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Home»राष्ट्रीय समाचार एवं समसामयिकी»भारत की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीति: जी-20, ब्रिक्स और बहुपक्षीय वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका
राष्ट्रीय समाचार एवं समसामयिकी

भारत की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीति: जी-20, ब्रिक्स और बहुपक्षीय वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका

अर्णव (Arnav)By अर्णव (Arnav)October 16, 2026No Comments26 Mins Read
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21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था एक ऐतिहासिक संक्रमण काल से गुजर रही है। शीतयुद्धोत्तर एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था के विघटन और बहुध्रुवीय वैश्विक संरचना के अभ्युदय के बीच भारत एक निर्णायक, संतुलित और आत्मविश्वास से परिपूर्ण वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया है। भारत की विदेश नीति अब केवल पारंपरिक अहस्तक्षेप या रक्षात्मक संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सक्रिय कूटनीति, राष्ट्रीय हितों के मुखर संरक्षण और वैश्विक समस्याओं के समाधान में अग्रणी भूमिका निभाने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। भारत आज किसी शक्ति गुट का पिछलग्गू बनने के स्थान पर अपनी ‘सामरिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) को सर्वोपरि रखते हुए सभी प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध संचालित कर रहा है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य) का सनातन दार्शनिक सिद्धांत आज भारत के कूटनीतिक व्यवहार का मार्गदर्शक मंत्र बन चुका है।

हाल के वर्षों में जी-20 की ऐतिहासिक अध्यक्षता, नई दिल्ली घोषणापत्र पर 100 प्रतिशत आम सहमति, अफ्रीकी संघ को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाकर ग्लोबल साउथ को वैश्विक मंच पर न्यायोचित प्रतिनिधित्व दिलाना, और ब्रिक्स के ऐतिहासिक विस्तार में रचनात्मक योगदान भारत के कूटनीतिक प्रभाव के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। एक तरफ जहां पश्चिमी जगत के साथ क्वाड (Quad) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के माध्यम से आर्थिक व सुरक्षा सहयोग सुदृढ़ हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स के माध्यम से यूरेशियाई संतुलन को भी साधने का अद्वितीय कौशल भारत ने प्रदर्शित किया है। इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम भारत की विदेश नीति के ऐतिहासिक विकास, गुटनिरपेक्षता से बहु-संलग्नता तक की वैचारिक यात्रा, जी-20 और ब्रिक्स की सफलता, भारत-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा रणनीति, ऊर्जा कूटनीति और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का संपूर्ण भू-राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

गुटनिरपेक्षता से बहु-संलग्नता: भारतीय विदेश नीति का वैचारिक विकास

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (Non-Aligned Movement – NAM) की आधारशिला रखी गई थी। शीतयुद्ध के उस भीषण दौर में जब विश्व अमेरिका और सोवियत संघ के दो परस्पर विरोधी परमाणु गुटों में विभाजित था, भारत ने दोनों गुटों से समान दूरी बनाए रखते हुए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और विकासशील देशों की संप्रभुता के संरक्षण का मार्ग चुना था। पंचशील के पांच सिद्धांत (एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, अनाक्रमण, आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप, समानता व पारस्परिक लाभ, और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व) इस नीति के आधार स्तंभ बने।

किंतु 1991 के आर्थिक उदारीकरण, सोवियत संघ के विघटन और 1998 के सफल परमाणु परीक्षणों (पोखरण-2) के पश्चात भारतीय कूटनीति में एक यथार्थवादी और व्यावहारिक रूपांतरण आरंभ हुआ। भारत ने यह स्वीकार किया कि आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ गहरा जुड़ाव अपरिहार्य है। वर्तमान समय में भारत की विदेश नीति ‘गुटनिरपेक्षता’ (Non-Alignment) के रक्षात्मक खोल से बाहर निकलकर ‘बहु-संलग्नता’ (Multi-Alignment) के सक्रिय सिद्धांत पर आधारित है। भारत आज अमेरिका के साथ 2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता करता है, रूस के साथ विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी बनाए रखता है, फ्रांस के साथ अत्याधुनिक रक्षा विनिर्माण में सहयोग करता है, और साथ ही एशियाई व अफ्रीकी देशों के साथ विकास साझेदारी को विस्तार देता है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक नीतिगत दस्तावेजों और राजनयिक वक्तव्यों का अवलोकन विदेश मंत्रालय भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध है।

जी-20 नई दिल्ली शिखर सम्मेलन: ग्लोबल साउथ का सशक्त स्वर

वर्ष 2023 में भारत द्वारा आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना सिद्ध हुआ। यूक्रेन संकट और अमेरिका-रूस तनाव के कारण विभाजित विश्व में जब बाली सम्मेलन के बाद यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि साझा घोषणापत्र पर सहमति असंभव होगी, भारत ने असाधारण राजनयिक कौशल का प्रदर्शन करते हुए सभी 83 अनुच्छेदों पर 100 प्रतिशत आम सहमति हासिल कर ‘नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन’ को पारित कराया।

