंदोलन वापस ले लिया।
4. ‘करो या मरो’ (Do or Die) का नारा गांधीजी ने किस आंदोलन में दिया था?
गांधीजी ने 8 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का शंखनाद करते हुए ‘करो या मरो’ का ऐतिहासिक नारा दिया था, जिसका अर्थ था कि या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपने प्राण न्योछावर कर देंगे।
5. काकोरी ट्रेन एक्शन कब हुआ था और इसके प्रमुख नायक कौन थे?
काकोरी ट्रेन एक्शन 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के निकट हुआ था। इसके प्रमुख क्रांतिकारियों में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह और सचिंद्रनाथ बख्शी शामिल थे।
6. बाल गंगाधर तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ किसने कहा था?
ब्रिटिश पत्रकार वैलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन अनरेस्ट’ में बाल गंगाधर तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ (Father of Indian Unrest) कहा था क्योंकि उन्होंने स्वदेशी और स्वराज्य के माध्यम से जनमानस में अंग्रेजों के प्रति तीव्र प्रतिरोध उत्पन्न किया था।
7. आजाद हिंद फौज की स्थापना मूल रूप से किसने की थी?
आजाद हिंद फौज (INA) की स्थापना का मूल विचार सबसे पहले मोहन सिंह और ज्ञानी प्रीतम सिंह के मन में आया था और इसका औपचारिक गठन 1942 में रास बिहारी बोस ने जापान में किया था। बाद में 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इसका पुनर्गठन कर सर्वोच्च सेनापति का दायित्व संभाला।
8. महात्मा गांधी को पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ किसने कहा था?
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को सिंगापुर से आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण में गांधीजी को संबोधित करते हुए पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ (Father of the Nation) कहा था और भारत के मुक्ति संग्राम के लिए उनका आशीर्वाद मांगा था।
9. भारत के विभाजन की योजना को किस नाम से जाना जाता है?
भारत के विभाजन और स्वतंत्रता की रूपरेखा को ‘माउंटबेटन योजना’ या ‘3 जून योजना’ (3rd June Plan) कहा जाता है। इसके आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पारित किया जिसके तहत भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र अधिराज्यों (Dominions) का निर्माण हुआ।
निष्कर्ष एवं स्वतंत्रता के अमर सेनानियों को राष्ट्रीय नमन
भारत की स्वतंत्रता केवल एक तारीख या सत्ता का हस्तांतरण नहीं थी, बल्कि यह लाखों ज्ञात और अज्ञात शहीदों के पवित्र रक्त से लिखी गई स्वाधीनता की अमर गाथा थी। फांसी के फंदे को चूमने वाले भगत सिंह और अशफाक उल्ला खां, सीने पर गोलियां खाने वाली रानी लक्ष्मीबाई और मातंगिनी हाजरा, लाठियों के प्रहार सहते हुए शहीद होने वाले लाला लाजपत राय, और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ब्रिटिश साम्राज्य को झुकाने वाले महात्मा गांधी के त्याग का ऋण यह देश कभी नहीं चुका सकता। आज जब हम एक स्वतंत्र, संप्रभु और विश्व की अग्रणी महाशक्ति के रूप में अपनी यात्रा आगे बढ़ा रहे हैं, तो हमारा यह सर्वोच्च राष्ट्रीय दायित्व है कि हम अपने अमर शहीदों के सपनों के भारत का निर्माण करें—एक ऐसा भारत जो सांप्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक प्रगति और राष्ट्रभक्ति के उच्च आदर्शों से आलोकित हो। स्वतंत्रता संग्राम की यह पावन स्मृति युगों-युगों तक प्रत्येक भारतीय के हृदय में राष्ट्र-सेवा की अविरल प्रेरणा बनी रहेगी।


