21वीं सदी में संपूर्ण मानव जाति के अस्तित्व, आर्थिक स्थिरता और जैव विविधता के समक्ष जलवायु परिवर्तन सबसे गंभीर और अभूतपूर्व वैश्विक संकट बनकर उभरा है। वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि, ग्लेशियरों का तीव्र गति से पिघलना, अप्रत्याशित मौसमी चक्र, भीषण सूखा, विनाशकारी चक्रवात और समुद्र के जलस्तर का बढ़ना यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को तुरंत सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी गई तो भावी पीढ़ियों के लिए यह धरा रहने योग्य नहीं बचेगी। इस वैश्विक चुनौती के बीच भारत ने एक उत्तरदायी, दूरदर्शी और साहसिक वैश्विक नेतृत्व का परिचय दिया है। विश्व की 17 प्रतिशत से अधिक आबादी का पोषण करने और ऐतिहासिक रूप से वैश्विक संचयी कार्बन उत्सर्जन में मात्र 4 प्रतिशत से भी कम का योगदान होने के बावजूद भारत ने कभी अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा। भारत ने स्पष्ट किया है कि भारत की विकास गाथा पश्चिमी देशों की तरह पर्यावरण विनाश पर आधारित नहीं होगी, बल्कि वह प्रकृति के साथ सनातन सह-अस्तित्व और सतत विकास के अटूट संतुलन पर केंद्रित होगी।
ग्लासगो में आयोजित कॉप-26 (COP-26) जलवायु शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री ने विश्व के समक्ष ‘पंचामृत’ (Panchamrit) का ऐतिहासिक संकल्प प्रस्तुत किया, जिसके अंतर्गत वर्ष 2070 तक भारत को ‘शुद्ध-शून्य’ (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन वाला राष्ट्र बनाने का राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित किया गया। इसके साथ ही 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाने और अपनी कुल बिजली आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने का साहसिक वादा किया गया। इस दिशा में भारत ने रिकॉर्ड समय में विश्व की चौथी सबसे बड़ी सौर ऊर्जा और चौथी सबसे बड़ी पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित कर एक हरित ऊर्जा महाक्रांति का सूत्रपात किया है। ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ के माध्यम से 1 करोड़ घरों की छतों पर सोलर रूफटॉप स्थापित करने का अभियान देश के जन-जन को ऊर्जा उत्पादक बना रहा है। इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम भारत के हरित संक्रमण, राष्ट्रीय सौर मिशन, हरित हाइड्रोजन नीति, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (FAME), मिशन LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली), कार्बन बाजार और जलवायु न्याय के वैश्विक आयामों का समग्र वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
पंचामृत संकल्प और भारत की राष्ट्रीय जलवायु कार्ययोजना (NDC)
कॉप-26 में भारत द्वारा प्रस्तुत ‘पंचामृत’ के पांच अमृत तत्व भारत की दीर्घकालिक जलवायु रणनीति की आधारशिला हैं। इन पांच लक्ष्यों में शामिल हैं:
1. 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाना।
2. 2030 तक अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करना।
3. अब से 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की भारी कटौती करना।
4. 2030 तक अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (Emissions Intensity of GDP) को 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत तक कम करना।
5. वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net-Zero) उत्सर्जन का ऐतिहासिक राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त करना।
भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपने अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDC) को संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) को औपचारिक रूप से सौंप दिया है। उल्लेखनीय है कि भारत उन अत्यंत विरले जी-20 देशों में शामिल है जिसने अपने 2015 के पेरिस लक्ष्यों को निर्धारित समय सीमा से 9 वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया था—जैसे कुल बिजली क्षमता में 40 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन का लक्ष्य 2021 में ही हासिल कर लिया गया था। यह भारत के कथनी और करनी की प्रामाणिकता को वैश्विक स्तर पर सिद्ध करता है। राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा नीतियों और योजनाओं का आधिकारिक विवरण नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध है।
राष्ट्रीय सौर मिशन और विशालकाय सोलर पार्क्स की क्रांति
भारत कर्क रेखा के समीप स्थित एक उष्णकटिबंधीय देश है जहां वर्ष में 300 से अधिक दिन प्रचुर और तीव्र धूप उपलब्ध रहती है। भारत की भौगोलिक स्थिति इसे प्रतिवर्ष 5,000 ट्रिलियन किलोवाट-घंटा सौर ऊर्जा प्राप्त करने की अतुलनीय प्राकृतिक संपदा प्रदान करती है। ‘जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन’ के अंतर्गत भारत ने सौर ऊर्जा क्षमता को 2014 के मात्र 2.6 गीगावाट से बढ़ाकर वर्तमान में 85 गीगावाट से अधिक के विशाल स्तर पर पहुंचा दिया है, जो 30 गुना से अधिक की अभूतपूर्व छलांग है।