इस सम्मेलन की सबसे ऐतिहासिक और युगांतरकारी उपलब्धि ‘अफ्रीकी संघ’ (African Union) को जी-20 का पूर्ण एवं स्थायी सदस्य बनाना रही। 55 अफ्रीकी देशों के इस संगठन को यूरोपीय संघ के समकक्ष दर्जा दिलाकर भारत ने सिद्ध कर दिया कि वह केवल अपने आर्थिक हितों की चिंता नहीं करता, बल्कि विकासशील और उपेक्षित देशों (‘ग्लोबल साउथ’) का सबसे विश्वसनीय और मुखर प्रतिनिधि है। भारत ने ‘वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट’ की मेजबानी करके 125 से अधिक विकासशील देशों की प्राथमिकताओं, जलवायु न्याय, खाद्य सुरक्षा और ऋण संकट को जी-20 के मुख्य एजेंडे में स्थापित किया। इसके अतिरिक्त हरित विकास समझौता, पर्यावरण के लिए जीवनशैली (LiFE), और वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन (Global Biofuels Alliance) की स्थापना ने भारत को हरित ऊर्जा संक्रमण का वैश्विक मार्गदर्शक बना दिया।

ब्रिक्स का विस्तार: बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था और डॉलर-मुक्ति की बहस

ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन ‘ब्रिक्स’ (BRICS) ने वैश्विक जीडीपी और जनसंख्या में जी-7 देशों को पीछे छोड़कर विश्व की आर्थिक शक्ति के केंद्र को पूर्व की ओर स्थानांतरित कर दिया है। जोहान्सबर्ग और कजान शिखर सम्मेलनों में ब्रिक्स का ऐतिहासिक विस्तार हुआ जिसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख आर्थिक व भू-राजनीतिक खिलाड़ियों को सम्मिलित किया गया।

ब्रिक्स के भीतर भारत की भूमिका अत्यंत संतुलित और रचनात्मक रही है। जहां संगठन के कुछ सदस्य ब्रिक्स को एक ‘पश्चिम-विरोधी’ राजनीतिक मंच में बदलने के आकांक्षी दिखाई देते हैं, वहीं भारत ने दृढ़ता से यह प्रतिपादित किया है कि ब्रिक्स को ‘पश्चिम-विरोधी’ (Anti-West) नहीं, बल्कि ‘गैर-पश्चिमी’ (Non-West) और वैश्विक सुधारों का सकारात्मक मंच होना चाहिए। भारत ने विकासशील देशों के बुनियादी ढांचे के विकास हेतु ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB) को सशक्त बनाने पर बल दिया है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग (Local Currency Settlement) और डिजिटल भुगतान प्रणालियों के अंतर्संबंध को बढ़ावा देकर भारत ने अत्यधिक डॉलर-निर्भरता के जोखिमों को कम करने की दिशा में व्यावहारिक कदम उठाए हैं।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति वैश्विक सम्मेलन और बहुपक्षीय साझेदारी

बहुपक्षीय वैश्विक मंचों पर भारत की संतुलित कूटनीति शांति, आर्थिक स्थिरता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को सशक्त बना रही है।

भारत-प्रशांत क्षेत्र और क्वाड: स्वतंत्र, खुला और समावेशी समुद्री मार्ग

21वीं सदी में वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र अटलांटिक महासागर से स्थानांतरित होकर भारत-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में केंद्रित हो चुका है। विश्व का 60 प्रतिशत से अधिक समुद्री व्यापार और 50 प्रतिशत तेल परिवहन इसी समुद्री गलियारे से होकर गुजरता है। इस क्षेत्र में नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) सुनिश्चित करने के लिए भारत ने चतुर्भुज सुरक्षा संवाद यानी ‘क्वाड’ (Quad – भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) को एक सकारात्मक और उत्पादक मंच में रूपांतरित किया है।

भारत ने सदैव यह स्पष्ट किया है कि क्वाड किसी देश के विरुद्ध कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि यह एक रचनात्मक साझेदारी है जिसका उद्देश्य समुद्री क्षेत्र जागरूकता (Maritime Domain Awareness), टीकों का वितरण, साइबर सुरक्षा, आपदा राहत और महत्वपूर्ण व उभरती प्रौद्योगिकियों (Critical & Emerging Technologies) में सहयोग प्रदान करना है। इसके साथ ही भारत ने अपनी ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ (Act East Policy) के अंतर्गत दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन (आसियान) की केंद्रीयता को सर्वोपरि माना है। अंडमान और निकोबार कमान को सामरिक दृष्टि से सुदृढ़ करके भारत मलक्का जलडमरूमध्य और हिंद महासागर के प्रमुख चोक-पॉइंट्स पर अपनी सुरक्षात्मक उपस्थिति को अभेद्य बना रहा है।

पड़ोस प्रथम नीति और विस्तारित पड़ोस (Neighbourhood First & SAGAR)

किसी भी देश की वैश्विक आकांक्षाएं उसके अपने पड़ोस में शांति और स्थिरता पर निर्भर करती हैं। प्रधानमंत्री के विजन ‘पड़ोस प्रथम’ (Neighbourhood First) के तहत भारत ने अपने निकटतम पड़ोसियों (बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस) के साथ भौतिक, डिजिटल और ऊर्जा कनेक्टिविटी को अभूतपूर्व गति दी है। क्रॉस-बॉर्डर बिजली व्यापार, पाइपलाइन निर्माण, रेलवे लिंक और एकीकृत चेक पोस्ट (ICP) के माध्यम से उपमहाद्वीपीय आर्थिक एकीकरण को नई दिशा मिली है।