भारत में दुनिया के कुछ सबसे विशालकाय एकल-परिसर सोलर पार्क्स स्थापित किए गए हैं। राजस्थान के जोधपुर में 14,000 एकड़ में फैला ‘भादला सोलर पार्क’ 2,245 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ विश्व का सबसे बड़ा संचालित सोलर पार्क है। इसी प्रकार कर्नाटक के तुमकुरु में ‘पावागढ़ सोलर पार्क’ (2,050 मेगावाट) और मध्य प्रदेश के रीवा में 750 मेगावाट का सोलर प्लांट स्थापित है जिसकी बिजली से दिल्ली मेट्रो ट्रेनें सफलतापूर्वक दौड़ रही हैं। गुजरात के कच्छ में 45,000 मेगावाट क्षमता वाला विश्व का सबसे बड़ा हाइब्रिड (सौर एवं पवन) नवीकरणीय ऊर्जा पार्क तीव्र गति से निर्माणाधीन है जो अंतरिक्ष से भी स्पष्ट दिखाई देता है। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के माध्यम से भारत ने आयातित चीनी सोलर पैनल्स पर निर्भरता समाप्त करते हुए देश के भीतर उच्च-दक्षता वाले सोलर सेल और मॉड्यूल निर्माण की पूर्ण घरेलू मूल्य शृंखला स्थापित की है।
पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना: जन-जन की छत पर सौर ऊर्जा
सौर ऊर्जा को केवल विशाल औद्योगिक पार्कों तक सीमित रखने के स्थान पर इसे देश के आम नागरिकों के घरों तक पहुंचाने के लिए 75,000 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ आरंभ की गई है। इस महत्वाकांक्षी योजना का लक्ष्य देश भर के 1 करोड़ मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के मकानों की छतों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित करना है।
इस योजना के तहत केंद्र सरकार 1 से 2 किलोवाट के सोलर सिस्टम पर 30,000 से 60,000 रुपये और 3 किलोवाट या उससे अधिक के सिस्टम पर 78,000 रुपये तक की सीधी सब्सिडी प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीयकृत बैंकों के माध्यम से मात्र 7 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर बिना किसी संपार्श्विक के आसान बैंक ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। इस रूफटॉप सौर प्रणाली से प्रत्येक परिवार को प्रति माह 300 यूनिट तक पूर्णतः निःशुल्क बिजली प्राप्त होती है, और अतिरिक्त उत्पादित बिजली को ‘नेट मीटरिंग’ (Net Metering) प्रणाली के जरिए सीधे ग्रिड को बेचकर परिवार प्रतिवर्ष 15,000 से 20,000 रुपये की अतिरिक्त आमदनी अर्जित कर रहे हैं। यह योजना देश के ऊर्जा वितरण निगमों (डिस्कॉम्स) के घाटे को कम करने और ग्रिड पर दबाव घटाने में क्रांतिकारी साबित हो रही है।
सौर ऊर्जा क्रांति, हरित हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार भारत को 2070 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन की ओर अग्रसर कर रहे हैं।
पवन ऊर्जा और अपतटीय पवन (Offshore Wind) की विशाल संभावनाएं
सौर ऊर्जा के समानांतर भारत पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भी एक वैश्विक अगुआ बन चुका है। भारत की कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 46 गीगावाट को पार कर चुकी है जिसमें तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान अग्रणी राज्य हैं। पवन ऊर्जा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह शाम और रात्रि के समय जब सौर विकिरण उपलब्ध नहीं होता, तब ग्रिड को संतुलित और स्वच्छ बिजली प्रदान करती है।
भारत की 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा अपतटीय पवन ऊर्जा (Offshore Wind Energy) के दोहन की असीम संभावनाएं प्रस्तुत करती है। भारत सरकार ने गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर 37 गीगावाट क्षमता के अपतटीय पवन फार्मों के विकास की राष्ट्रीय नीति अधिसूचित की है। गहरे समुद्र में स्थापित होने वाली ये विशाल टर्बाइन बिना किसी भूमि अधिग्रहण की बाधा के वर्ष भर चलने वाली तीव्र समुद्री हवाओं से निरंतर विशाल मात्रा में बिजली उत्पन्न करेंगी। सौर और पवन ऊर्जा के संयुक्त ‘हाइब्रिड प्लांट्स’ का निर्माण ग्रिड स्थिरता को सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी वैज्ञानिक साधन बन चुका है। पर्यावरण नियमों, वन संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण मानकों का प्रामाणिक संदर्भ पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध है।
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: उद्योगों का कार्बन-मुक्त कायाकल्प
बिजली उत्पादन के अतिरिक्त भारी उद्योगों (जैसे इस्पात, सीमेंट, तेल शोधन और रासायनिक उर्वरक) और भारी वाणिज्यिक परिवहन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को केवल बैटरी या सौर ऊर्जा से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसे ‘हार्ड-टू-एबेट’ (Hard-to-Abate) क्षेत्र कहा जाता है। इस चुनौती का स्थायी वैज्ञानिक समाधान ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen) है।
19,744 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ आरंभ किए गए ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ का लक्ष्य 2030 तक भारत में प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है। हरित हाइड्रोजन का उत्पादन पानी के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा सौर या पवन बिजली का उपयोग करके किया जाता है, जिसके जलने पर केवल शुद्ध जलवाष्प निकलती है और शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है। भारत ‘रणनीतिक हस्तक्षेप हरित हाइड्रोजन संक्रमण’ (SIGHT) कार्यक्रम के तहत इलेक्ट्रोलाइजर विनिर्माण और हरित हाइड्रोजन उत्पादन पर भारी वित्तीय प्रोत्साहन दे रहा है। भारत का लक्ष्य विश्व में सबसे कम लागत पर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन कर यूरोप और पूर्वी एशिया को इसका प्रमुख निर्यातक बनना है, जिससे 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के जीवाश्म ईंधन आयात की बचत होगी।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और फेम (FAME) योजना: हरित परिवहन क्रांति
भारत के बड़े शहरों में वायु प्रदूषण का लगभग 40 प्रतिशत कारण पारंपरिक पेट्रोल और डीजल वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुआं (पार्टिकुलेट मैटर PM2.5, कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड) है। इस पर्यावरणीय संकट के समाधान हेतु केंद्र सरकार ने ‘फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हाइब्रिड एंड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स’ (FAME) योजना और तत्पश्चात ‘ई-ड्राइव’ (PM E-DRIVE) योजना लागू की है।
इस नीति के तहत इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया और सार्वजनिक परिवहन बसों की खरीद पर सीधी सब्सिडी प्रदान की गई है। इसके परिणामस्वरूप देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में प्रतिवर्ष 50 प्रतिशत से अधिक की घातीय वृद्धि देखी जा रही है। देश भर के 100 से अधिक शहरों में हजारों वातानुकूलित इलेक्ट्रिक बसें सार्वजनिक परिवहन का हिस्सा बन चुकी हैं। देश के राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर हर 25 किलोमीटर पर फास्ट ईवी चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं। ‘पीएम ई-बस सेवा’ के माध्यम से टियर-2 और टियर-3 शहरों में 10,000 नई इलेक्ट्रिक बसें संचालित की जा रही हैं। उन्नत रसायन सेल (ACC) बैटरी विनिर्माण हेतु पीएलआई योजना लागू की गई है ताकि लिथियम-आयन बैटरी निर्माण में भारत पूर्णतः आत्मनिर्भर बन सके।
मिशन LiFE (Lifestyle for Environment): जनभागीदारी से पर्यावरण संरक्षण
ग्लासगो शिखर सम्मेलन में भारत ने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक क्रांतिकारी दार्शनिक विचार प्रस्तुत किया जिसे ‘मिशन LiFE’ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) नाम दिया गया। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की उपस्थिति में गुजरात के केवडिया (एकता नगर) से इसका वैश्विक शुभारंभ किया गया। इसका मूल दर्शन यह है कि जलवायु परिवर्तन केवल सरकारी नीतियों या अंतरराष्ट्रीय संधियों से नहीं रोका जा सकता जब तक कि दुनिया भर के आम नागरिक अपने दैनिक जीवन की आदतों में पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार को न अपनाएं।
मिशन LiFE ‘उपभोग-आधारित उपयोग और फेंको’ (Use and Throw) वाली पश्चिमी अर्थव्यवस्था के स्थान पर ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (पुनर्चक्रण और पुनःउपयोग) को बढ़ावा देता है। इसके सात प्रमुख क्रियान्वयन बिंदु हैं: पानी की बचत, बिजली की बचत, सिंगल-यूज प्लास्टिक का पूर्ण त्याग, सतत खाद्य प्रणालियां (मिलेट्स का उपभोग), ई-कचरा और ठोस कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन, स्वस्थ जीवनशैली और वाहनों का साझा उपयोग (पूलिंग)। भारत ने दुनिया के समक्ष ‘प्रो-प्लैनेट पीपल’ (P3) का विचार रखा है जहां पृथ्वी की सुरक्षा प्रत्येक नागरिक का दैनिक धर्म बन जाती है।
जैव विविधता संरक्षण, प्रोजेक्ट टाइगर और चीता पुनर्वास महापरियोजना
ऊर्जा संक्रमण के साथ-साथ भारत ने अपने प्राकृतिक वनों, वन्यजीवों और आद्रभूमियों (Wetlands) के संरक्षण में विश्वस्तरीय कीर्तिमान स्थापित किए हैं। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास एशियाई शेर, बंगाल टाइगर, भारतीय तेंदुआ, एक सींग वाला गैंडा और एशियाई हाथी सभी का प्राकृतिक आवास विद्यमान है।
‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के 50 वर्ष पूरे होने पर भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 3,682 से अधिक हो चुकी है जो विश्व के कुल जंगली बाघों की आबादी का 75 प्रतिशत से अधिक है। भारत ने दुनिया के सभी 7 बड़े मार्जारों (बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, चीता, जगुआर, प्यूमा) की रक्षा के लिए ‘इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस’ (IBCA) का गठन किया है। 1952 में भारत से विलुप्त घोषित हो चुके ‘चीता’ को नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाकर मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान और गांधी सागर अभयारण्य में सफलतापूर्वक पुनर्वासित किया गया है जो विश्व में अंतर-महाद्वीपीय बड़े मांसाहारी वन्यजीव स्थानांतरण का पहला सफल उदाहरण है। इसके अतिरिक्त भारत में अंतरराष्ट्रीय महत्व की ‘रामसर आद्रभूमियों’ (Ramsar Sites) की संख्या बढ़कर 85 हो चुकी है जो एशिया में सर्वाधिक है।
राष्ट्रीय वनीकरण और कार्बन सिंक निर्माण: ‘एक पेड़ मां के नाम’
पेरिस समझौते के तहत भारत ने 2030 तक अतिरिक्त वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 2.5 से 3 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर अतिरिक्त ‘कार्बन सिंक’ (Carbon Sink) सृजित करने की प्रतिबद्धता जताई है। ‘भारत वन स्थिति रिपोर्ट’ (ISFR) के अनुसार देश का कुल वन और वृक्षावरण 8.09 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक हो चुका है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 24.62 प्रतिशत है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आरंभ किया गया ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान देश भर में एक विशाल जन-आंदोलन बन चुका है जिसके तहत देश के करोड़ों नागरिकों, छात्रों, सुरक्षा बलों और सामाजिक संगठनों ने मिलकर 80 करोड़ से अधिक पौधे रोपे हैं। हिमालयी राज्यों में वनों की कटाई रोकने, पश्चिमी घाट की संवेदनशील पारिस्थितिकी के संरक्षण, और तटीय क्षेत्रों में चक्रवातों से रक्षा हेतु मैंग्रोव वनों के पुनरुद्धार के लिए ‘मिष्टी’ (MISHTI – Mangrove Initiative for Shoreline Habitats & Tangible Incomes) योजना संचालित की जा रही है। ये प्राकृतिक वन न केवल कार्बन सोखने का कार्य कर रहे हैं बल्कि भूजल स्तर को रिचार्ज करने और मिट्टी के कटाव को रोकने में जीवनदायिनी भूमिका निभा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): भारत का वैश्विक जलवायु नेतृत्व
भारत और फ्रांस के संयुक्त नेतृत्व में स्थापित ‘अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन’ (International Solar Alliance – ISA) वैश्विक जलवायु कूटनीति के इतिहास में भारत का सबसे बड़ा संस्थागत योगदान है। 120 से अधिक सदस्य देशों वाला यह पहला ऐसा बहुपक्षीय संधि-आधारित अंतरराष्ट्रीय संगठन है जिसका वैश्विक मुख्यालय भारत (गुरुग्राम, हरियाणा) में स्थित है।
आईएसए का मुख्य उद्देश्य कर्क और मकर रेखा के मध्य स्थित सौर समृद्ध विकासशील देशों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के वित्तपोषण की लागत को कम करना, तकनीकी हस्तांतरण को सुगम बनाना और 2030 तक 1,000 अरब डॉलर का सौर निवेश जुटाना है। प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (OSOWOG) की संकल्पना दुनिया भर के विभिन्न देशों के सौर ग्रिडों को आपस में जोड़कर चौबीसों घंटे निर्बाध सूर्य की रोशनी से बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने का एक युगांतरकारी वैश्विक खाका है। अंतरराष्ट्रीय सौर ऊर्जा परियोजनाओं और वित्तीय रूपरेखा का अध्ययन अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के आधिकारिक पोर्टल पर देखा जा सकता है।
प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का समग्र तुलनात्मक विश्लेषण
भारत के 2070 के शुद्ध-शून्य लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों का संतुलित और एकीकृत उपयोग अनिवार्य है। प्रत्येक ऊर्जा स्रोत की अपनी विशिष्ट पूंजी लागत, क्षमता उपयोग कारक और ग्रिड उपयोगिता होती है। नीचे दी गई तालिका में भारत के प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
| ऊर्जा स्रोत | वर्तमान स्थापित क्षमता | क्षमता उपयोग कारक (CUF) | 2030 का राष्ट्रीय लक्ष्य एवं मुख्य लाभ |
| सौर ऊर्जा (Solar Energy) | लगभग 85+ गीगावाट (सर्वाधिक तीव्र वृद्धि) | लगभग 20 से 25 प्रतिशत (दिन के समय) | 300 गीगावाट लक्ष्य, न्यूनतम टैरिफ दर (2.5 रु/यूनिट), रूफटॉप क्रांति |
| पवन ऊर्जा (Wind Energy) | लगभग 46+ गीगावाट | लगभग 25 से 35 प्रतिशत (मानसून व रात्रि) | 100 गीगावाट लक्ष्य, अपतटीय पवन फार्म, सौर ऊर्जा के साथ उत्कृष्ट हाइब्रिड संयोजन |
| हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) | पायलट एवं प्रारंभिक वाणिज्यिक इकाइयां | ऊर्जा भंडारण एवं ईंधन के रूप में 100% | 50 लाख टन वार्षिक उत्पादन, भारी उद्योगों और इस्पात का शून्य कार्बन उत्सर्जन |
| जलविद्युत (Hydro Power) | लगभग 47 गीगावाट (बड़ी परियोजनाएं) | लगभग 35 से 45 प्रतिशत (मौसमी प्रवाह) | पम्प्ड स्टोरेज प्लांट्स (PSP) द्वारा ग्रिड को विशालकाय जल-बैटरी भंडारण प्रदान करना |
| परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) | लगभग 8.1 गीगावाट (स्वदेशी 700 MWe PHWR) | लगभग 85 से 90 प्रतिशत (निरंतर 24×7) | 22.4 गीगावाट लक्ष्य, स्वच्छ बेसलोड बिजली, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR) |
यह तुलनात्मक सारिणी दर्शाती है कि भारत का ऊर्जा संक्रमण किसी एकाकी विकल्प पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह एक सुविचारित, बहु-ऊर्जा हाइब्रिड पोर्टफोलियो का निर्माण कर रहा है जो देश की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों को एक साथ सुनिश्चित करता है।
ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP): पर्यावरण संरक्षण के लिए बाजार-आधारित प्रोत्साहन
कॉप-28 जलवायु सम्मेलन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री द्वारा वैश्विक मंच पर घोषित ‘ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम’ (Green Credit Programme – GCP) पर्यावरण संरक्षण का दुनिया का पहला स्वैच्छिक, बाजार-आधारित और समग्र प्रोत्साहन तंत्र है। पारंपरिक कार्बन क्रेडिट व्यवस्था केवल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी पर केंद्रित थी, जबकि भारत का ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम कार्बन से आगे बढ़कर जल संरक्षण, वनीकरण, सतत कृषि, अपशिष्ट प्रबंधन और वायु प्रदूषण नियंत्रण जैसे बहु-आयामी पर्यावरणीय कार्यों को मापने और पुरस्कृत करने की व्यवस्था करता है।
इस कार्यक्रम के तहत कोई भी व्यक्ति, ग्राम पंचायत, गैर-सरकारी संगठन या कॉर्पोरेट कंपनी जब बंजर भूमि पर वृक्षारोपण करती है, पारंपरिक जल संरचनाओं (जैसे बावड़ियों और तालाबों) का पुनरुद्धार करती है, या जैविक खेती को अपनाती है, तो भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) द्वारा उसके कार्य का स्वतंत्र सत्यापन करके उसे ‘ग्रीन क्रेडिट्स’ जारी किए जाते हैं। इन ग्रीन क्रेडिट्स को एक समर्पित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अन्य कंपनियों को बेचा जा सकता है जो अपनी पर्यावरणीय जिम्मेदारियों (ESG) को पूरा करना चाहती हैं। यह व्यवस्था पर्यावरण संरक्षण को एक परोपकारी गतिविधि से आगे बढ़ाकर एक लाभदायक और वित्तीय रूप से व्यवहार्य आर्थिक गतिविधि में रूपांतरित करती है।
परमाणु ऊर्जा और स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR): स्वच्छ बेसलोड बिजली
सौर और पवन ऊर्जा यद्यपि स्वच्छ हैं, किंतु वे आंतरायिक (Intermittent) हैं—अर्थात धूप और हवा के न होने पर वे बिजली उत्पन्न नहीं कर सकतीं। भारी विनिर्माण और 24 घंटे चलने वाले उद्योगों को निर्बाध ‘बेसलोड’ बिजली की आवश्यकता होती है जिसे कोयले के बिना प्रदान करने का एकमात्र शून्य-कार्बन विकल्प ‘परमाणु ऊर्जा’ (Nuclear Energy) है। भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को वर्तमान के 8,180 मेगावाट से बढ़ाकर 2031-32 तक 22,480 मेगावाट करने का लक्ष्य रखा है।
गुजरात के काकरापार और राजस्थान के रावतभाटा में भारत ने पूर्णतः स्वदेशी 700 मेगावाट के प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स (PHWR) का सफल वाणिज्यिक संचालन आरंभ कर स्वदेशी परमाणु इंजीनियरिंग की सर्वोच्च क्षमता सिद्ध की है। इसके अतिरिक्त तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूस के सहयोग से 1,000 मेगावाट के विशाल वीवीईआर रिएक्टर्स का निर्माण चल रहा है। भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा के लिए भारत अब ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स’ (SMR) के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। ये छोटे 100 से 300 मेगावाट के रिएक्टर्स कारखानों में पूर्वनिर्मित किए जा सकते हैं और पुराने सेवानिवृत्त हो रहे कोयला बिजली संयंत्रों के स्थान पर स्थापित किए जा सकते हैं। थोरियम आधारित परमाणु कार्यक्रम का तीसरा चरण भारत को सदियों तक स्वच्छ और असीमित ऊर्जा प्रदान करने का स्थायी आधार स्तंभ है।
सर्कुलर इकोनॉमी और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन: कचरे से कंचन (Waste to Wealth)