श्रीलंका के गंभीर आर्थिक संकट के समय भारत ने 4 अरब डॉलर से अधिक की त्वरित वित्तीय सहायता, ईंधन, खाद्य सामग्री और दवाएं भेजकर ‘मित्रता और मानवता’ का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी तुलना में संकट के समय अन्य देशों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए थे। हिंद महासागर में भारत का ‘सागर’ विजन (Security and Growth for All in the Region – SAGAR) यह सुनिश्चित करता है कि भारत एक ‘प्रथम उत्तरदाता’ (First Responder) और ‘शुद्ध सुरक्षा प्रदाता’ (Net Security Provider) के रूप में समुद्री डाकू विरोधी अभियानों, खोज व बचाव कार्यों और सुनामी/चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं में अपने द्वीपीय पड़ोसियों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे।

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC): 21वीं सदी का नया सिल्क रूट

जी-20 नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (India-Middle East-Europe Economic Corridor – IMEC) 21वीं सदी की वैश्विक संपर्क क्रांति का सबसे महत्वाकांक्षी रणनीतिक प्रोजेक्ट है। यह गलियारा भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजराइल और यूरोपीय देशों को एकीकृत रेल, पोत और डिजिटल पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ता है।

यह परियोजना न केवल भारत और यूरोप के मध्य माल ढुलाई के समय में 40 प्रतिशत और परिवहन लागत में 30 प्रतिशत की भारी कमी लाएगी, बल्कि यह स्वेज नहर पर निर्भरता को कम करते हुए एक सुरक्षित, टिकाऊ और हरित व्यापार गलियारा स्थापित करेगी। इसके अंतर्गत स्वच्छ हाइड्रोजन पाइपलाइन और उच्च गति डेटा केबल बिछाने की योजना है जो भारत को यूरोप और खाड़ी देशों के ऊर्जा व डिजिटल बाजार से सीधे जोड़ेगी। चीन की अपारदर्शी और ऋण-जाल वाली ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के विपरीत आईएमईसी संप्रभुता, वित्तीय पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित एक भरोसेमंद वैश्विक विकल्प प्रस्तुत करता है।

ऊर्जा कूटनीति और यथार्थवादी सामरिक संतुलन: रूस-यूक्रेन संघर्ष की कसौटी

रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत की ऊर्जा कूटनीति ने वैश्विक मंच पर भारत के राष्ट्रीय हितों के प्रति अडिग संकल्प को सिद्ध किया। पश्चिमी देशों के भारी कूटनीतिक और मीडिया दबाव के बावजूद भारत ने अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात जारी रखा। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट रूप से कहा कि यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं।

भारत ने अपनी घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के साथ-साथ परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करके वैश्विक ऊर्जा बाजार में तेल की कीमतों को आसमान छूने से रोका, जिसे बाद में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञों और अमेरिकी नीति निर्माताओं ने भी एक आवश्यक स्थिरता कारक के रूप में स्वीकार किया। इसके साथ ही भारत ने संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए लगातार कूटनीतिक संवाद का समर्थन किया और प्रधानमंत्री के ऐतिहासिक वक्तव्य कि ‘यह युद्ध का युग नहीं है’ को जी-20 के बाली और दिल्ली दोनों घोषणापत्रों में सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। भारत ने दोनों पक्षों के साथ अपने विश्वासपात्र संबंधों का उपयोग करते हुए बंदियों की रिहाई और परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा में पर्दे के पीछे रचनात्मक मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

सॉफ्ट पावर, वैक्सीन मैत्री और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)

पारंपरिक सैन्य और आर्थिक शक्ति (हार्ड पावर) के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक और नैतिक शक्ति (सॉफ्ट पावर) ने विश्व जनमानस में भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया जाना भारतीय सनातन जीवन दर्शन की वैश्विक स्वीकृति का प्रत्यक्ष उदाहरण है। बॉलीवुड, भारतीय संगीत, आयुर्वेद, वस्त्र परंपरा और समृद्ध खान-पान दुनिया भर के समाजों को भारत से जोड़ रहे हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल ने वैश्विक मानवता की रक्षा में मील का पत्थर स्थापित किया। जब विकसित पश्चिमी देश टीकों की जमाखोरी कर रहे थे, तब भारत ने दुनिया के 100 से अधिक निर्धन और विकासशील देशों को ‘मेड इन इंडिया’ टीकों की करोड़ों खुराकें निःशुल्क और रियायती दरों पर उपलब्ध कराईं। इसके अतिरिक्त भारत का ‘डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना’ (Digital Public Infrastructure – DPI) मॉडल जैसे आधार, यूपीआई, और को-विन विश्व भर के विकासशील देशों के लिए डिजिटल सशक्तिकरण का आदर्श ब्लूप्रिंट बन चुका है। कई देश अब भारत के यूपीआई और डिजीलॉकर तकनीकी ढांचे को अपने यहां लागू करने के लिए भारत के साथ समझौता कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता

1945 के द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों पर आधारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढांचा आज की 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से पूरी तरह कट चुका है। 1.4 अरब की जनसंख्या, विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी और सबसे तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था, सबसे बड़े लोकतंत्र और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना (UN Peacekeeping) में सबसे अधिक सैनिकों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले देश भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से वंचित रखना इस संस्था की वैधता और प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

भारत ने ‘जी-4’ समूह (भारत, जापान, जर्मनी, ब्राजील) और ‘एल.69’ विकासशील देशों के गठबंधन के माध्यम से सुरक्षा परिषद के विस्तार और कार्यप्रणाली में सुधार हेतु सघन कूटनीतिक अभियान चलाया है। सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों में से चार (अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस) ने भारत की स्थायी सदस्यता का आधिकारिक रूप से पूर्ण समर्थन किया है, जबकि केवल चीन भू-राजनीतिक संकीर्णता के कारण तकनीकी बाधाएं उत्पन्न करता रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक गतिविधियों और सुधार प्रक्रियाओं का अध्ययन संयुक्त राष्ट्र आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध है। सुरक्षा परिषद में सुधार के बिना वैश्विक शांति और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

वैश्विक बहुपक्षीय मंचों में भारत की भागीदारी का तुलनात्मक विश्लेषण

भारत आज विश्व के लगभग सभी महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंचों में एक सक्रिय, प्रभावशाली और सम्मानजनक सदस्य के रूप में कार्यरत है। इन विभिन्न संगठनों का स्वरूप, भारत का रणनीतिक उद्देश्य और वैश्विक प्रभाव विशिष्ट हैं। नीचे दी गई तालिका में भारत के प्रमुख बहुपक्षीय मंचों की भूमिका का समग्र तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

मंच / संगठन सदस्य देश एवं स्वरूप भारत का मुख्य रणनीतिक हित प्रमुख उपलब्धि एवं प्रभाव
जी-20 (G20) 19 प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं, यूरोपीय संघ एवं अफ्रीकी संघ ग्लोबल साउथ का नेतृत्व, समावेशी सतत विकास और वित्तीय स्थिरता नई दिल्ली घोषणापत्र, अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता, वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन
ब्रिक्स (BRICS) भारत, ब्राजील, रूस, चीन, द. अफ्रीका + 5 नए सदस्य बहुध्रुवीय आर्थिक संरचना, स्थानीय मुद्रा व्यापार, न्यू डेवलपमेंट बैंक वैश्विक जीडीपी में जी-7 से अधिक हिस्सेदारी, पश्चिमी वित्तीय प्रभुत्व का संतुलन
क्वाड (Quad) भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया स्वतंत्र, खुला भारत-प्रशांत, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण तकनीकें इंडो-पैसिफिक मैरीटाइम अवेयरनेस, वैक्सीन आपूर्ति, साइबर रेजिलिएंस नेटवर्क
एससीओ (SCO) यूरेशियाई देश (रूस, चीन, मध्य एशियाई गणराज्य, ईरान) सीमा पार आतंकवाद पर रोक (RATS), मध्य एशिया से व्यापार व ऊर्जा संपर्क चाबहार बंदरगाह के माध्यम से यूरेशिया कनेक्टिविटी, आतंकवाद निरोधक समन्वय
आईएसए (ISA) 120+ कर्क व मकर रेखा के मध्य स्थित सौर समृद्ध देश सौर ऊर्जा क्रांति, जलवायु वित्तपोषण, ‘वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड’ मुख्यालय गुरुग्राम (भारत) में स्थित पहला बहुपक्षीय संधि-आधारित संगठन

यह तुलनात्मक परिदृश्य स्पष्ट करता है कि भारत किसी एक मंच तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विश्व के सभी रणनीतिक मंचों पर समान अधिकार और आत्मविश्वास के साथ अपने राष्ट्रीय और वैश्विक दायित्वों का निर्वहन कर रहा है।

भारत की आर्थिक कूटनीति: मुक्त व्यापार समझौते और वैश्विक आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण

आर्थिक शक्ति किसी भी देश की विदेश नीति का सबसे ठोस और प्रभावी संबल होती है। भारत ने हाल के वर्षों में अपनी आर्थिक कूटनीति को नए सिरे से परिभाषित करते हुए आधुनिक, संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर हस्ताक्षर किए हैं। संयुक्त अरब अमीरात के साथ ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता’ (CEPA) और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता’ (ECTA) रिकॉर्ड समय में संपन्न किए गए, जिसने भारतीय वस्त्र, रत्न-आभूषण, कृषि उत्पादों और इंजीनियरिंग वस्तुओं के लिए विशाल अंतरराष्ट्रीय बाजारों के द्वार खोल दिए हैं।

इसके अतिरिक्त भारत वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम, यूरोपीय संघ और ओमान के साथ उच्च स्तरीय व्यापार वार्ताओं को अंतिम रूप देने में संलग्न है। इन समझौतों में केवल पारंपरिक सीमा शुल्क कटौती ही शामिल नहीं है, बल्कि सेवाओं के व्यापार, बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल व्यापार, और भारतीय कुशल पेशेवरों व तकनीकी विशेषज्ञों की आसान आवाजाही के प्रावधान भी सुनिश्चित किए जा रहे हैं। वैश्विक महामारी और भू-राजनीतिक तनावों के पश्चात जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां ‘चाइना प्लस वन’ (China Plus One) की रणनीति पर काम कर रही हैं, भारत अपनी उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और फार्मास्यूटिकल्स विनिर्माण का प्रमुख वैश्विक केंद्र बनकर उभर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI)

जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक लड़ाई में भारत ने केवल उपदेश देने के स्थान पर धरातल पर ठोस संस्थानों की स्थापना करके वैश्विक नेतृत्व की नई मिसाल पेश की है। भारत और फ्रांस के संयुक्त प्रयास से पेरिस जलवायु शिखर सम्मेलन के दौरान ‘अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन’ (International Solar Alliance – ISA) की स्थापना की गई। यह पहला ऐसा अंतर-सरकारी वैश्विक संगठन है जिसका अंतरराष्ट्रीय सचिवालय भारत (गुरुग्राम, हरियाणा) में स्थापित किया गया है। 120 से अधिक सदस्य देशों के साथ यह गठबंधन सौर ऊर्जा के तीव्र प्रसार, वित्तपोषण और तकनीकी हस्तांतरण के लिए कार्य कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रस्तुत ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (OSOWOG) का विजन दुनिया के विभिन्न समय क्षेत्रों को एक साझा वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा ग्रिड से जोड़ने का क्रांतिकारी खाका है। इसी प्रकार प्राकृतिक आपदाओं से विकासशील देशों के बुनियादी ढांचे की रक्षा हेतु भारत ने ‘आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन’ (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure – CDRI) की स्थापना की। चक्रवात, भूकंप और बाढ़ जैसी जलवायु आपदाओं के समय पुलों, सड़कों, बिजली ग्रिडों और दूरसंचार नेटवर्क को सुरक्षित रखने के लिए यह गठबंधन वैश्विक तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय संसाधनों का समन्वय करता है। इन पहलों ने भारत को वैश्विक जलवायु कूटनीति में एक उत्तरदायी और समाधान-प्रदाता शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय कानून, समुद्री सुरक्षा और भारतीय नौसेना की उपस्थिति

विश्व व्यापार का जीवनरक्त कहे जाने वाले अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की सुरक्षा में भारतीय नौसेना एक अत्यंत कुशल और पेशेवर समुद्री बल के रूप में कार्य कर रही है। अदन की खाड़ी और अरब सागर में हाल ही में हाउती विद्रोहियों के ड्रोन हमलों और सोमाली समुद्री डाकुओं के अपहरण प्रयासों के दौरान भारतीय नौसेना ने कई विदेशी व्यापारिक जहाजों और विभिन्न देशों के नाविकों को सुरक्षित बचाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का गहरा विश्वास अर्जित किया है।

भारत 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) का दृढ़ता से समर्थन करता है। भारत का यह अटूट विश्वास है कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नौवहन और हवाई उड़ानों की स्वतंत्रता सभी राष्ट्रों का जन्मसिद्ध अधिकार है और किसी भी देश को ऐतिहासिक दावों की आड़ में अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर आधुनिक हवाई पट्टी और जेट्टी का उद्घाटन, सेशेल्स के साथ तटीय रडार निगरानी प्रणाली का समन्वय, और ओमान के दुक्म बंदरगाह पर नौसैनिक रसद सुविधा भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति को हिंद महासागर के प्रत्येक कोने में अद्वितीय गहराई प्रदान करती है।

भारतीय प्रवासी कूटनीति: 3.2 करोड़ अनिवासी भारतीयों की शक्ति

विश्व भर में फैले 3.2 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के नागरिक और अनिवासी भारतीय (NRI) देश की सबसे मूल्यवान विदेश नीति परिसंपत्ति हैं। सिलिकॉन वैली के शीर्ष तकनीकी दिग्गजों से लेकर अमेरिका की नासा, यूके की संसद, और खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे के निर्माण तक भारतीयों की प्रतिभा, ईमानदारी और परिश्रम का लोहा पूरी दुनिया मानती है। यह प्रवासी समुदाय केवल भारत में प्रतिवर्ष 125 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा प्रेषण (रेमिटेंस) ही नहीं भेजता, बल्कि वे अपने संबंधित देशों की नीतियों को भारत के अनुकूल दिशा में प्रभावित करने वाले सबसे शक्तिशाली लॉबिंग समूह के रूप में कार्य करते हैं।

भारत सरकार ने अपने प्रवासियों की सुरक्षा और कल्याण को विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया है। संकटग्रस्त क्षेत्रों से भारतीयों को सुरक्षित निकालने के लिए ‘ऑपरेशन गंगा’ (यूक्रेन), ‘ऑपरेशन कावेरी’ (सूडान), ‘ऑपरेशन अजय’ (इजराइल), और ‘वंदे भारत मिशन’ (कोविड) जैसे अभूतपूर्व बचाव अभियान चलाए गए। प्रवासी भारतीय दिवस के माध्यम से सरकार देश के विकास में प्रवासियों की पूंजी, तकनीकी ज्ञान और नवाचार को सीधे जोड़ रही है। यह मजबूत भावनात्मक और सांस्कृतिक संबंध भारत की सॉफ्ट पावर का सबसे जीवंत स्तंभ है।

भारत की अंतरिक्ष कूटनीति: सार्क उपग्रह, वाणिज्यिक प्रक्षेपण और आर्टेमिस समझौता

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अंतरिक्ष विज्ञान को भारत की विदेश नीति का एक अत्यंत शक्तिशाली कूटनीतिक साधन बना दिया है। प्रधानमंत्री के विजन के अनुरूप भारत ने 2017 में ‘दक्षिण एशिया उपग्रह’ (जीसैट-9) का सफल प्रक्षेपण कर अपने पड़ोसी देशों (नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका और अफगानिस्तान) को निःशुल्क दूरसंचार, टेली-मेडिसिन और आपदा प्रबंधन डेटा उपहार स्वरूप प्रदान किया। यह अंतरिक्ष आधारित परोपकारी कूटनीति का विश्व में पहला ऐसा अद्वितीय उदाहरण था।

इसरो की वाणिज्यिक शाखा ‘न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड’ (NSIL) ने अब तक अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, सिंगापुर और जापान सहित 34 से अधिक देशों के 400 से अधिक विदेशी उपग्रहों का अत्यंत विश्वसनीय और किफायती प्रक्षेपण किया है। इसके अतिरिक्त भारत ने अमेरिका के साथ ऐतिहासिक ‘आर्टेमिस समझौते’ पर हस्ताक्षर किए हैं, जो चंद्रमा और गहरे अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण, पारदर्शी और सतत अन्वेषण का अंतरराष्ट्रीय ढांचा निर्धारित करता है। नासा और इसरो का संयुक्त ‘निसार’ (NISAR) उपग्रह मिशन पृथ्वी की सतह पर होने वाले सूक्ष्म विस्थापन, ग्लेशियरों के पिघलने और वनों के कटाव की वैश्विक निगरानी करने वाला दुनिया का सबसे उन्नत रडार इमेजिंग उपग्रह है। यह अंतरिक्ष कूटनीति भारत को वैश्विक वैज्ञानिक नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करती है।

मध्य पूर्व एवं खाड़ी देशों के साथ सामरिक साझेदारी का पुनरुद्धार: आई2यू2 और ऊर्जा सुरक्षा

पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) भारत की ऊर्जा सुरक्षा और लाखों प्रवासी कामगारों की आजीविका की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्र है। भारत ने हाल के वर्षों में खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को पारंपरिक ‘क्रेता-विक्रेता’ (Buyer-Seller) संबंध से ऊपर उठाकर एक गहरी सामरिक, रक्षा और निवेश साझेदारी में रूपांतरित किया है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने भारत के राष्ट्रीय अवसंरचना और विनिर्माण क्षेत्र में अरबों डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। यूएई की राष्ट्रीय तेल कंपनी एडनॉक ने भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों (पादुर और मंगलौर) में कच्चे तेल का भंडारण किया है।

इसके साथ ही ‘आई2यू2’ (I2U2 – भारत, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका) के गठन ने पश्चिम एशिया में एक नए आर्थिक और तकनीकी सहयोग का सूत्रपात किया है। इसे अक्सर ‘पश्चिम एशियाई क्वाड’ कहा जाता है, जिसका प्राथमिक ध्यान खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, जल प्रबंधन और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पर केंद्रित है। गुजरात में 300 मेगावाट के हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र और मध्य प्रदेश में एकीकृत खाद्य पार्कों की स्थापना आई2यू2 की ठोस उपलब्धियां हैं। भारत ने इजराइल और अरब देशों के बीच संबंधों के सामान्यीकरण (अब्राहम समझौते) का स्वागत करते हुए दोनों पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं और साथ ही फिलिस्तीनी जनता के द्वि-राष्ट्र समाधान के वैध अधिकारों का लगातार समर्थन किया है।

साइबर सुरक्षा कूटनीति एवं वैश्विक डिजिटल डेटा संप्रभुता

डिजिटल युग में युद्ध और कूटनीति के आयाम भौतिक सीमाओं से परे साइबर स्पेस में स्थानांतरित हो चुके हैं। सीमा पार से होने वाले प्रायोजित साइबर हमले, रैनसमवेयर और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना (पावर ग्रिड, बैंकिंग नेटवर्क, नाभिकीय संयंत्र) पर डिजिटल हमलों से सुरक्षा के लिए भारत वैश्विक साइबर कूटनीति का एक अग्रणी स्तंभ बन चुका है। भारत संयुक्त राष्ट्र ओपन-एंडेड वर्किंग ग्रुप (OEWG) में सक्रिय रूप से भाग लेता है और जिम्मेदार राष्ट्र-राज्य व्यवहार के सार्वभौमिक नियमों की वकालत करता है।

भारत का दृढ़ मत है कि इंटरनेट खुला, सुरक्षित, स्थिर और सुलभ होना चाहिए, किंतु डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) का सम्मान प्रत्येक राष्ट्र का मौलिक अधिकार है। 1.4 अरब नागरिकों के व्यक्तिगत और वित्तीय डेटा की सुरक्षा हेतु भारत ने कड़े डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून लागू किए हैं। भारत वैश्विक काउंटर-रैनसमवेयर इनिशिएटिव का एक सक्रिय सदस्य है और इंटरपोल तथा मित्र राष्ट्रों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर सीमा पार साइबर वित्तीय अपराधों और डार्क-वेब गतिविधियों पर नकेल कसने हेतु रीयल-टाइम खुफिया जानकारी साझा करता है।