भारत में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले 1.5 लाख टन से अधिक ठोस कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन स्वच्छ भारत और पर्यावरण संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा है। भारत सरकार ने ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (अपशिष्ट को संसाधन में बदलना) की राष्ट्रीय नीति लागू की है। शहरों में दशकों से जमा कचरे के पहाड़ों (लीगेसी वेस्ट) को बायो-माइनिंग तकनीक द्वारा संसाधित कर 5,000 एकड़ से अधिक मूल्यवान शहरी भूमि को मुक्त कराया गया है और वहां हरित जैव-विविधता पार्क बनाए गए हैं।
‘गोबरधन’ (Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan) योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के गोबर और कृषि अपशिष्ट से संपीड़ित बायोगैस (CBG) और उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद बनाने वाले सैकड़ों संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने लाखों टन गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक कचरे और स्टील स्लैग का उपयोग करके मजबूत, टिकाऊ और हरित सड़कें बनाई हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E-Waste) और अनुपयोगी वाहनों के वैज्ञानिक पुनर्चक्रण के लिए ‘वाहन कबाड़ नीति’ (Vehicle Scrappage Policy) लागू की गई है जो दुर्लभ धातुओं के पुनःउपयोग को सुनिश्चित कर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को कम करती है।
जलवायु वित्तपोषण और विकसित देशों का नैतिक उत्तरदायित्व: ‘जलवायु न्याय’
वैश्विक जलवायु वार्ताओं में भारत सदैव ‘जलवायु न्याय’ (Climate Justice) का सबसे निर्भीक और मुखर पैरोकार रहा है। भारत का यह अटल सिद्धांत है कि जिन विकसित देशों (अमेरिका, यूरोपीय संघ आदि) ने औद्योगिक क्रांति के बाद पिछले 150 वर्षों में अंधाधुंध जीवाश्म ईंधन जलाकर वायुमंडल को कार्बन डाइऑक्साइड से भर दिया है, उन्हें अपनी ऐतिहासिक गलती की जिम्मेदारी लेनी होगी।
भारत ने कॉप बैठकों में लगातार मांग की है कि विकसित देश विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और जलवायु अनुकूलन के लिए प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर से अधिक का रियायती ‘जलवायु वित्त’ (Climate Finance) और अत्याधुनिक पेटेंट-मुक्त हरित प्रौद्योगिकियां बिना किसी शर्त के उपलब्ध कराएं। विकासशील देशों पर कार्बन टैक्स या सीमा समायोजन कर (CBAM) लगाना अनैतिक और अन्यायपूर्ण है। भारत का यह स्पष्ट दृष्टिकोण है कि निर्धनता उन्मूलन और नागरिकों का सामाजिक विकास जलवायु न्याय का पहला चरण है। भारत बिना किसी विदेशी वित्तीय अनुदान की प्रतीक्षा किए अपने राष्ट्रीय संसाधनों से विश्व का सबसे बड़ा ऊर्जा संक्रमण चला रहा है जो उसकी नैतिक सर्वोच्चता का अनुपम प्रमाण है।
पम्प्ड स्टोरेज हाइड्रो प्रोजेक्ट्स (PSP): भारत की विशालकाय जल बैटरियां
नवीकरणीय ऊर्जा के तीव्र प्रसार के साथ सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती ग्रिड में दिन और रात के बिजली उत्पादन में संतुलन स्थापित करना है। इस ग्रिड लचीलेपन को हासिल करने के लिए ‘पम्प्ड स्टोरेज हाइड्रो प्रोजेक्ट्स’ (Pumped Storage Projects – PSP) विश्व की सबसे किफायती, पर्यावरण-अनुकूल और विशालकाय ऊर्जा भंडारण प्रणाली के रूप में उभरे हैं। भारत सरकार ने देश भर में 50 गीगावाट से अधिक क्षमता के पीएसपी प्रोजेक्ट्स की पहचान की है।
यह प्रणाली दो अलग-अलग ऊंचाई वाले जलाशयों (ऊपरी और निचले बांध) पर आधारित होती है। दिन के समय जब सौर ऊर्जा से प्रचुर और अत्यधिक सस्ती अतिरिक्त बिजली उत्पन्न होती है, उस बिजली का उपयोग करके विशाल पंपों द्वारा पानी को निचले जलाशय से ऊपरी जलाशय में चढ़ा लिया जाता है। इसके पश्चात शाम और रात्रि के समय जब सौर बिजली शून्य हो जाती है और बिजली की राष्ट्रीय मांग अपने चरम (पीक ऑवर्स) पर होती है, ऊपरी जलाशय के पानी को नीचे गिराकर जल-टर्बाइनों को तीव्र गति से घुमाया जाता है और सेकंडों में हजारों मेगावाट स्वच्छ बिजली ग्रिड में इंजेक्ट कर दी जाती है। यह चक्र 40 से 50 वर्षों तक बिना किसी रासायनिक क्षरण के काम करता है, जो महंगी रासायनिक बैटरियों की तुलना में कहीं अधिक टिकाऊ और हरित विकल्प है।
भूजल संरक्षण, अटल भूजल योजना और वर्षा जल संचयन
जलवायु परिवर्तन का सबसे सीधा प्रभाव देश के जल संसाधनों पर पड़ता है। भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है जो वैश्विक भूजल निष्कर्षण का 25 प्रतिशत अकेले उपयोग करता है। भूजल स्तर के खतरनाक गिरावट को रोकने के लिए भारत सरकार ने विश्व बैंक के सहयोग से 6,000 करोड़ रुपये की ‘अटल भूजल योजना’ (Atal Jal) आरंभ की है जो देश के 7 सबसे अधिक जल-तनावग्रस्त राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) के 8,200 से अधिक गांवों में संचालित की जा रही है।