अफ्रीकी महाद्वीप के साथ विकास साझेदारी: क्षमता निर्माण और पैन-अफ्रीका ई-नेटवर्क

अफ्रीका और भारत का संबंध सदियों पुराना, औपनिवेशिक विरोधी साझा संघर्ष और अटूट सांस्कृतिक बंधनों पर आधारित है। भारत ने अफ्रीका के साथ अपनी विकास साझेदारी को कभी भी शोषणकारी या ऋण-जाल (Debt Trap) पर आधारित नहीं बनाया, बल्कि अफ्रीकी देशों की स्थानीय प्राथमिकताओं और युवाओं के सशक्तिकरण को केंद्र में रखा है। भारत के ‘भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग’ (ITEC) कार्यक्रम के तहत प्रतिवर्ष हजारों अफ्रीकी छात्रों, राजनयिकों, सैन्य अधिकारियों और डॉक्टरों को भारत में निःशुल्क उच्च स्तरीय प्रशिक्षण दिया जाता है।

भारत द्वारा प्रवर्तित ‘पैन-अफ्रीका ई-नेटवर्क’ परियोजना ने अफ्रीका के 48 देशों को भारत के शीर्ष सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों से टेली-मेडिसिन और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से टेली-एजुकेशन के जरिए जोड़ा है। भारत ने केन्या, तंजानिया, मोजाम्बिक, इथियोपिया और घाना जैसे देशों में पेयजल आपूर्ति, कृषि यंत्रीकरण, रेलवे आधुनिकीकरण और चीनी मिलों की स्थापना हेतु 12 अरब डॉलर से अधिक की रियायती ऋण सहायता (Line of Credit) प्रदान की है। इसके अतिरिक्त हिंद महासागर के पश्चिमी तट पर स्थित अफ्रीकी देशों के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास और समुद्री गश्त के माध्यम से भारत समुद्री डकैती विरोधी अभियानों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। अफ्रीका का यह गहरा विश्वास ही जी-20 में अफ्रीकी संघ को शामिल कराने में भारत की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति बना।

ध्रुवीय कूटनीति: अंटार्कटिका, आर्कटिक और गहरे समुद्र में वैज्ञानिक अनुसंधान

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक पर्यावरण के रहस्यों को समझने के लिए भारत ने अपनी ध्रुवीय कूटनीति (Polar Diplomacy) को अत्यधिक सुदृढ़ किया है। अंटार्कटिका में भारत के दो स्थायी वैज्ञानिक अनुसंधान स्टेशन ‘मैत्री’ और ‘भारती’ पूरे वर्ष सक्रिय रहते हैं जहां भारतीय वैज्ञानिक ग्लेशियरों की गति, वायुमंडलीय भौतिकी और अंतरिक्ष मौसम का अध्ययन करते हैं। भारत ने 2022 में ऐतिहासिक ‘भारतीय अंटार्कटिक अधिनियम’ पारित कर अपने अंटार्कटिक अभियानों को पूर्ण विधिक संरक्षण प्रदान किया है।

उत्तरी ध्रुव पर स्थित आर्कटिक क्षेत्र में भारत नॉर्वे के स्वालबार्ड में ‘हिमाद्री’ अनुसंधान केंद्र का संचालन करता है और भारत ‘आर्कटिक परिषद’ में एक सम्मानित पर्यवेक्षक सदस्य है। आर्कटिक के पिघलते बर्फ से भारतीय मानसून पर पड़ने वाले प्रभावों और नए खुलने वाले उत्तरी समुद्री व्यापार मार्गों पर भारत निरंतर शोध कर रहा है। इसके साथ ही पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के ‘समुद्रयान’ मिशन के तहत 6,000 मीटर गहरे समुद्र में स्वदेशी मानवयुक्त पनडुब्बी ‘मत्स्य 6000’ भेजकर दुर्लभ खनिज और पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स की खोज भारत को समुद्री विज्ञान में विश्व के शीर्ष 5 अग्रणी देशों की श्रेणी में स्थापित करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. भारतीय विदेश नीति में ‘सामरिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का वास्तविक अर्थ क्या है?

सामरिक स्वायत्तता का अर्थ यह है कि भारत किसी भी विदेशी शक्ति अथवा सैन्य गुट के दबाव में आए बिना, अपने राष्ट्रीय हितों, संप्रभुता और आर्थिक प्राथमिकताओं के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। भारत किसी भी देश के साथ संबंध दूसरे देश की कीमत पर नहीं बनाता।

2. भारत की अध्यक्षता में जी-20 की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि क्या मानी जाती है?

जी-20 नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि 55 देशों के संघ ‘अफ्रीकी संघ’ (African Union) को जी-20 का पूर्ण एवं स्थायी सदस्य बनाना रही। इसके साथ ही भू-राजनीतिक विभाजन के बावजूद 83 अनुच्छेदों पर 100 प्रतिशत आम सहमति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पारित कराना भारत का ऐतिहासिक कूटनीतिक विजय रहा।

3. क्या ब्रिक्स का विस्तार भारत के हितों के अनुकूल है या इससे चीन का प्रभाव बढ़ेगा?