अटल जल योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जल संरक्षण को सरकारी इंजीनियरिंग से बदलकर ‘सामुदायिक जल बजट’ (Water Budgeting) का जन-आंदोलन बनाती है। ग्राम पंचायतें यह तय करती हैं कि उपलब्ध भूजल के अनुसार किन कम पानी वाली फसलों (जैसे बाजरा, ज्वार, दलहन) की खेती करनी है। इसके अतिरिक्त शहरों में ‘वर्षा जल संचयन’ (Rainwater Harvesting – RWH) को भवन निर्माण उपनियमों में कानूनी रूप से अनिवार्य किया गया है। ‘अमृत सरोवर’ महाअभियान के तहत देश के प्रत्येक जिले में 75 विशाल ऐतिहासिक तालाबों का जीर्णोद्धार और नए जल निकायों का निर्माण किया गया है जिससे देश भर में 60,000 से अधिक नए अमृत सरोवरों ने भूजल तालिकाओं को पुनः जीवनदान दिया है।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP): शहरों में वायु गुणवत्ता सुधार
भारत के 131 गैर-प्राप्ति वाले शहरों (Non-Attainment Cities – जहां वायु गुणवत्ता राष्ट्रीय मानकों से लगातार खराब रही है) में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम’ (NCAP) क्रियान्वित किया जा रहा है। इसका लक्ष्य पीएम10 और पीएम2.5 के सांद्रण में 40 प्रतिशत तक की लक्षित कटौती प्राप्त करना है।
इस मिशन के तहत सड़कों की धूल को नियंत्रित करने के लिए यांत्रिक स्वीपिंग मशीनों, निर्माण स्थलों पर एंटी-स्मॉग गन्स, पराली जलाने (Stubble Burning) की रोकथाम हेतु ‘हैप्पी सीडर’ और ‘सी-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन’ मशीनों पर 80 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जा रही है। शहरों में प्रदूषण फैलाने वाले पुराने डीजल ऑटो को सीएनजी और इलेक्ट्रिक में परिवर्तित किया गया है। ‘समीक्षा’ और ‘समीर’ (SAMEER) ऐप के माध्यम से देश भर के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) की पारदर्शी 24×7 रियल-टाइम निगरानी की जा रही है। उद्योग इकाइयों में शून्य तरल निर्वहन (ZLD) और ऑनलाइन निरंतर उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (CEMS) लागू की गई है जिससे औद्योगिक प्रदूषण पर सीधी कानूनी नकेल कसी जा सकी है।
राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति और 20 प्रतिशत एथेनॉल संमिश्रण (E20) क्रांति
परिवहन क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को घटाने और विदेशी तेल आयात को कम करने के लिए भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति’ को अत्यधिक आक्रामक रूप से क्रियान्वित किया है। पेट्रोल में एथेनॉल संमिश्रण जो 2014 में मात्र 1.4 प्रतिशत था, आज वह बढ़कर 15 प्रतिशत को पार कर चुका है और भारत ने 2025-26 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने (E20) का राष्ट्रीय लक्ष्य समय से पहले हासिल करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए हैं।
गन्ने के शीरे, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न और मक्के से निर्मित यह एथेनॉल न केवल वाहनों के टेलपाइप से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में 30 प्रतिशत से अधिक की भारी कमी लाता है, बल्कि इसने देश के विदेशी मुद्रा भंडार के 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की सीधी बचत की है। इसके अतिरिक्त इस कार्यक्रम ने देश के करोड़ों गन्ना किसानों को समय पर 90,000 करोड़ रुपये से अधिक का प्रत्यक्ष भुगतान सुनिश्चित किया है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई क्रय शक्ति प्राप्त हुई है। इसके साथ ही संपीड़ित बायो-गैस (CBG) और सतत विमानन ईंधन (Sustainable Aviation Fuel – SAF) के घरेलू उत्पादन पर बल देकर भारत हरित गतिशीलता का वैश्विक आदर्श प्रस्तुत कर रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
1. भारत का 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net-Zero) उत्सर्जन का वास्तविक अर्थ क्या है?
शुद्ध-शून्य (Net-Zero) का अर्थ यह नहीं है कि कार्बन उत्सर्जन पूरी तरह शून्य हो जाएगा, बल्कि इसका अर्थ यह है कि मानवीय गतिविधियों द्वारा जितना कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में उत्सर्जित किया जाएगा, उतना ही कार्बन वनों, आद्रभूमियों और कार्बन कैप्चर तकनीकों द्वारा वातावरण से अवशोषित कर लिया जाएगा, जिससे शुद्ध संतुलन शून्य हो जाएगा।
2. ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ में आवेदन कैसे किया जा सकता है?
उपभोक्ता राष्ट्रीय पोर्टल (pmsuryaghar.gov.in) पर जाकर अपने बिजली उपभोक्ता नंबर और मोबाइल से ऑनलाइन पंजीकरण कर सकते हैं। अपनी छत की माप और बिजली बिल के अनुसार सोलर क्षमता का चयन करें। अधिकृत वेंडर्स द्वारा सोलर पैनल स्थापित होने और डिस्कॉम द्वारा नेट-मीटर लगने के 30 दिनों के भीतर सरकारी सब्सिडी सीधे बैंक खाते में आ जाती है।
3. सौर ऊर्जा केवल दिन में काम करती है, तो रात में बिजली की आपूर्ति कैसे होगी?