ब्रिक्स के विस्तार में भारत ने सक्रिय भूमिका निभाई है। भारत ने यह सुनिश्चित किया कि नए सदस्यों के चयन में स्पष्ट मानदंड हों और संगठन किसी एक देश की व्यक्तिगत भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा का औजार न बने। यूएई, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों का समावेश भारत के पश्चिम एशियाई रणनीतिक और ऊर्जा हितों को सुदृढ़ करता है।

4. क्या क्वाड (Quad) एशिया का नाटो (NATO) है?

नहीं, क्वाड कोई सैन्य गठबंधन नहीं है और न ही इसमें कोई पारस्परिक रक्षा संधि (Mutual Defense Treaty) शामिल है। भारत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि क्वाड एक स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित भारत-प्रशांत क्षेत्र के निर्माण, आपदा प्रबंधन, समुद्री सुरक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग का सकारात्मक मंच है।

5. भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

आईएमईसी भारत को खाड़ी देशों और यूरोप से जोड़ने वाला सबसे तीव्र और किफायती व्यापार मार्ग है। यह भारत से यूरोप तक माल ढुलाई के समय में 40 प्रतिशत की कटौती करेगा, स्वेज नहर की निर्भरता को समाप्त करेगा और भारत को स्वच्छ ऊर्जा व डिजिटल कनेक्टिविटी का वैश्विक केंद्र बनाएगा।

6. चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) रणनीति का भारत कैसे मुकाबला कर रहा है?

भारत अपनी ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ (Necklace of Diamonds) रणनीति के तहत ओमान के दुक्म बंदरगाह, ईरान के चाबहार, इंडोनेशिया के सबांग, मेडागास्कर और मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर सामरिक पहुंच विकसित कर रहा है। इसके साथ ही अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का सैन्य सुदृढ़ीकरण हिंद महासागर में भारत का प्रभुत्व अक्षुण्ण रखता है।

7. क्या भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के बिना वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है?

हां, जी-20, ब्रिक्स, क्वाड और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत का वर्तमान नेतृत्व यह दर्शाता है कि भारत पहले से ही एक डी-फैक्टो (व्यावहारिक) वैश्विक शक्ति है। सुरक्षा परिषद में वीटो के अभाव के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था और जलवायु वार्ताओं में भारत की सहमति के बिना कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय निर्णय संभव नहीं है।

8. भारतीय प्रवासी समुदाय (Diaspora) भारतीय विदेश नीति को कैसे सशक्त बनाता है?

विश्व भर में फैले 3.2 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक और आर्थिक राजदूत हैं। वे प्रतिवर्ष 125 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी धन (रेमिटेंस) भारत भेजते हैं, और अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा व खाड़ी देशों की राजनीति और उद्योग जगत में शीर्ष पदों पर बैठकर भारत के हितों का समर्थन करते हैं।

9. ‘वैक्सीन मैत्री’ और ‘ऑपरेशन दोस्त’ ने भारत की वैश्विक छवि को कैसे बदला?

वैक्सीन मैत्री के माध्यम से 100 से अधिक देशों को जीवनरक्षक टीके पहुंचाकर और तुर्किये-सीरिया भूकंप में ‘ऑपरेशन दोस्त’ व म्यांमार चक्रवात में ‘ऑपरेशन करुणा’ के तहत त्वरित सहायता भेजकर भारत ने यह सिद्ध किया कि वह वैश्विक संकटों में निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करने वाला सबसे विश्वसनीय मित्र है।

निष्कर्ष एवं 21वीं सदी में भारत का वैश्विक मार्ग

21वीं सदी का भारत अब केवल वैश्विक राजनीति का मूक दर्शक नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने वाला विश्वमित्र और वैश्विक वास्तुकार (Global Rule Maker) बन चुका है। भारत की विदेश नीति का भविष्य उसकी निरंतर आर्थिक संवृद्धि, स्वदेशी रक्षा क्षमताओं, डिजिटल नवाचार और लोकतांत्रिक मूल्यों की शक्ति पर निर्भर करता है। इतिहास साक्षी है कि भारत ने कभी किसी देश की सीमा पर कब्जा नहीं किया और न ही औपनिवेशिक विस्तार का मार्ग अपनाया। भारत का उत्थान शांति, सह-अस्तित्व और संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। जैसे-जैसे भारत अपनी आजादी के शताब्दी वर्ष (2047) की ओर अग्रसर हो रहा है, एक विकसित राष्ट्र के रूप में भारत की कूटनीति विश्व को स्थिरता, न्याय और समृद्धि की नई दिशा प्रदान करती रहेगी।

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अर्णव (Arnav)
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मुख्य संपादक एवं शोध विश्लेषक - सतलोक वर्ल्ड (SatlokWorld.com)। पत्रकारिता एवं जनसंचार में परास्नातक, 6+ वर्षों का डिजिटल मीडिया, आध्यात्मिक दर्शन, सिविल सेवा व प्रतियोगी परीक्षा विश्लेषण में शोध अनुभव। गूगल 2026 E-E-A-T गुणवत्ता मानकों के अनुरूप निष्पक्ष, प्रामाणिक और तथ्यपरक सामग्री निर्माण के प्रति समर्पित।

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