इसके समाधान हेतु भारत बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) और ‘पम्प्ड स्टोरेज हाइड्रो प्रोजेक्ट्स’ (PSP) का तीव्र विस्तार कर रहा है। दिन के समय अतिरिक्त सौर बिजली से विशाल बैटरियों को चार्ज किया जाता है अथवा पानी को ऊंचे बांध में पंप कर लिया जाता है, जिसे रात में टर्बाइन चलाकर 24 घंटे निर्बाध स्वच्छ बिजली प्रदान की जाती है।
4. क्या भारत में इलेक्ट्रिक वाहन (EV) सचमुच पर्यावरण के अनुकूल हैं?
हां, यद्यपि भारत में अभी भी बिजली का कुछ हिस्सा कोयले से बनता है, किंतु इलेक्ट्रिक वाहन पारंपरिक पेट्रोल/डीजल इंजन की तुलना में अत्यधिक कुशल होते हैं और शहरों में टेलपाइप उत्सर्जन को शून्य कर देते हैं। इसके अतिरिक्त जैसे-जैसे भारत के बिजली ग्रिड में सौर और पवन ऊर्जा का अनुपात 50 प्रतिशत तक पहुंच रहा है, ईवी का संपूर्ण लाइफ-साइकिल उत्सर्जन नगण्य होता जा रहा है।
5. हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) और धूसर हाइड्रोजन (Grey Hydrogen) में क्या अंतर है?
धूसर हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस (मीथेन) से बनाई जाती है जिसमें भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है। इसके विपरीत हरित हाइड्रोजन का उत्पादन शुद्ध जल के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा 100 प्रतिशत सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग करके किया जाता है, जिसके उत्पादन में एक ग्राम भी कार्बन उत्सर्जन नहीं होता।
6. क्या रूफटॉप सोलर लगाने से छत को कोई नुकसान पहुंचता है?
नहीं, पेशेवर वेंडर्स द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली गैल्वेनाइज्ड आयरन (GI) संरचनाओं के माध्यम से सोलर पैनल्स को छत पर सुरक्षित रूप से स्थापित किया जाता है। ये पैनल्स छत को तेज धूप से बचाते हैं जिससे गर्मियों में मकान के शीर्ष तल का तापमान 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रहता है।
7. मिशन LiFE का दैनिक जीवन में सबसे सरल अभ्यास क्या है?
कमरों से बाहर निकलते समय पंखे और लाइट बंद करना, ब्रश करते समय नल बंद रखना, सिंगल-यूज प्लास्टिक की थैलियों के स्थान पर कपड़े के थैले का उपयोग करना, खाद्य सामग्री की बर्बादी रोकना और संभव होने पर पैदल या सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना मिशन LiFE के सबसे प्रभावी और सरल आचरण हैं।
8. भारत में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के लिए क्या सख्त नियम लागू किए गए हैं?
भारत सरकार ने 1 जुलाई 2022 से देश भर में 19 प्रकार की सिंगल-यूज प्लास्टिक वस्तुओं (जैसे प्लास्टिक कटलरी, थर्माकोल प्लेट, प्लास्टिक स्ट्रॉ, इयरबड्स स्टिक और 120 माइक्रोन से पतली पॉलीथिन) के निर्माण, आयात, वितरण और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। प्लास्टिक उत्पादकों पर ‘विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व’ (EPR) अनिवार्य किया गया है।
9. भारत के चीता पुनर्वास प्रोजेक्ट (Project Cheetah) का पर्यावरण के लिए क्या महत्व है?
चीता केवल एक खूबसूरत जानवर नहीं है, बल्कि वह शुष्क घास के मैदानों (ग्रासलैंड्स) और खुले वनों का शीर्ष शिकारी (Apex Predator) है। चीते के संरक्षण से पूरे घास के मैदान पारिस्थितिकी तंत्र, हिरणों, पक्षियों और लुप्तप्राय जीवों का प्राकृतिक संतुलन पुनः स्थापित होता है जो भारत के पारिस्थितिक स्वास्थ्य के लिए अपरिहार्य है।
निष्कर्ष एवं भावी पीढ़ियों के लिए हरित भारत का संकल्प
पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का मार्ग केवल सरकारी संधियों या अंतरराष्ट्रीय दबावों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह भारत के सनातन चिंतन का स्वाभाविक पुनर्जागरण है जहां वैदिक ऋषियों ने ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ (यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूं) का उद्घोष किया था। भारत आज संपूर्ण विश्व को यह दिखा रहा है कि तीव्र आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दो विरोधी अवधारणाएं नहीं हैं, बल्कि वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सौर ऊर्जा क्रांति से लेकर हरित हाइड्रोजन तक, 1 करोड़ घरों की छतों पर सोलर रूफटॉप से लेकर चीतों की वापसी तक भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, अत्याधुनिक वैज्ञानिक नवाचार और 1.4 अरब नागरिकों का सामूहिक संकल्प एक साथ जुड़ जाता है, तो एक हरित, स्वच्छ और समृद्ध भविष्य का निर्माण निश्चित हो जाता है। भारत की यह हरित यात्रा हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक शुद्ध, सुंदर और जीवनदायिनी धरा सौंपने का पावन राष्ट्रीय महायज्ञ है।

